@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

बुधवार, 14 जून 2017

उसकी माँ

'कहानी' 
उसकी माँ
पाण्डेय बैचेन शर्मा 'उग्र'

दोपहर को ज़रा आराम करके उठा था। अपने पढ़ने-लिखने के कमरे में खड़ा-खड़ा धीरे-धीरे सिगार पी रहा था और बड़ी-बड़ी अलमारियों में सजे पुस्तकालय की ओर निहार रहा था। किसी महान लेखक की कोई कृति उनमें से निकालकर देखने की बात सोच रहा था। मगर, पुस्तकालय के एक सिरे से लेकर दूसरे तक मुझे महान ही महान नज़र आए। कहीं गेटे, कहीं रूसो, कहीं मेज़िनी, कहीं नीत्शे, कहीं शेक्सपीयर, कहीं टॉलस्टाय, कहीं ह्यूगो, कहीं मोपासाँ, कहीं डिकेंस, सपेंसर, मैकाले, मिल्टन, मोलियर---उफ़! इधर से उधर तक एक-से-एक महान ही तो थे! आखिर मैं किसके साथ चंद मिनट मनबहलाव करूँ, यह निश्चय ही न हो सका, महानों के नाम ही पढ़ते-पढ़ते परेशान सा हो गया।
इतने में मोटर की पों-पों सुनाई पड़ी। खिड़की से झाँका तो सुरमई रंग की कोई 'फिएट' गाड़ी दिखाई पड़ी। मैं सोचने लगा - शायद कोई मित्र पधारे हैं, अच्छा ही है। महानों से जान बची!
जब नौकर ने सलाम कर आनेवाले का कार्ड दिया, तब मैं कुछ घबराया। उसपर शहर के पुलिस सुपरिटेंडेंट का नाम छपा था। ऐसे बेवक़्त ये कैसे आए?
पुलिस-पति भीतर आए। मैंने हाथ मिलाकर, चक्कर खानेवाली एक गद्दीदार कुरसी पर उन्हें आसन दिया। वे व्यापारिक मुसकराहट से लैस होकर बोले, "इस अचानक आगमन के लिए आप मुझे क्षमा करें।"
"आज्ञा हो!" मैंने भी नम्रता से कहा।
उन्होंने पॉकेट से डायरी निकाली, डायरी से एक तसवीर। बोले, "देखिए इसे, जरा बताइए तो, आप पहचानते हैं इसको?"
"हाँ, पहचानता तो हूँ," जरा सहमते हुए मैंने बताया।
"इसके बारे में मुझे आपसे कुछ पूछना है।"
"पूछिए।"
"इसका नाम क्या है?"

"लाल! मैं इसी नाम से बचपन ही से इसे पुकारता आ रहा हूँ। मगर, यह पुकारने का नाम है। एक नाम कोई और है, सो मुझे स्मरण नहीं।"

"कहाँ रहता है यह?" सुपरिटेंडेंट ने मेरी ओर देखकर पूछा।
"मेरे बँगले के ठीक सामने एक दोमंजिला, कच्चा-पक्का घर है, उसी में वह रहता है। वह है और उसकी बूढ़ी माँ।"
"बूढ़ी का नाम क्या है?"
"जानकी।"
"और कोई नहीं है क्या इसके परिवार में? दोनों का पालन-पोषण कौन करता है?"
"सात-आठ वर्ष हुए, लाल के पिता का देहांत हो गया। अब उस परिवार में वह और उसकी माता ही बचे हैं। उसका पिता जब तक जीवित रहा, बराबर मेरी जमींदारी का मुख्य मैनेजर रहा। उसका नाम रामनाथ था। वही मेरे पास कुछ हजार रुपए जमा कर गया था, जिससे अब तक उनका खर्चा चल रहा है। लड़का कॉलेज में पढ़ रहा है। जानकी को आशा है, वह साल-दो साल बाद कमाने और परिवार को सँभालने लगेगा। मगर क्षमा कीजिए, क्या मैं यह पूछ सकता हूँ कि आप उसके बारे में क्यों इतनी पूछताछ कर रहे हैं?"
"यह तो मैं आपको नहीं बता सकता, मगर इतना आप समझ लें, यह सरकारी काम है। इसलिए आज मैंने आपको इतनी तकलीफ़ दी है।"
"अजी, इसमें तकलीफ़ की क्या बात है! हम तो सात पुश्त से सरकार के फ़रमाबरदार हैं। और कुछ आज्ञा---"
"एक बात और---", पुलिस-पति ने गंभीरतापूर्वक धीरे से कहा, "मैं मित्रता से आपसे निवेदन करता हूँ, आप इस परिवार से जरा सावधान और दूर रहें। फिलहाल इससे अधिक मुझे कुछ कहना नहीं।"
"लाल की माँ!" एक दिन जानकी को बुलाकर मैंने समझाया, "तुम्हारा लाल आजकल क्या पाजीपन करता है? तुम उसे केवल प्यार ही करती हो न! हूँ! भोगोगी!"
"क्या है, बाबू?" उसने कहा।
"लाल क्या करता है?"
"मैं तो उसे कोई भी बुरा काम करते नहीं देखती।"
"बिना किए ही तो सरकार किसी के पीछे पड़ती नहीं। हाँ, लाल की माँ! बड़ी धर्मात्मा, विवेकी और न्यायी सरकार है यह। ज़रूर तुम्हारा लाल कुछ करता होगा।"
"माँ! माँ!" पुकारता हुआ उसी समय लाल भी आया - लंबा, सुडौल, सुंदर, तेजस्वी।
"माँ!!" उसने मुझे नमस्कार कर जानकी से कहा, "तू यहाँ भाग आई है। चल तो! मेरे कई सहपाठी वहाँ खड़े हैं, उन्हें चटपट कुछ जलपान करा दे, फिर हम घूमने जाएँगे!"
"अरे!" जानकी के चेहरे की झुर्रियाँ चमकने लगीं, काँपने लगीं, उसे देखकर, "तू आ गया लाल! चलती हूँ, भैया! पर, देख तो, तेरे चाचा क्या शिकायत कर रहे हैं? तू क्या पाजीपना करता है, बेटा?"
"क्या है, चाचा जी?" उसने सविनय, सुमधुर स्वर में मुझसे पूछा, "मैंने क्या अपराध किया है?"
"मैं तुमसे नाराज हूँ लाल!" मैंने गंभीर स्वर में कहा।
"क्यों, चाचा जी?"
"तुम बहुत बुरे होते जा रहे हो, जो सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र करनेवाले के साथी हो। हाँ, तुम हो! देखो लाल की माँ, इसके चेहरे का रंग उड़ गया, यह सोचकर कि यह खबर मुझे कैसे मिली।"
सचमुच एक बार उसका खिला हुआ रंग जरा मुरझा गया, मेरी बातों से! पर तुरंत ही वह सँभला।
"आपने गलत सुना, चाचा जी। मैं किसी षड्यंत्र में नहीं। हाँ, मेरे विचार स्वतंत्र अवश्य हैं, मैं जरूरत-बेजरूरत जिस-तिस के आगे उबल अवश्य उठता हूँ। देश की दुरवस्था पर उबल उठता हूँ, इस पशु-हृदय परतंत्रता पर।"
"तुम्हारी ही बात सही, तुम षड्यंत्र में नहीं, विद्रोह में नहीं, पर यह बक-बक क्यों? इससे फ़ायदा? तुम्हारी इस बक-बक से न तो देश की दुर्दशा दूर होगी और न उसकी पराधीनता। तुम्हारा काम पढ़ना है, पढ़ो। इसके बाद कर्म करना होगा, परिवार और देश की मर्यादा बचानी होगी। तुम पहले अपने घर का उद्धार तो कर लो, तब सरकार के सुधार का विचार करना।"
उसने नम्रता से कहा, "चाचा जी, क्षमा कीजिए। इस विषय में मैं आपसे विवाद नहीं करना चाहता।"
"चाहना होगा, विवाद करना होगा। मैं केवल चाचा जी नहीं, तुम्हारा बहुत कुछ हूँ। तुम्हें देखते ही मेरी आँखों के सामने रामनाथ नाचने लगते हैं, तुम्हारी बूढ़ी माँ घूमने लगती है। भला मैं तुम्हें बेहाथ होने दे सकता हूँ! इस भरोसे मत रहना।"
"इस पराधीनता के विवाद में, चाचा जी, मैं और आप दो भिन्न सिरों पर हैं। आप कट्टर राजभक्त, मैं कट्टर राजविद्रोही। आप पहली बात को उचित समझते हैं - कुछ कारणों से, मैं दूसरी को - दूसरे कारणों से। आप अपना पद छोड़ नहीं सकते - अपनी प्यारी कल्पनाओं के लिए, मैं अपना भी नहीं छोड़ सकता।"
"तुम्हारी कल्पनाएँ क्या हैं, सुनूँ तो! जरा मैं भी जान लूँ कि अबके लड़के कॉलेज की गरदन तक पहुँचते-पहुँचते कैसे-कैसे हवाई किले उठाने के सपने देखने लगते हैं। जरा मैं भी तो सुनूँ, बेटा।"
"मेरी कल्पना यह है कि जो व्यक्ति समाज या राष्ट्र के नाश पर जीता हो, उसका सर्वनाश हो जाए!"
जानकी उठकर बाहर चली, "अरे! तू तो जमकर चाचा से जूझने लगा। वहाँ चार बच्चे बेचारे दरवाजे पर खड़े होंगे। लड़ तू, मैं जाती हूँ।" उसने मुझसे कहा, "समझा दो बाबू, मैं तो आप ही कुछ नहीं समझती, फिर इसे क्या समझाऊँगी!" उसने फिर लाल की ओर देखा, "चाचा जो कहें, मान जा, बेटा। यह तेरे भले ही की कहेंगे।"
वह बेचारी कमर झुकाए, उस साठ बरस की वय में भी घूँघट सँभाले, चली गई। उस दिन उसने मेरी और लाल की बातों की गंभीरता नहीं समझी।
"मेरी कल्पना यह है कि---", उत्तेजित स्वर में लाल ने कहा, "ऐसे दुष्ट, व्यक्ति-नाशक राष्ट्र के सर्वनाश में मेरा भी हाथ हो।"
"तुम्हारे हाथ दुर्बल हैं, उनसे जिनसे तुम पंजा लेने जा रहे हो, चर्र-मर्र हो उठेंगे, नष्ट हो जाएँगे।"
"चाचा जी, नष्ट हो जाना तो यहाँ का नियम है। जो सँवारा गया है, वह बिगड़ेगा ही। हमें दुर्बलता के डर से अपना काम नहीं रोकना चाहिए। कर्म के समय हमारी भुजाएँ दुर्बल नहीं, भगवान की सहस्र भुजाओं की सखियाँ हैं।"
"तो तुम क्या करना चाहते हो?"
"जो भी मुझसे हो सकेगा, करूँगा।"
"षड्यंत्र?"
"जरूरत पड़ी तो जरूर---"
"विद्रोह?"
"हाँ, अवश्य!"
"हत्या?"
"हाँ, हाँ, हाँ!"
"बेटा, तुम्हारा माथा न जाने कौन सी किताब पढ़ते-पढ़ते बिगड़ रहा है। सावधान!"
मेरी धर्मपत्नी और लाल की माँ एक दिन बैठी हुई बातें कर रही थीं कि मैं पहुँच गया। कुछ पूछने के लिए कई दिनों से मैं उसकी तलाश में था।
"क्यों लाल की माँ, लाल के साथ किसके लड़के आते हैं तुम्हारे घर में?"
"मैं क्या जानूँ, बाबू!" उसने सरलता से कहा, "मगर वे सभी मेरे लाल ही की तरह मुझे प्यारे दिखते हैं। सब लापरवाह! वे इतना हँसते, गाते और हो-हल्ला मचाते हैं कि मैं मुग्ध हो जाती हूँ।"
मैंने एक ठंडी साँस ली, "हूँ, ठीक कहती हो। वे बातें कैसी करते हैं, कुछ समझ पाती हो?"
"बाबू, वे लाल की बैठक में बैठते हैं। कभी-कभी जब मैं उन्हें कुछ खिलाने-पिलाने जाती हूँ, तब वे बड़े प्रेम से मुझे 'माँ' कहते हैं। मेरी छाती फूल उठती है---मानो वे मेरे ही बच्चे हैं।"
"हूँ---", मैंने फिर साँस ली।
"एक लड़का उनमें बहुत ही हँसोड़ है। खूब तगड़ा और बली दिखता है। लाल कहता था, वह डंडा लड़ने में, दौड़ने में, घूँसेबाजी में, खाने में, छेड़ खानी करने और हो-हो, हा-हा कर हँसने में समूचे कालेज में फ़र्स्ट है। उसी लड़के ने एक दिन, जब मैं उन्हें हलवा परोस रही थी, मेरे मुँह की ओर देखकर कहा, 'माँ! तू तो ठीक भारत माता-सी लगती है। तू बूढ़ी, वह बूढ़ी। उसका उजला हिमालय है, तेरे केश। हाँ, नक्शे से साबित करता हूँ---तू भारत माता है। सिर तेरा हिमालय---माथे की दोनों गहरी बड़ी रेखाएँ गंगा और यमुना, यह नाक विंध्याचल, ठोढ़ी कन्याकुमारी तथा छोटी बड़ी झुरियाँ-रेखाएँ भिन्न-भिन्न पहाड़ और नदियाँ हैं। जरा पास आ मेरे! तेरे केशों को पीछे से आगे बाएँ कंधे पर लहरा दूँ, वह बर्मा बन जाएगा। बिना उसके भारत माता का श्रृंगार शुद्ध न होगा।"
जानकी उस लड़के की बातें सोच गद्गद हो उठी, "बाबू, ऐसा ढीठ लड़का! सारे बच्चे हँसते रहे और उसने मुझे पकड़, मेरे बालों को बाहर कर अपना बर्मा तैयार कर लिया!"
उसकी सरलता मेरी आँखों में आँसू बनकर छा गई। मैंने पूछा, "लाल की माँ, और भी वे कुछ बातें करते हैं? लड़ने की, झगड़ने की, गोला, गोली या बंदूक की?"
"अरे, बाबू," उसने मुसकराकर कहा, "वे सभी बातें करते हैं। उनकी बातों का कोई मतलब थोड़े ही होता है। सब जवान हैं, लापरवाह हैं। जो मुँह में आता है, बकते हैं। कभी-कभी तो पागलों-सी बातें करते हैं। महीनाभर पहले एक दिन लड़के बहुत उत्तेजित थे। न जाने कहाँ, लड़कों कोसरकार पकड़ रही है। मालूम नहीं, पकड़ती भी है या वे यों ही गप हाँकते थे। मगर उस दिन वे यही बक रहे थे, 'पुलिसवाले केवल संदेह पर भले आदमियों के बच्चों को त्रस देते हैं, मारते हैं, सताते हैं। यह अत्याचारी पुलिस की नीचता है। ऐसी नीच शासन-प्रणाली को स्वीकार करना अपने धर्म को, कर्म को, आत्मा को, परमात्मा को भुलाना है। धीरे-धीरे घुलाना-मिटाना है।'
एक ने उत्तेजित भाव से कहा, 'अजी, ये परदेसी कौन लगते हैं हमारे, जो बरबस राजभक्ति बनाए रखने के लिए हमारी छाती पर तोप का मुँह लगाए अड़े और खड़े हैं। उफ़! इस देश के लोगों के हिये की आँखें मुँद गई हैं। तभी तो इतने जुल्मों पर भी आदमी आदमी से डरता है। ये लोग शरीर की रक्षा के लिए अपनी-अपनी आत्मा की चिता सँवारते फिरते हैं। नाश हो इस परतंत्रवाद का!'
दूसरे ने कहा, 'लोग ज्ञान न पा सकें, इसलिए इस सरकार ने हमारे पढ़ने-लिखने के साधनों को अज्ञान से भर रखा है। लोग वीर और स्वाधीन न हो सकें, इसलिए अपमानजनक और मनुष्यताहीन नीति-मर्दक कानून गढ़े हैं। गरीबों को चूसकर, सेना के नाम पर पले हुए पशुओं को शराब से, कबाब से, मोटा-ताजा रखती है यह सरकार। धीरे-धीरे जोंक की तरह हमारे धर्म, प्राण और धन चूसती चली जा रही है यह शासन-प्रणाली!'
'ऐसे ही अंट-संट ये बातूनी बका करते हैं, बाबू। जभी चार छोकरे जुटे, तभी यही चर्चा। लाल के साथियों का मिजाज भी उसी-सा अल्हड़-बिल्हड़ मुझे मालूम पड़ता है। ये लड़के ज्यों-ज्यों पढ़ते जा रहे हैं, त्यों-त्यों बक-बक में बढ़ते जा रहे हैं।'
"यह बुरा है, लाल की माँ!" मैंने गहरी साँस ली।
जमींदारी के कुछ जरूरी काम से चार-पाँच दिनों के लिए बाहर गया था। लौटने पर बँगले में घुसने के पूर्व लाल के दरवाजे पर नजर पड़ी तो वहाँ एक भयानक सन्नाटा-सा नजर आया - जैसे घर उदास हो, रोता हो।
भीतर आने पर मेरी धर्मपत्नी मेरे सामने उदास मुख खड़ी हो गई।
"तुमने सुना?"
"नहीं तो, कौन सी बात?"
"लाल की माँ पर भयानक विपत्ति टूट पड़ी है।"
मैं कुछ-कुछ समझ गया, फिर भी विस्तृत विवरण जानने को उत्सुक हो उठा, "क्या हुआ? जरा साफ़-साफ़ बताओ।"
"वही हुआ जिसका तुम्हें भय था। कल पुलिस की एक पलटन ने लाल का घर घेर लिया था। बारह घंटे तक तलाशी हुई। लाल, उसके बारह-पंद्रह साथी, सभी पकड़ लिए गए हैं। सबके घरों से भयानक-भयानक चीजें निकली हैं।"
"लाल के यहाँ?"
"उसके यहाँ भी दो पिस्तौल, बहुत से कारतूस और पत्र पाए गए हैं। सुना है, उन पर हत्या, षड्यंत्र, सरकारी राज्य उलटने की चेष्टा आदि अपराध लगाए गए हैं।"
"हूँ," मैंने ठंडी साँस ली, "मैं तो महीनों से चिल्ला रहा था कि वह लौंडा धोखा देगा। अब यह बूढ़ी बेचारी मरी। वह कहाँ है? तलाशी के बाद तुम्हारे पास आई थी?"
"जानकी मेरे पास कहाँ आई! बुलवाने पर भी कल नकार गई। नौकर से कहलाया, 'परांठे बना रही हूँ, हलवा, तरकारी अभी बनाना है, नहीं तो, वे बिल्हड़ बच्चे हवालात में मुरझा न जाएँगे। जेलवाले और उत्साही बच्चों की दुश्मन यह सरकार उन्हें भूखों मार डालेगी। मगर मेरे जीते-जी यह नहीं होने का'।"
"वह पागल है, भोगेगी," मैं दुख से टूटकर चारपाई पर गिर पड़ा। मुझे लाल के कर्मों पर घोर खेद हुआ।
इसके बाद प्रायः एक वर्ष तक वह मुकदमा चला। कोई भी अदालत के कागज उलटकर देख सकता है, सी-आई-डी- ने और उनके प्रमुख सरकारी वकील ने उन लड़कों पर बड़े-बड़े दोषारोपण किए। उन्होंने चारों ओर गुप्त समितियाँ कायम की थीं, खर्चे और प्रचार के लिए डाकेडाले थे, सरकारी अधिकारियों के यहाँ रात में छापा मारकर शस्त्र एकत्र किए थे। उन्होंने न जाने किस पुलिस के दारोगा को मारा था और न जाने कहाँ, न जाने किस पुलिस सुपरिटेंडेंट को। ये सभी बातें सरकार की ओर से प्रमाणित की गईं।
उधर उन लड़कों की पीठ पर कौन था? प्रायः कोई नहीं। सरकार के डर के मारे पहले तो कोई वकील ही उन्हें नहीं मिल रहा था, फिर एक बेचारा मिला भी, तो 'नहीं' का भाई। हाँ, उनकी पैरवी में सबसे अधिक परेशान वह बूढ़ी रहा करती। वह लोटा, थाली, जेवर आदि बेच-बेचकर सुबह-शाम उन बच्चों को भोजन पहुँचाती। फिर वकीलों के यहाँ जाकर दाँत निपोरती, गिड़गिड़ाती, कहती, "सब झूठ है। न जाने कहाँ से पुलिसवालों ने ऐसी-ऐसी चीजें हमारे घरों से पैदा कर दी हैं। वे लड़के केवल बातूनी हैं। हाँ, मैं भगवान का चरण छूकर कह सकती हूँ, तुम जेल में जाकर देख आओ, वकील बाबू। भला, फूल-से बच्चे हत्या कर सकते हैं?" उसका तन सूखकर काँटा हो गया, कमर झुककर धनुष-सी हो गई, आँखें निस्तेज, मगर उन बच्चों के लिए दौड़ना, हाय-हाय करना उसने बंद न किया। कभी-कभी सरकारी नौकर, पुलिस या वार्डन झुँझलाकर उसे झिड़क देते, धकिया देते।
उसको अंत तक यह विश्वास रहा कि यह सब पुलिस की चालबाजी है। अदालत में जब दूध का दूध और पानी का पानी किया जाएगा, तब वे बच्चे जरूर बेदाग छूट जाएँगे। वे फिर उसके घर में लाल के साथ आएँगे। उसे 'माँ' कहकर पुकारेंगे।
मगर उस दिन उसकी कमर टूट गई, जिस दिन ऊँची अदालत ने भी लाल को, उस बंगड़ लठैत को तथा दो और लड़कों को फाँसी और दस को दस वर्ष से सात वर्ष तक की कड़ी सजाएँ सुना दीं।
वह अदालत के बाहर झुकी खड़ी थी। बच्चे बेड़ियाँ बजाते, मस्ती से झूमते बाहर आए। सबसे पहले उस बंगड़ की नजर उसपर पड़ी।
"माँ!" वह मुसकराया, "अरे, हमें तो हलवा खिला-खिलाकर तूने गधे-सा तगड़ा कर दिया है, ऐसा कि फाँसी की रस्सी टूट जाए और हम अमर के अमर बने रहें, मगर तू स्वयं सूखकर काँटा हो गई है। क्यों पगली, तेरे लिए घर में खाना नहीं है क्या?"
"माँ!" उसके लाल ने कहा, "तू भी जल्द वहीं आना जहाँ हम लोग जा रहे हैं। यहाँ से थोड़ी ही देर का रास्ता है, माँ! एक साँस में पहुँचेगी। वहीं हम स्वतंत्रता से मिलेंगे। तेरी गोद में खेलेंगे। तुझे कंधे पर उठाकर इधर से उधर दौड़ते फिरेंगे। समझती है? वहाँ बड़ा आनंद है।"
"आएगी न, माँ?" बंगड़ ने पूछा।
"आएगी न, माँ?" लाल ने पूछा।
"आएगी न, माँ?" फाँसी-दंड प्राप्त दो दूसरे लड़कों ने भी पूछा।
और वह टुकुर-टुकुर उनका मुँह ताकती रही - "तुम कहाँ जाओगे पगलो?"
जब से लाल और उसके साथी पकड़े गए, तब से शहर या मुहल्ले का कोई भी आदमीलाल की माँ से मिलने से डरता था। उसे रास्ते में देखकर जाने-पहचाने बगलें झाँकने लगते। मेरा स्वयं अपार प्रेम था उस बेचारी बूढ़ी पर, मगर मैं भी बराबर दूर ही रहा। कौन अपनी गदरन मुसीबत में डालता, विद्रोही की माँ से संबंध रखकर?
उस दिन ब्यालू करने के बाद कुछ देर के लिए पुस्तकालय वाले कमरे में गया, किसी महान लेखक की कोई महान कृति क्षणभर देखने के लालच से। मैंने मेजिनी की एक जिल्द निकालकर उसे खोला। पहले ही पन्ने पर पेंसिल की लिखावट देखकर चौंका। ध्यान देने पर पता चला, वे लाल के हस्ताक्षर थे। मुझे याद पड़ गई। तीन वर्ष पूर्व उस पुस्तक को मुझसे माँगकर उस लड़के ने पढ़ा था।
एक बार मेरे मन में बड़ा मोह उत्पन्न हुआ उस लड़के के लिए। उसके पिता रामनाथ की दिव्य और स्वर्गीय तसवीर मेरी आँखों के आगे नाच गई। लाल की माँ पर उसके सिद्धांतों, विचारों या आचरणों के कारण जो वज्रपात हुआ था, उसकी एक ठेस मुझे भी, उसके हस्ताक्षर को देखते ही लगी। मेरे मुँह से एक गंभीर, लाचार, दुर्बल साँस निकलकर रह गई।
पर, दूसरे ही क्षण पुलिस सुपरिटेंडेंट का ध्यान आया। उसकी भूरी, डरावनी, अमानवी आँखें मेरी 'आप सुखी तो जग सुखी' आँखों में वैसे ही चमक गईं, जैसे ऊजड़ गाँव के सिवान में कभी-कभी भुतही चिनगारी चमक जाया करती है। उसके रूखे फ़ौलादी हाथ, जिनमें लाल की तसवीर थी, मानो मेरी गरदन चापने लगे। मैं मेज पर से रबर (इरेजर) उठाकर उस पुस्तक पर से उसका नाम उधेड़ने लगा। उसी समय मेरी पत्नी के साथ लाल की माँ वहाँ आई। उसके हाथ में एक पत्र था।
"अरे!" मैं अपने को रोक न सका, "लाल की माँ! तुम तो बिलकुल पीली पड़ गई हो। तुम इस तरह मेरी ओर निहारती हो, मानो कुछ देखती ही नहीं हो। यह हाथ में क्या है?"
उसने चुपचाप पत्र मेरे हाथ में दे दिया। मैंने देखा, उसपर जेल की मुहर थी। सजा सुनाने के बाद वह वहीं भेज दिया गया था, यह मुझे मालूम था। मैं पत्र निकालकर पढ़ने लगा। वह उसकी अंतिम चिट्ठी थी। मैंने कलेजा रूखाकर उसे जोर से पढ़ दिया -
"माँ!
जिस दिन तुम्हें यह पत्र मिलेगा उसके सवेरे मैं बाल अरुण के किरण-रथ पर चढ़कर उस ओर चला जाऊँगा। मैं चाहता तो अंत समय तुमसे मिल सकता था, मगर इससे क्या फ़ायदा! मुझे विश्वास है, तुम मेरी जन्म-जन्मांतर की जननी ही रहोगी। मैं तुमसे दूर कहाँ जा सकता हूँ! माँ! जब तक पवन साँस लेता है, सूर्य चमकता है, समुद्र लहराता है, तब तक कौन मुझे तुम्हारी करुणामयी गोद से दूर खींच सकता है?
दिवाकर थमा रहेगा, अरुण रथ लिए जमा रहेगा! मैं, बंगड़ वह, यह सभी तेरे इंतजार में रहेंगे।
हम मिले थे, मिले हैं, मिलेंगे। हाँ, माँ!
तेरा--- लाल"
काँपते हाथ से पढ़ने के बाद पत्र को मैंने उस भयानक लिफ़ाफ़े में भर दिया। मेरी पत्नी की विकलता हिचकियों पर चढ़कर कमरे को करुणा से कँपाने लगी। मगर, वह जानकी ज्यों-की-त्यों, लकड़ी पर झुकी, पूरी खुली और भावहीन आँखों से मेरी ओर देखती रही, मानो वह उस कमरे में थी ही नहीं।
क्षणभर बाद हाथ बढ़ाकर मौन भाषा में उसने पत्र माँगा। और फिर, बिना कुछ कहे कमरे के फाटक के बाहर हो गई, डुगुर-डुगुर लाठी टेकती हुई। इसके बाद शून्य-सा होकर मैं धम से कुरसी पर गिर पड़ा। माथा चक्कर खाने लगा। उस पाजी लड़के के लिए नहीं, इस सरकार की क्रूरता के लिए भी नहीं, उस बेचारी भोली, बूढ़ी जानकी - लाल की माँ के लिए। आह! वह कैसी स्तब्ध थी। उतनी स्तब्धता किसी दिन प्रकृति को मिलती तो आँधी आ जाती। समुद्र पाता तो बौखला उठता।
जब एक का घंटा बजा, मैं जरा सगबगाया। ऐसा मालूम पड़ने लगा मानो हरारत पैदा हो गई है---माथे में, छाती में, रग-रग में। पत्नी ने आकर कहा, "बैठे ही रहोगे! सोओगे नहीं?" मैंने इशारे से उन्हें जाने का कहा।
फिर मेजिनी की जिल्द पर नजर गई। उसके ऊपर पड़े रबर पर भी। फिर अपने सुखों की, जमींदारी की, धनिक जीवन की और उस पुलिस-अधिकारी की निर्दय, नीरस, निस्सार आँखों की स्मृति कलेजे में कंपन भर गई। फिर रबर उठाकर मैंने उस पाजी का पेंसिल-खचित नाम पुस्तक की छाती पर से मिटा डालना चाहा।
"माँ---"
मुझे सुनाई पड़ा। ऐसा लगा, गोया लाल की माँ कराह रही है। मैं रबर हाथ में लिए, दहलते दिल से, खिड़की की ओर बढ़ा। लाल के घर की ओर कान लगाने पर सुनाई न पड़ा। मैं सोचने लगा, भ्रम होगा। वह अगर कराहती होती तो एकाध आवाज और अवश्य सुनाई पड़ती। वह कराहनेवाली औरत है भी नहीं। रामनाथ के मरने पर भी उस तरह नहीं घिघियाई जैसे साधारण स्त्रियाँ ऐसे अवसरों पर तड़पा करती हैं।
मैं पुनः सोचने लगा। वह उस नालायक के लिए क्या नहीं करती थी! खिलौने की तरह, आराध्य की तरह, उसे दुलराती और सँवारती फिरती थी। पर आह रे छोकरे!
"माँ---"
फिर वही आवाज। जरूर जानकी रो रही है। जरूर वही विकल, व्यथित, विवश बिलख रही है। हाय री माँ! अभागिनी वैसे ही पुकार रही है जैसे वह पाजी गाकर, मचलकर, स्वर को खींचकर उसे पुकारता था।
अँधेरा धूमिल हुआ, फीका पड़ा, मिट चला। उषा पीली हुई, लाल हुई। रवि रथ लेकर वहाँ क्षितिज से उस छोर पर आकर पवित्र मन से खड़ा हो गया। मुझे लाल के पत्र की याद आ गई।
"माँ---"
मानो लाल पुकार रहा था, मानो जानकी प्रतिध्वनि की तरह उसी पुकार को गा रही थी। मेरी छाती धक् धक् करने लगी। मैंने नौकर को पुकारकर कहा, "देखो तो, लाल की माँ क्या कर रही है?"
जब वह लौटकर आया, तब मैं एक बार पुनः मेज और मेजिनी के सामने खड़ा था। हाथ में रबर लिए उसी उद्देश्य से। उसने घबराए स्वर से कहा, "हुजूर, उनकी तो अजीब हालत है। घर में ताला पड़ा है और वे दरवाजे पर पाँव पसारे, हाथ में कोई चिट्ठी लिए, मुँह खोल, मरी बैठी हैं। हाँ सरकार, विश्वास मानिए, वे मर गई हैं। साँस बंद है, आँखें खुलीं---"

# पांडेय बेचनशर्मा उग्र
साभार - कला का पुरस्कार (१९५५)
प्रकाशक: आत्माराम एण्ड संस

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

दवा नहीं, दर्द निवारक : आरक्षण

म्बेडकर जी के बारे में मैं ने बहुत कम पढ़ा है, एक स्कूली विद्यार्थी के बराबर। पर इतना जानता हूँ कि वे अत्यन्त प्रतिभाशाली थे। उन्होंने भारतीय संविधान की रचना की और उसे संविधान सभा से पारित कराया। वे दलित थे और दलितों की दमन से मुक्ति चाहते थे। उन्हों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। लेकिन धर्म परिवर्तन से भी दलित का दलितपन गया नहीं। यह तो पुराना अनुभव था। दलितों के मुसलमान बन जाने से उन का दलितपन नहीं गया था। भारत में जाति रस्सी जैसा बंधन है जिसे जला भी दिया जाए तो उस का बल नहीं जाता। उन का ही कमाल था कि दलितों और आदिवासियों को संविधान में आरक्षण मिला। 

इस आरक्षण से दलितों और आदिवासियों को एक अधिकार मिला लेकिन उन का दलितपन और आदिवासीपन और मजबूत हो गया। अब दलित आदिवासी दलित आदिवासी बने रहना चाहते हैं जिससे उन का अधिकार बना रहे। यही इस आरक्षण का साइड इफेक्ट है। आरक्षण के और भी अनेक साइड इफेक्ट्स हैं। जैसे आरक्षण दलित और आदिवासी जातियों का भेद तक नहीं मिटा सका। मेघवाल और बैरवा एक जैसी स्थिति की दलित जातियाँ हैं, लेकिन बैरवा खुद को मेघवालों से आज तक ऊँचा समझते हैं। मीणा खुद को भीलों से बहुत बेहतर मानते हैं। इस तरह आरक्षण की इस दवा ने आदिवासी दलित जातियों की जातिगत संरचना को सीमेंट पिला कर मजबूत किया है।

मूल समस्या थी कि दलितों आदिवासियों के लिए समाज में जो भेदभाव है वह समाप्त हो, लेकिन वह कमजोर भी नहीं हुआ, समाप्त होना तो बहुत दूर की बात है। देश की मूल समस्या तो बेरोजगारी है। लोगों को उन की योग्यता के अनुरूप काम मिलना अनिवार्य हो जाए, अर्थात सब को काम मिलने लगे तो आरक्षण को कोई नहीं पूछेगा। पर हमारी सत्ता ऐसा नहीं कर सकती। पूंजीवाद का एक पाया बेरोजगारी भी है। यदि बेरोजगारी कम होती है तो पूंजीवाद लड़खडाने लगता है। यदि बेरोजगारी बिलकुल समाप्त हो जाए तो वह इतना भुरभुरा जाए कि साधारण से धक्के से गिर पडे़गा। पूंजीवाद हमेशा सस्ती मजदूरी पर निर्भर करता है और सस्ती मजदूरी इस बात पर निर्भर करती है कि देश में बेरोजगारों की संख्या कितनी अधिक है।

आरक्षण दवा नहीं थी बल्कि दर्द निवारक (पेन रिलीवर) था। लेकिन इस ने लोगों को इस का एडिक्ट बना दिया है। जिन के पास ये है वे इसे छोड़ना नहीं चाहते। जिन के पास नहीं है वे उसे पाना चाहते हैं लेकिन उस की निन्दा करते हैं। आरक्षण से सुधरता कुछ नहीं है दलितों और आदिवासियों में जिसे यह सुविधा मिलती है वह खुद को दूसरे दलितों और आदिवासियों से अलग कर लेता है। ऐसे लोगों की नयी प्रजाति बन गयी है। 

एक आदिवासी की शादी हो गयी। बाद में वह इंजिनियर हो गया। उसे सरकारी संस्थान में नौकरी मिल गयी। शादी के कोई दस साल बाद मेरे पास आया बोला वह अपनी पत्नी से तलाक चाहता है क्यों कि उस की पत्नी पढ़ी लिखी नहीं है, दिन भर में दो बंडल बीड़ी पी जाती है, रहन सहन उस का आदिवासियों जैसा है वह उस के साथ नहीं रह सकता। मैं ने कहा कि हिन्दू विधि से उस का तलाक नहीं हो सकता। उस का तलाक तो केवल पंचायत ही स्वीकृत कर सकती है। उस के बाद ही अदालत तलाक की की डिक्री पारित कर सकती है। उस ने कहा वह तो मुश्किल है जाति पंचायत इसे नहीं मानेगी। फिर कोई दस साल बाद वह अफसर मुझे मिला तो उस के साथ पत्नी के रूप में उस से कोई पन्द्रह बरस छोटी आधुनिक महिला थी। मैं ने उस से पूछा तो बताया कि पंचों के मुहँ में चांदीा भरी तो तलाक हो गया।

आरक्षण के कारण गरीब सवर्णों को गरीब आदिवासी दलितों के आरक्षण के अधिकार के खिलाफ खड़ा करना आसान हो गया। अब हमारी व्यवस्था सवर्णों को गरीब आदिवासियों और दलितो से घृणा करना सिखाती है। उस घृणा का राजनीतिज्ञ इस्तेमाल करते हैं। वे उस घृणा कोऔर सींचते हैं, कम नहीं करते हैं। गरीब दलितों और आदिवासियों को आरक्षण से रोजगार नहीं मिलता। उसे तो पहले इन जातियों के पढ़े लिखे सम्पन्न लोग हथिया लेते हैं। पर व्यवस्था ने उन के कंधों पर बग्घी का जुआ चढ़ा कर जोत दिया है और आगे चारा लटका दिया है। वे चारा खाने को आगे बढ़ते हैं, बग्घी चलती रहती है और चारा उतना ही आगे सरकता जाता है। उस तक गरीब दलितों आदिवासियों का मुहँ कभी नहीं पहुंचता। 

अब स्थिति यह है कि आरक्षण भारतीय समाज के जी का जंजाल बन गया है। वह इलाज नहीं है, उस से बीमारी मिट नहीं रही है। बल्कि उस से आंशिक रूप से दर्द का अनुभव नहीं होता। लोग उस के एडिक्ट हो गए हैं। एडिक्शन से पीछा छुड़ाने के लिए बीमारी का इलाज ढूंढना होगा। इस बीमारी का इलाज है सब को रोजगार, रोजगार का मूल अधिकार और उस अधिकार की शतप्रतिशत पालना। यह सब पूंजीवादी सामंती व्यवस्था में संभव नहीं है क्यों कि उस के लिए बेरोजगारी का समाप्त होना साइनाइड जैसा जहर है।

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

हमारे सहजीवन की पहली सब से बड़ी खुशी

क सप्ताह पहले ही दादा जी हमारे बीच नहीं रहे थे। जैसे ही मुझे सूचना मिली मैं बाराँ के लिए रवाना हो गया। उत्तमार्ध शोभा मेरे साथ नहीं जा सकी। वह पूरे दिनों से थी। मैं अंत्येष्टी में शामिल हो कर वापस लौटा और तीसरे दिन फिर से अस्थिचयन में जा कर सम्मिलित हुआ। घर में यह विचारणीय हो गया था कि मुझे तुरन्त वापस लौटना चाहिए। ऐसे दिनों में शोभा को अकेला छोड़ना किसी भी तरह से उचित नहीं है। यूँ पहले अम्माँ का साथ आना तय था। लेकिन दादा जी के न रहने से परिवार में जो स्थितियाँ बनी थीं उन में उस का साथ आना संभव नहीं था। तो छोटी बहिन अनिता साथ आई। चार दिन बाद ही 23 मार्च का भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत का दिन था। पंजाब सभा भवन में शाम को बड़ी सभा थी। मुझे उस में जाना ही था। अनिता की भी इच्छा थी कि वह भी इस कार्यक्रम में जाए। शोभा से पूछा कि उन्हें कोई परेशानी तो नहीं? उस ने हमें कार्यक्रम में आने की अनुमति दे दी।
पूर्वा और हम दोनों

शहीद दिवस समारोह से वापस लौटते लौटते रात के साढ़े नौ बज गए थे। हम घर पहुँचे, भोजन किया उस के तुरन्त बाद ही शोभा ने कहा कि इसी वक्त अस्पताल चलना होगा। ईसाई मिशनरी का अस्पताल पास ही था। हम ने तुरंत आवश्यक तैयारी की और अस्पताल पहुँच गए। अस्पताल में प्राथमिक जाँच के बाद शोभा को भर्ती कर लिया गया। मुझे बताया गया कि अभी तुरंत कोई परिणाम आने वाला नहीं है हो सकता है दस-बारह घंटे लगें। अगले दिन सुबह ही मैं ने अपनी मौसी को भी सूचना दी और वे तुरन्त ही मेरे साथ अस्पताल चली आईं।  प्रातः शोभा को प्रसव पीड़ा होने लगी। उसे जाँच कर नर्स ने लेबर रूम में पहुँचाया। सुबह साढ़े नौ बजे नर्स ने सूचना दी कि बिटिया हुई है। मैं बड़ा प्रसन्न था। मैं चाहता था कि मेरी पहली सन्तान बेटी हो। मुझे मुहँ मांगी मुराद मिल गयी थी। 

पूर्वा
मामाजी को खबर हुई तो वे मामीजी को ले कर शाम के समय मिलने आए। मामाजी बोले- मैं अस्पताल जा कर क्या करूंगा। मामाजी घर पर ही रुके मैं मामीजी को शोभा और नवजात से मिलाने अस्पताल ले आया। करीब आधा घंटे बाद मामीजी को ले कर वापस घर पहुँचा तो मामा जी ने नवजात की जन्म कुंडली बना कर रखी हुई थी। मैं ने उसे देखा तो पता लगा कि उस के जन्म के समय चंद्रमा पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में स्थित था। तब तक मेरा दिमाग लगातार यह सोच रहा था कि नवजात कन्या का नाम क्या रखा जाए। यूँ जन्म नक्षत्र के हर चरण के लिए एक नामाक्षर का सुझाव दिया हुआ है। उस दृष्टि से उस का नाम सौ अक्षर से आरंभ होना चाहिए था। मामाजी ने 'सौदामिनी' नाम का सुझाव दिया था। नाम बहुत सुंदर था लेकिन मुझे कुछ बड़ा सा लग रहा था। मैं शोभा की तरह दो अथवा मेरे नाम की तरह तीन अक्षरों का नाम चाहता था। मैं ने बहुत विचार किया किन्तु सौ शब्द से कोई नाम न सूझा। आखिर मेरे दिमाग में पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र का पूर्वा शब्द अंकित हो गया। आखिर हम ने अपनी बेटी का नाम पूर्वा रखा। 

पूर्वा का एक जन्मदिन
दादाजी का द्वादशा और पहला मासिक श्राद्ध हो जाने के बाद अम्माँ भी कोटा आ गयी। कुछ दिन रह कर शोभा और पूर्वा दोनों को अपने साथ बाराँ ले गयी। करीब दो माह बाद जब शोभा इस स्थिति में आ गयी कि पूर्वा को संभालने के साथ साथ घर को भी देख सके तो ही कोटा वापस लौटी। तब तक पूर्वा इतनी बड़ी हो गयी थी कि मैं उसे संभाल सकता था। तब गर्मी के दिन आरंभ हो गए अदालतें सुबह की हो चुकी थीं। मैं अदालत से दोपहर 1-2 बजे तक घर आ जाता था।

पूर्वा और हम दोनों पिछली दीवाली पर
एक दिन अदालत से लौटा तो शोभा ने बताया कि पूर्वा को दस्त लगे हैं। मैंंने उलट कर पूछा कि ऐसा क्यों कर हो सकता है? मैं ने आयुर्वेद पढ़ा था तो मैं उस के उपचार के बारे में सोचने लगा। शोभा ने अपना अनुमान बताया कि बच्ची की पहली गर्मी है उसी के कारण इसे दस्त लगे हो सकते हैं। उन दिनों मैं रोज सुबह ब्राह्मी की सूखी पत्तियाँ और पोस्तदाना भिगो कर जाता था जिस से शाम को ठंडाई बनाई जा सके। मुझे तुरंत भीगी हुई ब्राह्मी याद आई मैं ने दो तीन पत्तियों को पानी से निकाला और उन्हेंं ठीक से निचोड़ कर आधा चाय के चम्मच के बराबर रस निकाला। यही रस मैं ने पूर्वा को पिला दिया और प्रतिक्रिया देखने लगा। असर यह हुआ कि पूर्वा के दस्त उस के बाद सामान्य हो गए। इस तरह उसे पहले शारीरिक उपद्रव से आराम मिला। मुझे उसी दिन यह अहसास हुआ कि आयुर्वेद के अध्ययन और बीएससी तक जीव विज्ञान पढ़ने से जितना ज्ञान मुझे मिला उस के आधार पर मैं कम से कम अपने परिवार की स्वास्थ्य रक्षा के लिए प्रारंभिक चिकित्सा कर सकता हूँ। इस काम में मुझे शोभा की भी मदद मिल सकती है। वह बचपन से अपने चिकित्सक पिता के साथ रही थी और आवश्यकता होने पर रोगियों की परिचर्या में उन की मदद करती थी। 


पूर्वा का पिछला जन्मदिन
पूर्वा ने हमें बहुत खुशियाँ दीं। उस ने अपने बचपन में हमें कभी तंग नहीं किया। वह अन्य बच्चों की तरह रोती भी न थी। रात को भी यदि उसे नीन्द न आ रही होती तो लेटे लेटे बस नीले रंग के नाइट बल्ब को ताकती हुई मुस्कुराती रहती और नीन्द आने पर चुपचाप सो जाती। बाद  में पूर्वा के कारण ही मेरा परिचय एक होमियोपैथी चिकित्सक से हुआ। करीब एक वर्ष तक आवश्यकता पड़ने पर हमारे चिकित्सक वही रहे। मुझे होमियोपैथी में रुचि हुई तो फिर होमियोपैथी भी सीखी। दोनों बच्चों के वयस्क होने तक हम ने उन की चिकित्सा अक्सर खुद ही की। अभी भी दोनों बच्चों के पास होमियोपैथी की दवाएँ रहती है जिस से वे आकस्मिकता होने पर तुरन्त खुद अपनी प्रारंभिक चिकित्सा कर सकें। उस का लाभ यह भी है कि अधिकांश शारिरिक उपद्रवों का उपचार इस प्रारंभिक चिकित्सा से ही हो जाता है। बहुत अधिक आवश्यकता होने पर नियमित चिकित्सक की सलाह और उपचार लिया जा सकता है। खैर उस की तफसील फिर कभी।


आज पूर्वा का जन्मदिन है। मेरे और शोभा के सहजीवन की पहली सब से बड़ी खुशी के आने का दिन। 

पूर्वा को जन्मदिन पर असीम शुभकामनाएँ और बधाइयाँ!

शनिवार, 18 मार्च 2017

पेरिस कम्यून : पूरी दुनिया के सर्वहारा का ध्येय


पेरिस कम्यून जिन्दाबाद!
पेरिस कम्यून की स्थापना में मार्क्स का सीधे हाथ नहीं था. मगर प्रेरणा उसी की थी.अपने ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ की शुरुआत ही उसने इस वाक्य से की थी कि मानव-सभ्यता का अभी तक का इतिहास वर्ग-संघर्ष का रहा है. वह पूंजीवाद को सामंतवाद का ही परिष्कृत-परिवर्तित रूप मानता था. कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने तर्क द्वारा समझाने का प्रयास किया था कि अपनी पूर्ववर्ती सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों की भांति पूंजीवाद भी सामाजिक असंतोष को बढ़ावा देने वाला सिद्ध होगा, जो अंततः सामाजिक संघर्ष और उसके विखंडन का कारण बनेगा. उसे विश्वास था कि एक न एक दिन समाजवादी व्यवस्था पूंजीवाद को अपदस्थ कर अपना स्थान बनाने में कामयाब सिद्ध होगी, जो एक वर्गहीन, राज्य-विहीन समाज की जननी होगी. तभी पूर्णसमाजवाद का सपना सत्य हो सकेगा. उस अवस्था को मार्क्स ने ‘विशुद्ध साम्यवाद’ की संज्ञा दी थी. सामान्य रूप से समाजवाद और साम्यवाद को एक ही समझा जाता है. मार्क्स की दृष्टि में साम्यवाद ‘श्रमिक-राज्य’ अथवा ‘श्रमिक गणतंत्र’ के बाद की अवस्था है. श्रमिक-राज्य को वह ‘श्रमिकों की तानाशाही’ पूर्ण व्यवस्था भी मानता था, उसमें समस्त निर्णय श्रमिकों द्वारा, श्रमिकों के हित में लिए जाते हैं. मार्क्स का मानना कि वर्ग संघर्ष के दौर में श्रमिक पूंजीपतियों के सत्ता छीनकर उसपर कब्जा कर लेंगे. वह वांछित परिवर्तन का पहला चरण होगा. दूसरे चरण में श्रमिक-शासित राज्य वर्गहीन-राज्यविहीन समाज की आधारशिला रखेगा. पेरिस कम्यून वास्तव में श्रमिकों द्वारा गणतांत्रिक पद्धति पर अनुशासित, वर्गविहीन अवस्था थी. हालांकि नेतष्त्व और अनुभव की कमी के कारण वह प्रयोग मात्र दो महीने तक ही चल सका था, मगर इतने कम समय में ही उसने पूंजीवाद के समानांतर जिस वैकल्पिक व्यवस्था का स्वरूप प्रस्तुत किया, वह कालांतर में दुनिया-भर के समाजवादी प्रयोगों का प्रेरक बना.


फ्रांस और प्रूशिया के युद्ध में फ्रांस की पराजय से वहां के आम नागरिकों के बीच जहां शासकवर्ग के प्रति आक्रोश की लहर थी. ऊपर से युद्ध के बाद बेरोजगारी और महंगाई की मार से जनजीवन अकुलाया हुआ था. घोर अराजकता का वातावरण था. अव्यवस्था के वातावरण में लोगों का तत्कालीन शासकों से भरोसा ही उठ चुका था. उल्लेखनीय है कि जुलाई 1870 में प्रूशिया से युद्ध की पहल तत्कालीन फ्रांसिसी सम्राट नेपोलियन तृतीय द्वारा की गई थी. बिना किसी तैयारी के युद्ध की घोषणा कर देना, सिर्फ एक राजसी सनक थी, जिसके कारण सम्राट को अंततः पराजय का मुंह देखना पड़ा. सितंबर आते-आते पेरिस का जनजीवन अस्तव्यस्त हो चला था. युद्ध के कारण अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी चौड़ी हो चुकी थी. सूदखोर व्यापारी युद्ध की स्थितियों का लाभ उठाकर मनमाने तरीके से लूट मचा रहे थे. भोजन की काफी किल्लत थी. प्रशासन के स्तर पर पूरी तरह अराजक स्थिति थी. जनसाधारण की कोई सुनने वाला न था. ऊपर से प्रूशिया की सेनाओं द्वारा बमबारी और फ्रांसिसी सैन्यबलों की नाकामी से श्रमिक-असंतोष विद्रोह ही स्थिति तक जा पहुंचा था.

सेना में उच्चस्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार, सैनिकों के कमजोर मनोबल तथा हताशा के कारण फ्रांस का पतन हुआ. पराजित फ्रांसिसी सम्राट को जर्मनी के सम्राट के आगे, उसकी शर्तों पर युद्धविराम के लिए विवश होना पड़ा. इससे तुरंत बाद जर्मन सैनिकों ने नगर में विजेता के दंभ के साथ प्रवेश किया. पेरिसवासियों के मन में प्रूशियावासियों और जर्मन साम्राज्य के प्रति बेहद नाराजगी थी. लोग भीतर ही भीतर सुलग रहे थे. स्थानीय नागरिकों ने मिलकर एक ‘राष्ट्रीय सुरक्षादल’ का गठन किया था. उसने सदस्यों में अधिकांश श्रमिक और कारखानों में काम करने वाले कारीगर थे. नागरिक सेना का नेतृत्व प्रगतिशील समाजवादी नेताओं के अधीन था. नागरिक सेना के प्रति जनसाधारण के समर्थन और विश्वास का अनुमान मात्र इसी से लगाया जा सकता है कि स्वयंसेवी सैनिकों की संख्या रातदिन बढ़ रही थी. स्त्री, बच्चे और बूढ़े जो लड़ाई में सीधे हिस्सा लेेने में असमर्थ थे, वे भी अपने अनुकूल काम खोज रहे थे, ताकि अवसर पड़ने पर दुश्मन से लोहा रहे राष्ट्रीय सुरक्षाकर्मियों को मदद पहुंचा सकें.

इस बात की अफवाह भी उड़ रही थी कि जर्मन सम्राट नगर में घुसने के बाद नागरिकों पर आक्रमण भी कर सकता है, उसके बाद नगर राजशाही के अधीन होगा. फरवरी 1871 का चुनाव भी राजशाही को बढ़ावा देने का संकेत देता था. ऐसी अफवाहें लोगों के गुस्से को परवान चढ़ाने के लिए पर्याप्त थीं. पेरिसवासी वैसे भी निडर थे. युद्ध उनके लिए कोई नई बात न थी. वर्षों से वे स्वशासन और आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ते आ रहे थे. इसलिए जर्मन सम्राट के सैन्यबल के साथ नगर-प्रवेश के पूर्व ही उसके विरोध की तैयारियां हो चुकी थीं. नागरिक सेना के विद्रोह को जनसाधारण के समर्थन का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि सेना का सशस्त्र विरोध करने के लिए आवश्यक तोपों और हथियारों की खरीद के लिए पेरिस के सामान्य नागरिकों ने भी चंदा दिया था. जर्मन सम्राट के प्रवेश से पहले ही तोपें उपयुक्त स्थान पर अच्छी तरह से तैनात कर दी गई थीं. उनके संचालन के लिए नागरिक सैनिक तैयार किए जा रहे थे. ऊंचाई पर स्थित मोंटमेंट्री नामक स्थान को विद्रोह के प्रमुख ठिकाने के रूप में चुना गया था. वह सामरिक दृष्टि से भी अनुकूल था. उसके चारों ओर मजदूर बस्तियां थीं, निवासियों में से अधिकांश नागरिक सेना के प्रति समर्पित थे.

सारी तैयारी इतनी गुपचुप और भरोसेमंद थी कि भारी-भरकम सैन्यबल के साथ नगर-प्रवेश की तैयारी कर रहे जर्मन-सम्राट को इसकी खबर तक न लगी थी. गणतंत्र के अभ्यस्त हो चले पेरिसवासियों को राजशाही के नाम से ही चिढ़ थी. इसलिए जर्मन सेना से निपटने के लिए भीतर ही भीतर तैयारी चल रही थी. जर्मन की जंगी सेना के मुकाबले साधनविहीन, लगभग हार के मुहाने पर खड़े पेरिस- वासियों के मन में अपनी अस्मिता, मान-सम्मान और आजादी के प्रति इतना गहरा अनुराग था कि लोग नागरिक सेना में भर्ती होने उमड़े आ रहे थे. उनमें स्त्री-पुरुष, बूढ़े और बच्चे हर वर्ग के लोग थे, जो स्वेच्छा से मर-मिटने को तैयार थे. हर कोई ‘अपना राज’ चाहता था तथा उसके लिए यथासंभव बलिदान देने को उत्सुक था.

अस्थायी सरकार के मुखिया एडोल्फ थीयर को मालूम था कि राजनीतिक अस्थिरता और उथल-पुथल का लाभ उठाकर नागरिक सुरक्षादल ने वैकल्पिक शक्तिकेंद्र बना लिए हैं. आमजनता का उन्हें संरक्षण प्राप्त है. उसकी मुख्य चिंता थी कि हथियारबंद नागरिक सुरक्षादल के साथ-साथ श्रमिक-कामगार भी हथियार उठा सकते हैं, जिससे क्रुद्ध होकर जर्मन सेना नगर में तबाही मचा सकती है. इस बीच जर्मन सेना अल्प समय के लिए पेरिस में आई और समस्त आशंकाओं पर पानी फेरते हुए वहां से शांतिपूर्वक प्रस्थान कर गई. बावजूद इसके पेरिस का वातावरण गरमाया रहा. नगर के अशांत वातावरण से बचने के लिए नवनिर्वाचित राष्ट्रीय असेंबली ने बार्डोक्स के बजाय, उससे मीलों दूर पेरिस के दक्षिण-पश्चिम में स्थित वर्सेलाइस को अपना सम्मेलन-स्थल बनाने का निर्णय किया. सम्मेलन के लिए अधिकांश नेताओं के पेरिस से प्रथान कर जाने से वहां राजनीतिक शून्य पैदा हो गया. नेशनल असेंबली के सदस्यों में से

अधिकांश राजशाही और साम्राज्यवाद के के समर्थक थे. दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन में लोकतंत्र समर्थकों का वर्चस्व था. असेंबली के सदस्यों के वर्सेलाइस प्रस्थान करते ही स्थानीय प्रशासन पर उनकी पकड़ ढीली पड़ गई. दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षादल की केंद्रीय समिति में सुधारवादियों का अनुपात और उनका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. हालात का अनुमान लगाते हुए सरकार ने निर्णय लिया कि सेना की चार सौ तोपों को नागरिक सुरक्षादलों के अधिकार में रखना सामरिक दृष्टि से उचित नहीं है. अतएव 18 मार्च को जनरल थीयर ने सेना को आदेश दिया कि वह मोंटमेंट्री की पहाड़ियों तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर तैनात तोपखाने को अपने अधिकार में कर ले. मगर कुछ ही दिन पहले जर्मन सेना से भारी पराजय झेल चुके सैनिकों का मनोबल बहुत गिरा हुआ था. अपने ही लोगों का सामना करने का उनमें साहस न था. विवश होकर नागरिक सुरक्षादल के स्वयंसेवकों तथा स्थानीय नागरिकों को भी उस टुकड़ी में शामिल करना पड़ा, जिनके मन में सरकार के प्रति पहले ही आक्रोश भरा था.

सरकारी तोपखाने को अपने कब्जे में लेने के लिए वह टुकड़ी जैसे ही मोंटमेंट्री पहुंची, स्थानीय नागरिक और सुरक्षाकर्मी भड़क गए. क्लाउड मार्टिन लेकाम्टे सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व कर रहा था, उसने अदूरदर्शिता और नासमझी का प्रदर्शन करते हुए सुरक्षाबलों और स्थानीय जनता पर गोलीबारी का आदेश सुना दिया. जिससे लोग भड़क गए. भीड़ ने लेकाम्टे तथा जनरल थाॅमस को उनके घोड़ों से खींच लिया. उत्तेजित नागरिक सैनिकों ने दोनों को वहीं गोली से उड़ा दिया. बुजुर्ग जनरल था॓मस कभी नागरिक सुरक्षादल का कमांडर होता था, मगर अवसरवादी रुख अपनाते हुए वह राजशाही के पक्ष में चला गया था. उत्तेजित भीड़ ने उसको भी वहीं दबोच लिया. विद्रोहियों का रुख पहचानकर सेना भी उनके साथ मिल गई. जनरल थीयर ने पेरिस को खाली कराने का आदेश दिया. तब तक विद्रोही पूरे शहर में फैल चुके थे. स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में उनका साथ दे रहे थे. सेना का कहीं अता-पता न था. उधर एक सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करना हुआ जनरल थीयर वर्सेलाइस के लिए प्रस्थान कर चुका था. इससे लोगों में संकेत गया कि वह घबराकर भागा है. इसके फलस्वरूप नागरिक सेना का मनोबल और भी बढ़ गया. यद्यपि जनरल थीयर ने बाद में दावा किया था कि पेरिस से हटना उसकी एक रणनीतिक चाल थी, तथापि उस समय नागरिकों और सुरक्षाबलों ने माना कि आसन्न पराजय से क्षुब्ध होकर पेरिस से भागा है.

पेरिस के चप्पे-चप्पे पर नागरिक सुरक्षाकर्मी छाए हुए थे. शासक के रूप में मात्र नागरिक सुरक्षादल तथा उनकी केंद्रीय समिति थी. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने गणतांत्रिक पद्धति के अनुरूप शासन चलाने का निर्णय लिया. आनन-फानन में लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थकों तथा श्रमिक नेताओं की बैठक बुलाई गई. आमचुनावों के लिए 26 मार्च, 1871 का दिन तय कर दिया गया. स्थानीय प्रशासन को व्यवस्थित रूप देते हुए 92 सदस्यीय कम्यून-परिषद का गठन किया गया. उसमें बड़ी संख्या दक्ष कामगारों और श्रमिक नेताओं की थी. उनके अलावा परिषद में डाॅक्टर, पत्रकार, नर्स, अधिवक्ता, अध्यापक जैसे पेशेवर, राजनीतिक कार्यकर्ता, सुधारवादी नेता, छोटे उद्यमी, उदार धर्मपंथी तथा समाजवादी नेता सम्मिलित थे. जर्मन सम्राट की सेना और उसके सभी सैनिक अवसर देखकर पेरिस छोड़ चुके थे. नगर पूरी तरह से विद्रोही नागरिक सेना के अधिकार में था.

इस अचानक सत्ता परिवर्तन का अनुमान न तो सरकार को था, न ही नागरिक सुरक्षाबलों को. इसलिए अप्रत्याशित परिवर्तन के बाद की स्थितियों के लिए कोई तैयार न था. प्रशासन को समाजवादी विचारधारा के अनुरूप, नए सिरे से गठित करने की आवश्यकता थी, जिसका सैनिकों और कार्यकर्ताओं को अनुभव ही नहीं था. उन्हें विश्वास था कि कि लुईस ब्लेंक और उसके समर्थक, अराजकतावादी-समाजवादी विचारक लुईस अगस्त ब्लेंकी प्रशासन और नागरिक सेना की बागडोर संभालेंगे तथा बदले हुए वातावरण में सबसे प्रभावी क्रांतिनेता सिद्ध होंगे. मगर नागरिक सेना का दुर्भाग्य रहा कि 17 मार्च के दिन ब्लेंकी को भी गिरफ्तार कर लिया गया. जीवन के बाकी दिन उसको जेल ही में बिताने पड़े. एक सौदे के रूप में कम्यून के नेताओं ने ब्लेंकी के प्रत्यार्पण के बदले पेरिस के पुजारी डारबी तथा 74 अन्य युद्धबंदियों को छोड़ देने का आश्वासन दिया, मगर थीयर ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. तो भी नागरिक सुरक्षाबलों तथा आंदोलनकर्मियों के अनुशासन में 28 मार्च को पेरिस कम्यून में ढल गया. वर्गहीन-राज्यविहीन समाज गढ़ने की कोशिश में सभी स्थानीय निकायों को भंग कर दिया. अनुभव की कमी के बावजूद समाजवादी आंदोलन के इतिहास में पेरिस कम्यून को मिली कामयाबी अद्वितीय और चामत्कारिक थी.

क्रांति की सफलता और सुनिश्चितता के लिए जनजीवन को पटरी पर लाना अत्यावश्यक था. अतएव केंद्रीय परिषद ने जनसुविधाओं की बहाली और प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए कई कदम उठाए, जिसके कारण पेरिसवासियों को आजादी का एहसास हुआ. मगर युद्ध के बाद अस्त-व्यस्त हो चुके जनजीवन को सहेजने के लिए बड़े पैमाने पर नागरिक सुविधाओं की जरूरत थी. इसलिए उनकी बहाली हेतु सार्थक कदम उठाए गए. पेरिस के उन विद्रोही समाजवादियों, लोकसेवकों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर बहुत कम, मात्र दो महीने ही मिल पाया. किसी भी व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त कर पटरी पर वापस लाने के लिए इतना समय नगण्य होता है. तो भी इस अवधि में कम्यून के संचालकों ने आपसी सहमति और सर्वकल्याण की भावना के साथ कई महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए थे, जो आगे चलकर समाजवादी व्यवस्था के प्रेरणास्रोत बने—

क. राज्य और धर्मस्थलों को एक-दूसरे से असंबद्ध करना.

ख. जितने समय तक नगर का कामकाज ठप्प रहा था, उस अवधि का किराया पूरी तरह माफ माफ करना.

ग. पेरिस स्थित सैकड़ों बेकरियों में रात की ड्यूटी करने पर पाबंदी. उनमें बड़ी संख्या में स्त्री और बच्चे काम करते थे.

घ. अविवाहित जोड़ों तथा ड्यूटी के दौरान मारे गए नागरिक सैनिकों के लिए पेंशन की व्यवस्था करना.

ङ. युद्धकाल में श्रमिकों द्वारा गिरवी रखे गए औजारों और घर के साज-सामान की बिना किसी अदायगी के वापसी.

च. कम्यून का विचार था कि अधिकांश दक्ष कारीगरों को युद्धकाल अपने औजार गिरवी रखने के लिए विवश किया गया था.

छ. वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए गए ऋण पर भुगतान को स्थगित करना तथा सभी प्रकार के ऋणों पर देय ब्याज से मुक्ति.

ज. कारखाना मालिकों द्वारा छोड़े गए तथा निष्क्रय पड़े कारखानों को श्रमिकों को चलाने का अधिकार. यद्यपि पूर्व कारखाना मालिकों को क्षतिपूर्ति के रूप में समुचित भत्ता मांगने का अधिकार दिया गया था.

चर्च को राज्य से अलग करने का परिणाम यह हुआ कि उसकी समस्त परिसंपत्तियां जनता के स्वामित्व में आ गईं. पाठशालों में धार्मिक गतिविधियों का आयोजन तत्काल प्रभाव से बंद करा दिया गया. चर्च की धार्मिक गतिविधियों को सीमित करने का भी प्रयास किया गया. वे अपनी धार्मिक गतिविधियां उसी अवस्था में चला सकती थीं, जब उन्हें शाम के समय राजनीतिक बैठकों के लिए खुला रखा जाए. यह जीवन में धर्म के हस्तक्षेप को न्यूनतम करने तथा उसके नाम पर संरक्षित संसाधनों का व्यापक लोकहित में उपयोग करने की दूरदर्शी योजना थी. शिक्षा में सुधार और सभी के लिए निःशुल्क और अनिवार्य तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था भी की गई. स्पष्ट है कि आंदोलनकारियों द्वारा पेरिस कम्यून को पूर्णतः वर्गहीन समाज के अनुरूप गढ़ने का प्रयास किया गया था.

पेरिस कम्यून के गठन की घटना को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि उसके माध्यम से फ्रांस में पहली बार स्त्री-शक्ति का ओजस्वी रूप सामने आया. यद्यपि रूसो(1712—1778) अठारहवीं शताब्दी में ही स्त्री समानता का समर्थन कर चुका था. बाद में फ्यूरियर ने उस आंदोलन को आगे बढ़ाने काम किया. उसी ने ‘फेमिनिज्म’ जैसा सार्थक शब्द गढ़ा. फ्यूरियर की ही प्रेरणा पर महिला श्रमिकों ने आगे बढ़कर ‘अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन’ की सदस्यता ग्रहण की थी. पेरिस की आजादी के संघर्ष में भी महिला आंदोलनकारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. उनमें से एक थी पेशे से जिल्दसाज, नेथाली लेमल. समाजवादी विचारों में आस्था रखने वाली नेथाली ने ऐलिजाबेथ डिमीट्रिफ के साथ मिलकर पेरिस की आजादी के लिए महिला संगठन बनाया था. उसका नाम था—‘पेरिस की सुरक्षा तथा घायलों की देखभाल के लिए महिला संगठन.’ डिमीट्रिफ अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रूसी शाखा की सदस्य रह चुकी थी और उन दिनों रूस से निर्वासन की सजा भोग रही थी. कुछ ही दिनों बाद इस संगठन को स्त्रीवादी लेखक आंद्रे लियो का भी समर्थन मिल गया. लियो पित्रसत्तात्मकता को पूंजीवाद को प्रश्रय देने वाली व्यवस्था मानते थे. उन्हें विश्वास था कि पित्रसत्तात्मकता के विरुद्ध उनका अभियान कालांतर में पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा बनेगा. नेथाली द्वारा गठित संगठन की मुख्य मांगें थीं—‘स्त्री समानता तथा समान मजदूरी’. इनके अलावा तलाक का अधिकार, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, संसाधनों में समान भागीदारी आदि भी स्त्रीवादियों की मांग में सम्मिलित थे. संगठन ने विवाहिता स्त्री और रखैल के बीच अंतर को मिटाने के साथ-साथ उनकी संतानों के बीच भेदभाव खत्म करने की मांग भी थी. आशय यह है कि पेरिस कम्यून का वातावरण पूरे समाज को नई चेतना सराबोर कर रहा था.

नागरिक संगठन एक ओर सामूहिक जीवन को समृद्ध बनाने के लिए निरंतर नए प्रयास कर रहे थे, उधर पू्रशिया सरकार थीयर की मदद के लिए हाथ बढ़ा चुकी थी. उसी की मदद से पूरे पेरिस की घेराबंदी कर दी गई. अंततः 21 मई को थीयर के नेतृत्व में संयुक्त सेना ने पश्चिमी दरवाजे से नगर पर हमला बोल दिया. नागरिक सुरक्षाकर्मियों ने आम जनता की मदद से उन्हें रोकने का प्रयास किया. क्रुद्ध होकर प्रूशिया के सैनिकों ने कत्लेआम मचा दिया. पेरिस के चप्पे-चप्पे पर नागरिकों और सैनिकों के बीच घमासान युद्ध छिड़ा था. लोग राजशाही के अधीन रहने के बजाय स्वाधीन रहते हुए जान देना ठीक समझते थे. नगर के पूर्वी सिरे पर मजदूर बस्तियां थी. कम्यून की जीवनशैली में उन्हें सम्मानजनक अवसर मिले थे. इसलिए पू्रशिया और जनरल थीयर के सैनिकों का सर्वाधिक विरोध भी उसी ओर था. गरीब मजदूर जी-जान से संघर्ष कर रहे थे. मगर हथियारों की कमी और युद्धनीति की जानकारी का अभाव उनकी सफलता के आड़े आया. धीरे-धीरे श्रमिक सेना कमजोर पड़ने लगी. 28 मई, 1871 को आखिरकार पेरिस फिर से राजशाही के अधीन चला गया. क्रुद्ध सैनिकों ने खूब कत्लेआम किया. लेक्समबर्ग के बागों और लोबाउ छावनी में विशेषरूप से बनाई गई कत्लगाहों में हजारों विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया गया. करीब 40,000 से अधिक युद्धबंदियों को निष्कासन की सजा सुनाई गई. आमजनता यहां तक कि स्त्रियों और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया.

सैनिकों ने हजारों स्त्रियों-बच्चों को अमानवीय अवस्था में भूखे-प्यासे कैद में रखा.

पेरिस पर सेना का कब्जा हो जाने के बाद 12,500 नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों पर मुकदमा चलाया गया. उनमें से 10,000 को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई गई, 23 को फांसी पर चढ़ा दिया गया. लगभग 4,000 को न्यू सेल्डोनिया में निर्वासित कर दिया गया. बाकी को कैद की सजा हुई. सेना द्वारा सामूहिक नरसंहार के उस सप्ताह में कुल कितने लोगों को मौत के घाट उतारा गया, इसका सही-सही आकलन आज तक नहीं हो पाया है. बेंडिक्ट एंडरसन के अनुसार उस ‘खूनी सप्ताह’ के भीतर पकड़े गए लगभग 20,000 सैनिकों में से कुल 7,500 को सजा सुनाई गई. जबकि कुछ विद्वान इस संख्या को 50,000 से भी अधिक बताते हैं. यहां उल्लेख करना आवश्यक है कि हालांकि पेरिस कम्यून की अवधारणा मार्क्स के सिद्धांत के अनुकूल थी. इसके पीछे कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो की प्रेरणा भी थी. बावजूद इसके पेरिस कम्यून में हुए खून-खराबे से मार्क्स को गहरा धक्का पहुंचा था, जिससे उसने खुद को लेखन और अध्ययन के प्रति समर्पित कर दिया.

पेरिस कम्यून में भारी उद्योगों का संचालन मजदूर संघों के समन्वित प्रयासों द्वारा लोकतांत्रिक आधार पर संभव होता था. सभी उद्योग एक श्रमिक महासंघ के अधीन संचालित होते थे. वह पूरी तरह एक वर्गहीन समाज था, जिसमें न पुलिस बल था, न जेल, न किसी प्रकार की हिंसा को वहां स्थान था. उत्पादन के स्रोतों में सबका साझा था. ऐसे वातावरण में वहां कोर्ट-कचहरी, जज-मुन्सिफ वगैरह की भी आवश्यकता नहीं थी. सरकार के सभी पदों का चुनाव लोकतांत्रिक परिषद द्वारा किया जाता था. सामंतवाद और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में निचले और ऊपर के स्तर पर व्याप्त वेतनमान की असंगतियों को दूर करने की ईमानदार कोशिश की गई थी. चयनित अधिकारियों को भी कामगारों की औसत मजदूरी के बराबर वेतन प्राप्त होता था. कर्तव्य में कोताही बरतने, किसी भी प्रकार का आरोप सिद्ध होने पर उन्हें वापस बुलाया जा सकता था. यूजेन पोत्येर नामक एक कामगार ने कम्यून के जीवन पर एक कविता लिखी थी, जिसका आशय है—

‘सुबह जो नाला साफ करता है, वह दस बजे आकर आफिस में बैठता है, कोर्ट में जज बनता है, शाम को आकर कविता लिखता है.’

समाजवाद के पहले प्रयोग के रूप में ख्यात पेरिस कम्यून का जीवनकाल मात्र 70 दिन रहा, वह प्रयोग एक समानता-आधारित समाज का प्रतीक माना गया. मगर मार्क्स और उसके मित्र ऐंगल्स को उसी से संतुष्टि नहीं थी. उनकी आंखों में साम्यवाद और पूर्णतः वर्गहीन समाज का सपना बसा था. कम्यून-व्यवस्था को वे नौकरीपेशा मजदूरों (बुर्जुआ वर्ग) की तानाशाही मानते थे. उनका तर्क था कि, ‘राज्य और कुछ नहीं, बल्कि एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण का अवसर देने वाली मशीन है…’ दोनों का विश्वास था कि श्रमिक-क्रांति द्वारा विनिर्मित ‘नवीन एवं मुक्त सामाजिक परिवेश में एक दिन सभी साहूकारों, पूंजीपतियों को कूड़े के ढेर में बदला जा सकेगा.’9 पेरिस कम्यून साम्यवाद की स्थापना का पहला चरण था. सरकार के भारी बलप्रयोग द्वारा समाप्त कर दिया गया, मगर समाजवादी व्यवस्था का जो रास्ता उसने दिखाया, वही आगे चलकर मार्क्स और ऐंगल्स के वैज्ञानिक समाजवाद के रूप में विकसित हुआ था, जिसने कुछ दशकों में ही दुनिया के लगभग आधे देशों में अपनी अच्छी-खासी पैठ बना ली.

पेरिस कम्यून की असफलता के पीछे मजदूर नेताओें के आपसी मतभेद भी थे. उनमें से हर कोई क्रांति का श्रेय स्वयं लेना चाहता था. इनमें मार्क्स और बकुनाइन के मतभेद भी जगजाहिर हैं. पेरिस क्रांति के बड़े नेताओं में से एक बकुनाइन का मानना था कि मार्क्स जर्मन मूल का घमंडी यहूदी है. तानाशाही उसके स्वभाव का स्वाभाविक हिस्सा है. इसलिए वह फस्र्ट इंटरनेशनल के माध्यम से श्रमिकों को अपनी तरह से हांकना चाहता है. दूसरी ओर मार्क्स मानता था कि सर्वहारा वर्ग को अपना राजनीतिक दल स्वयं गठित कर, अन्य राजनीतिक दलों को राजनीति के मैदान में ही टक्कर देनी चाहिए. बकुनाइन और उसके समर्थकों के लिए पेरिस कम्यून वांछित परिवर्तन की दिशा में क्रांतिकारी कदम था, जिसके माध्यम से वे सोचते थे कि मार्क्स द्वारा कल्पित ‘आधिकारिक साम्यवाद’ को जवाब दिया जा सकता है. इस तरह वे मार्क्स की उस छवि को धूमिल करना चाहते थे, जो कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो के बाद बुद्धिजीवियों और श्रमिकों के बीच बनी थी.

बहरहाल मार्क्स और बकुनाइन के समर्थकों के बीच विवाद बढ़ता ही बढ़ता ही गया, जिसके परिणामस्वरूप बकुनाइन को ‘फस्र्ट इंटरनेशलन’ से निष्कासित होना पड़ा. मगर विवाद का यहीं अंत नहीं था. बकुनाइन के निष्कासन के बाद भी विवाद थमा नहीं था. परिणामस्वरूप श्रमिक नेताओं और विचारकों में फूट बढ़ती ही गई. जिस ऊर्जा और बौद्धिक क्षमता का उपयोग क्रांति को सफल बनाने के लिए किया जाना चाहिए था, वह लगातार कमजोर पड़ता चलता गया. इससे लोगों का विश्वास अपने नेताओं से उठता चला गया. मार्क्स भी इससे काफी निराश हुआ. परिणाम यह हुआ कि उसने स्वयं को अध्ययन और लेखन के प्रति समर्पित कर दिया. जो हो, मार्क्स का सपना आज भी मरा नहीं है. पूंजीवाद के इस इस घनघोर जंगल में, इस शोषणकारी व्यवस्था में आज भी उसकी प्रासंगिकता पूर्वतः बनी हुई है. 
श्री ओम प्रकाश कश्यप के ब्लाग आखरमाला से साभार ...

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

अपने घर के आसपास

 
ल अपने गृह नगर बाराँ में था। अपने घर के बिलकुल पास के तीन चित्र साझा कर रहा हूँ। पहले चित्र में कल्याणराय मंंदिर का मुख्य द्वारा है। यह बाराँ नगर का सब से बड़ा मंदिर कहा जाता है। राजस्थान सरकार का देवस्थान विभाग इस की व्यवस्था का संचालन करता है। पुरातत्व विभाग ने इसे सुरक्षित निधि घोषित कर रखा है। इस चित्र में एक व्यक्ति दरवाजे के सामने सड़क पर आता हुआ दिखाई दे रहा है। इस व्यक्ति के दाहिने हाथ की ओर दो दुकानें हैं और उन के ऊपर एक मकान है। यही मकान हमारा घर है। इस मकान में मैं ने आठवीं कक्षा से ले कर एलएलबी तक की पढ़ाई की और एक साल वकालत भी। बाद में मैं कोटा चला आया।

इस चित्र के आते हुए व्यक्ति के बाएँ हाथ की ओर कौर्नर पर एक दुकान है जिस का स्वामित्व नगर पालिका का है। इस दुकान के एक तरफ सड़क पर नाली के किनारे घास भैरव की गोल प्रतिमा होती थी और दुकान में एक सार्वजनिक वाचनालय चलता था। जहाँ मुहल्ले के लोग अखबार और पत्रिकाएँ पढ़ते थे। धीरे धीरे जैसे टीवी का प्रचलन बढ़ा यहाँ पाठक कम हुए और वाचनालय बंद हो गया। एक दिन कुछ लोगों ने दुकान का ताला तोड़ कर वहाँ भैरूजी की प्रतिमा रख दी। भैरूजी नाली के किनारे से दुकान में प्रतिष्ठित हो गए। एक पढ़ने लिखने के केन्द्र का बन्द होना और वहाँ भैैरव प्रतिमा का स्थापित होना किस तरह की प्रगति का परिचायक हो सकता है आप समझ सकते हैं। इस घटना का उल्लेख संकेत रूप में शिवराम की हाडौती कविता कोड़ा जमालशाई में देखने को मिलता है।

बेमारी की काँईं फकर, मरबा को काँईं गम
गाँव मँ सफाखानो, न होवे तो काँईं गम
द्वायाँ बेकार छै, जोत भैरू जी की बोल भाई
कोड़ा जमाल साई ....


दूसरा चित्र उसी दुकान का है जो अब भैरव मंंदिर है। कल जब मैं ने यह चित्र लिया तो एक व्यक्ति भैरव प्रतिमा का श्रंगार कर रहा था। प्रतिमा के गोल मटोल पत्थर पर सिन्दूर चढ़ा कर उस पर काले चमकीले कागज से नाक, कान, मूँछें वगैरा बना कर उसे मानवीय रूप दिया जा रहा था।

पहले चित्र में एक स्थान पर हरे रंग की दीवार नजर आ रही है। जिस पर जाम लिखा हुआ पढ़ा जा सकता है। यहाँ जामा मस्जिद लिखा है। यह वाकई जामा मस्जिद है। मंदिर और मस्जिद की दीवारें आपस में मिली हुई हैं। इसी मुहल्ले में कुल डेढ़ सौ मीटर के दायरे में एक गुरूद्वारा, एक और बड़ा हिन्दू मंदिर, एक जैन मंदिर और दाऊदी बोहरों की मस्जिद है। सुबह रात तक समय समय पर नगाड़ों, अजान, कीर्तन, भजन आदि की आवाजें गूंजती रहती हैं।

तीसरे चित्र में पृष्ठ भाग में एक पीपल का विशाल वृक्ष दिखाई पड़ता है। यह मेरे सामने ही उगा था जो अब इतना बड़ा हो गया है। इस की उम्र पचास वर्ष के लगभग की है। पीपल के पेड़ के ठीक नीचे भैरव मंदिर दिखाई दे रहा है। जिस तरह मंदिर गुलाबी रंग में रंगा है उसी तरह एक और मकान गुलाबी रंग में रंगा हुआ है। यही हमारा घर है। गुलाबी घर के ऊपर पीले रंग की एक और इमारत दिखाई पड़ती है। यह एक और बड़ा हिन्दू मंदिर है। मेरे दादाजी इसी मंदिर के पुजारी हुआ करते थे। चौक में एक व्यक्ति जमीन पर फूल मालाएँ बेच रहा है उस के ठीक सामने एक डंडा गड़ा हुआ है। यह होली का डंडा है। ठीक होली के दिन तक यहाँ लकड़ी व अन्य जलाई जाने वाली वस्तुएँ और कचरे का बड़ा ढेर होगा। यह शहर की सब से बड़ी होली होती है। जिस की पूजा करने के लिए राजस्थान सरकार का तहसीलदार आता है। इस कारण इसे सरकारी होली भी कहते हैं। होली की ज्वालाएँ बहुत तगड़ी होती हैं। पहले इस होली के ठीक ऊपर हो कर बिजली विभाग की लाइन के तार गुजरते थे। होली की ज्वालाओं से दो तीन बार वे पिघल कर टूट गए। फिर बिजली विभाग ने चौक में एक और खंबा लगा कर उन्हें साइड हो कर निकाल दिया।

इस माहौल में पल बढ़ कर तमाम धर्मों के साहित्य के साथ साथ विज्ञान पढ़ कर खास तौर पर सेल बायोलॉजी और ईवोल्यूशन (डार्विन) को पढ़ कर मैं कूढ़ मगज धार्मिक से एक विज्ञानपंथी कम्युनिस्ट में बदल गया। इन्हीं के बीच हम अपनी गोष्ठियाँ किया करते थे। तब घरों और मोहल्लों का माहौल अभी के बनिस्पत पढ़ाई लिखाई और समझदारी बढ़ाने के लिए अधिक जनतांत्रिक था। कम से कम मुझे बलपूर्वक कभी नहीं रोका गया था।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

कामरेड का कोट


'कहानी'

‘सृंजय’

सारे से बाहर सिर निकालते ही माघ का तुषार बबूल के काँटे की तरह बरसा। कमलाकांत उपाध्याय के जोड़-जोड़ में सिहरन भर गयी। उनके दाँत जोरों से रपटने लगे। वह भीतर लौट आये और आलने पर के पुराने कपड़े उलटने-पुलटने लगे। पत्नी पास ही खड़ी थी। सूनी-सूखी आँख उठाकर उनकी तलाश को भाँपते हुए। कमलाकांत ने पुराने कपड़ों का गट्ठर छान मारा, लेकिन चादर न मिली।

''का खोज रहे हैं?'' उनकी उठापटक से पत्नी परेशान होकर बोली।

''चदरिया नहीं मिल रही है?'' उनके उत्तर में प्रश्न भी शामिल था। परेशान होकर वह बिखरे कपड़ों को फिर उसी जगह रखने लगे, ''पहले सोचा कि ऐसे ही निकल जाऊँ, लेकिन बाहर पाला झनझना रहा है।''

''मिलेगी कहाँ से!'' पत्नी बुदबुदायी, ''बबुआ को अपने तऽ ओढ़ा आये हैं।''

हारकर वह बेटे के पास चले गये। उसके लिलार पर हाथ रखा। वह प्रतिक्रियाहीन पड़ा रहा। निश्चेष्ट। लगभग एक घंटा पहले वह बेटे के पास ही बैठे थे। जब सरसाम की-सी हालत में उसका बड़बड़ाना तेज हो गया था। तेज बुखार में कँपकँपाहट के साथ जूड़ी ऐसे चढ़ी आ रही थी, जैसे बाढ़ का पानी। एक मात्र कंबल को खींच-खाँचकर उन्होंने उसकी थर्राहट कम करने का प्रयत्न किया था, लेकिन रेशा-रेशा घिस चुके बूढ़े कंबल को जैसे खुद किसी ओढ़ने की जरूरत थी। कमलाकांत ने वही किया था... अपनी चादर उतारकर कम्बल पर साट दी थी। इसके बाद भी उसका काँपना बंद न हुआ था। बाप का ममत्व... उनमें एक इच्छा जगी कि वह अंगीठी में बदल जाते तो सुलग-सुलगकर बेटे को गर्मी पहुँचा देते... लेकिन अंगीठी तो दिल में जलती है, जलती क्या, धुंधुआती है और शायद ही उससे खुद को भी राहत पहुँचती हो। उन्होंने तखत पर बिछी कथरी को भी बेटे पर फैला दिया था... और बेटा अभी बेहोश-सा पड़ा था। उन्होंने किसी जेबकतरे की तरह बड़ी सावधानी से उसकी देह से चादर खींचना शुरू किया। पत्नी उनके काम को ऐसे देखती रही, जैसे कोई खलखींचवा मुर्दार पशु की देह की आखिरी खाल उतार रहा हो, पत्नी से आँखें टकरायीं तो अपनी ही नजर में ओछे बन गये जैसे। पल-भर के लिए उनका हाथ सुन्न-सा हो गया और खुश्क आँखें सफ़ाई-सी देती मालूम पड़ीं। क्या करूँ? बाहर जाना नितांत आवश्यक न होता तो भला कौन बाप यूँ बज्जरकरेजी बने? हालाँकि पत्नी कुछ बोल नहीं रही थी... बुत बनी उनको निहारने के सिवाय... उसकी आँखों में वही सूनापन था, जो हर वक़्त रहता है। न कोई उलाहना, न कोई उमंग... एक तटस्थ-सा समझौते का भाव।

सामना न कर सके वह। कमलाकांत से ठहरा न गया, चादर उठायी और उसमें अपने को छुपाते हुए लम्बे-लम्बे डग भरने लगे। जिद्दी ठंड थी कि मच्छरों की तरह उनकी देह के नंगे हिस्सों पर डंक चुभो ही देती थी। लत्ते-सी हो चली इस चादर को बदलने का खयाल उन्हें फिर हुआ, लेकिन क्या-क्या बदलें वह? हालत तो ऐसी है कि आगे ढँको तो पीछे उघाड़। वह हथेलियाँ घिसते हुए तेज-तेज चलने लगे, ताकि इसी से गर्माहट बनी रहे।

पिछले दिनों वायुमंडल में अचानक निम्न चाप हो जाने से बूंदाबांदी हो गयी थी। आज मेघ के पूरी तरह खुल जाने से धरती का रहा-सहा लिहाफ़ भी जाता रहा, सो ठंड उग्र हो चली थी। कुहरे की धुंध में वह शीत से थर-थर बढ़े जा रहे थे। गाभिन गाय की तरह माघ की अलसायी रात में समय का अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल था। तिथि के मुताबिक अंधरिया कब की बीत जानी चाहिए थी, लेकिन धुँआसी चांदनी घने कुहरे के सामने धरती को रोशन करने में कितनी बेबस थी।

पल-भर के लिए वह खड़े हो गये और अपने गाँव की ओर रुख किया। चारों तरफ सोता पड़ गया था। कुत्ते भी नहीं भौंक रहे थे। उनका गाँव गोलाकार बसा हुआ है। धुंध में डूबा गाँव किसी दैत्याकार पशु के गोबर के चोथ की तरह लग रहा था। गाँव के अमूमन बीच में खड़ी बाबू जगतनारायण सिंह की दोमंजिली हवेली बड़ी ही वीभत्स लग रही थी। उसका अगवासा ढह चुका था। जैसे किसी जंगली मकना हाथी का निचला जबड़ा तोड़ दिया गया हो और दर्द के मारे वह मुँह फैलाता जाये, ऐंठते हुए। मकान बनवाने के लिए अपशकुन से बचने के लिए लम्बे बाँस से जो सूप, जूता और झाडू़ लटकाये गये थे, उस पर शायद एक उल्लू आकर बैठ गया था। बड़े ही भयावह तरीके से उसने तीन आवाजें निकालीं, ''आऊक ...आऊक... ओ ऊ ऊ ऊ क्‌!''

कमलाकांत ने कानों पर हाथ रख लिया। कर्कशता से बचने के लिए, लेकिन अपशकुन से कहाँ बच पाया कोई? कितने अरमानों से बाबू जगतनारायण ने हवेली को नया रूप देना चाहा था। इसके लिए उन्होंने कितने सही वक़्त का चुनाव किया था। माघ का महीना मालिकों के लिए बड़ा अच्छा होता है। इस समय मजदूर सस्ते मिलते हैं। हर साल का नियम है, इस दोफ़सली देहात को भादो और माघ महीने में दुर्दिन आ घेरता है। भादो तो खैर बरसात और बाढ़-बूड़े के चलते, लेकिन माघ में फसल तो खेतों में लहलहा रही होती है और खेतिहर मजदूरों को बैठकी का सामना करना पड़ता है। खेतों में काम तो रहता नहीं और रोजी-रोजगार का दूसरा कुछ साधन मिलता नहीं। हाथ पर हाथ रखे भूखों मरने की नौबत आ जाती है। कुछ तो पंजाब-हरियाणे की तरफ भाग चलते हैं और जो बाकी बचे वे मालिकों से डेढ़ा-सवाई पर अनाज उधार लेते हैं। माघ में एक मन लिया तो चैत में कटनी-दवनी के वक़्त मजदूरी में से डेढ़ मन कटवा देंगे। भूख से बेहाल हुए मजदूर उनसे अनाज उधार माँगने गये थे। उन्होंने देना भी चाहा था। ताकि मजदूर दूसरे प्रांतों में न भाग जायें। लेकिन कुछ चीजें बंधक रखकर। मजदूरों के पास अपनी देह के अलावा बंधक रखने को था क्या! उन लोगों ने काम ही देने को कहा। जगतनारायण सिंह कई वर्षों से मन बनाते आ रहे थे, हवेली के पुराने ढंग के अगवासे को तोड़कर नयी डिजाइन देने का। नये ढंग के 'बैठका' में एयरकूलर भी लगाने का विचार था। पिछला हिस्सा यानी रिहायसी कमरे या 'जनानाकित्ता' उसी पुराने ढंग का रहता। चोरी-डकैती से वे कमरे सुरक्षित थे, क्योंकि उनमें जंगले नहीं थे। मजदूरों ने दो-तीन दिन काम करके उन हिस्सों को ढाह दिया। अब वे उनसे सरकार की तयशुदा मजदूरी की मांग करने लगे। बाबू जगतनारायण को लगा कि यदि एक बार उन लोगों को चोखी मजदूरी का स्वाद लग गया तो खेती के काम में भी वही दर मांगने लगेंगे। तत्काल उन्होंने काम बंद करवाया और दूसरे गाँव से मजदूर बुलवा लाये! 'आनगँवई' और 'निजगँवई' मजदूरों में हलकी-सी झड़प भी हो गयी। लेकिन समझाने-बुझाने से सरकारी रेट पर मिलने वाली मजदूरी की बात पर 'आनगँवई' मजदूर भी इनके साथ हो गये। अधखड़ी हवेली बाबू जगत नारायण को हिलते दाँत की तरह दुःख देने लगी... न टूटे, न कुछ ठंडा-गरम ही खाने दे। दोनों तरफ से आन चढ़ गयी और वह आन कैसी जो चुनौती की सान पर पजकर दुधारी से भी तेज न हो उठे? ...उल्लू फिर बोला, 'ओ ऽ ऽ क्‌- ओ ऽ ऽ ऽ ऽ क्‌ ...आऊक्‌' और डैना पटपटाते हुए उड़ चला। कमलाकांत को चेत हुआ उल्लू के बोलने पर, वरना न जाने कितनी देर तक हवेली के बारे में ही सोचते रह जाते।

वह अपने गाँव से काफ़ी दूर चले आये थे। अरना भैंसे की तरह गाँव के सीवान पर खड़ा खैरा पीपल इसकी गवाही दे रहा था। इस पीपल से न जाने कितनी किंवदंतियाँ, कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। कहते हैं गाँव वाले कि सैकड़ों साल से यह पीपल ऐसे ही खड़ा है। इसके आगे की कितनी पीढ़ियाँ गंगाजी में सिरा गयीं, लेकिन यह पीपल अपने तने में एक और कोटर बढ़ाकर ऊपर सरक गया। यह पीपल बनते-बिगड़ते जमाने का गवाह है। अंगरेज हाकिमों के राज में इसने एक बार आदमी की तरह इजलास में गवाही दी थी... शीतल मिसिर बताते हैं, जिनकी उमर ही अदालत की सीढ़ियों पर मुकद्दमे की पैरवी करने में कटी... अभी जो हेमू साह हैं न पंसारी की दुकान वाले, इनके बाप धरीछन साह से एक अहीर ने पाँच मोहर का करज लिया था और वह पच्चीस साल तक नहीं चुका पाया। धरीछन साह ने ललमुँहा हाकिम के पास नालिश कर दी। पेशी हुई तो अहीर कहने लगा, 'माई किरिये, बाप किरिये, चाहें तो गुरु किरिया खिया लें होजूर! हमारी फूटली कौड़ी की औकाद नहीं तो मोहर का करज काहे वास्ते लेंगे?'' हाकिम ने गवाह लाने का हुकुम दिया। धरीछन साह सकपकाये। उन्होंने अकेले में मोहर दिया था। क्या बोले? कपार पीटने लगे, 'सरकार उहाँ आदमी तो कोई नहीं था। हाँ, एगो पीपर के पेड़ के नीचे करज दिया था।'' हाकिम बोला, ''उसी को लाव... डव्रीचन शाव!'' वह सुबकने लगे, ''इतना बड़का पेड़ कइसे आवेगा होजूर? जदी आवेगा तो कइसे सुनावेगा होजूर?'' ''अम गोवाह मांगटा।'' हाकिम ने टेबुल पर काठ की छुटकी हथौड़ी ठोकी, ''अम जो हुकुम डेटा, उसको बजा लाव... डव्रीचन शाव!'' धरीछन साह महाकंजूस थे। सिर धुनते चले कि पाँच मोहर गया सो गया, अब रुपया-दो रुपया पेड़ को किसी लकड़हारे से कटवाकर बैलगाड़ी पर लदवाकर इजलास में ले जाने में लगेगा। एक और बात पर वह दुःखी थे, ''अदालत की हतीमूटी दुआरी में हतना बड़ा पेड़ कइसे ढुकेगा?'' एक घंटा बीता तो हाकिम ने पेशकार से पूछा, ''डव्रीचन शाव आया?'' पेशकार बोला, ''नहीं।'' दूसरा घंटा बीता तो हाकिम ने पूछा, ''इटना बखट में नहीं आया?'' अहीर वहीं बैठा मन ही मन सोच रहा था कि यह हाकिम भी कैसा उजबक निकला। जइसन ऊद ओइसन भान, इनकी पूँछ ना उनका कान। वह खुश होकर बोला, ''अभी कइसे आवेगा होजूर! ऊ पेड़ इहाँ से बारह कोस दूर है।'' ''अंगरेज ससुरे हक बात पता लगाने में ओस्ताद थे तभी तो बाघबकरी को एके घाट पर पानी पियवाते थे, तभी तो उनके राज में सुरूज कभी डूबते नहीं थे।'' बताते हैं शीतल मिसिर। ''बस, हाकिम ने पकड़ लिया उसका गट्टा और लगा डाँटने। अहीर भूतखेलौनी लुगाई की तरह सब कुछ बकने लगा। फिर तो हाकिम ने सिपाही से दौड़ा दौड़ा के धरीछन साह को वापस बुलवाया और अहीर से पाँच मोहर के बदले दस मोहर हगवा लिया।''

...और पीपल की इसी विशेषता का गुणगान आज तक बच्चे करते आ रहे हैं, हर पीढ़ी के बच्चे :

चाक डोले चकबम-बम डोले,

खैरा पीपर कभी ना डोले।

काना रे कंडील-डील, पीपर तर हमार बिल

साँप बोले चें-चें, कबूतर माँगे दाना,

दूर सारा काना तोरे अतना बहाना।

कमलाकांत ने भी इस विरासती फकड़ा को सैकड़ों बार गाया होगा। इसी पीपल का डर दिखाकर उनकी माँ उन्हें बकरी का दूध पिलाया करती थी। लेकिन अब बचपने की नासमझी कहकर इसे उड़ा देने के बावजूद वह पीपल के पेड़ की ओर बढ़ने लगे। न जाने किस अनैच्छिक खिंचाव से। तनिक दूर रह जाने पर वह चौंक-से पड़े... पीपल के तने से सटे हुए चार-पाँच घुटे हुए सिर नजर आ रहे थे। उनकी ठुड्ढियों से लार बह रहा था। कमलाकांत एकदम से सावधान की मुद्रा में आ गये। अचानक उन्हें पदचाप-सी सुनाई पड़ी। पीछे की तरफ़। वह मुड़ गये। कुछ न था। फिर दाहिनी ओर किसी के एक बार चलने की आवाज मिली। वह फुर्ती से घूम गये। वहाँ भी कुछ न था। उनके रोंगटे खड़े हो गये... तो क्या भूतों की 'जोनी' सच निकली? अब तक इन बातों पर यकीन न था कमलाकांत को। लेकिन उनके चारों मृत साथी आज साक्षात भूत बनकर उनसे तरपण मांग रहे थे। गाँव वाले कहते भी हैं कि पीपल के नीचे भूतों का डेरा है और वे अमावस-के-अमावस वहाँ कबड्डी खेलते हैं। विरत रात को। लेकिन आज तो अमावस नहीं है। कहीं हत्यारे ही तो भूत का भेष धारे नहीं आ गये? कुछ भी हो- उन्हें लगा कि अगली सुबह बाट-बटोहियों को उनकी गला घोंटी हुई, रकत चूसी हुई लाश ही मिलेगी। बाल-बच्चे बिलख बिलख-कर पूछते ही रह जायेंगे कि वह यहाँ क्यों आये थे। उन्हें कोई बताने वाला न रहेगा कि कैसे काल ने उन्हें अशक्त कर दिया था। न चाहते हुए भी वह उधर खिंचते गये थे। अनायास, और सचमुच वह अपने को लाचार महसूस करने लगे। होनी होय सो होय रे मनवा, अब तो भागत ना बने। उनकी सारी शक्ति आँखों में निचुड़ आयी।

उनकी खिसियानी-सी हँसी निकल गयी। ''दुत्त तेरी कि...'' हमेशा शिष्ट-शालीन व्यवहार के हिमायती कमलाकांत सच्चाई जान लेने के बाद आत्मनियंत्रण खो बैठे और इस निभृत एकांत में भी मुँह से गाली निकल गयी। भरम के भूत का निराकरण हो गया। ऊपर की जमी शीत निचले पत्तों पर टप-टप चू रही थी... तने से चार-पाँच घंट लटक रहे थे और उनके छिदे पेंदे में ठुँसी कपास की बाती से पानी रिस रहा था।
इसे भरम का भूत भी कैसे कहें? मात्र पखवारे भर पहले जिस घड़ी चार मजदूरों को मारकर इसी पीपल की डाल पर उन्हें उलटा लटकाया गया था, उसके पहले तो- निपट देहाती से जैसे भावुक कवि बन गये कमलाकांत- उसके पहले तो इन चारों की जिंदा हकीकतें थीं। राग की, आग की, आशा की, जिजीविषा की धड़कनें थीं... वह आस-उम्मीदों भरा गतिमान वर्तमान अब जड़ भूत बना दिया गया है। क्या सचमुच?

पीपल की निचली डाल से एक बित्ते भर लम्बा चमगादड़ आ लटका। पैरों के बल उलटा लटककर कलाबाजियाँ खाते हुए वह 'चिंक्‌-चिंक्‌' कर रहा था। तो क्या उन्हें भी इसी तरह उलटा लटकाया गया होगा? उनकी आँखें पीड़ा से, मृत्यु की भीति से कैसे निकल-निकल पड़ रही होंगी। पीपल ने एक-एक वाक़या देखा होगा। इसकी कोटर-कोटर आँखें निकल आयी होंगी और पत्ते-पत्ते कान... दोनों तरफ़ से आन किसी आग-सिंकी डुग्गी की तरह तनी हुई थी। रत्ती भर की एक घुंघची (गुँजा) भी गिरे तो टन्न से बोले। ऐसे में जगत नारायण के लठैतों ने मजदूरों के एक मेठ को बुरी तरह पीट दिया। अनखन खोजा गया कि वह हटिया से ताड़ी पीकर लौट रहा था और बड़कऊ लोगों को गाली दे रहा था। मजदूरों को न अनाज उधार मिला, न निरापद काम और न चोखी मजूरी, लेकिन इतना जरूर हुआ कि इस पिटाई के बाद उनका मटिआया कलेजा भूख की आँच में तपकर ईंट बन गया। अब तो उनकी नाकेबंदी की जाने लगी। किसी भी भूमिहीन खेतिहर मजदूर के खेत-खलिहान में जाने पर पाबंदी लग गयी। यहाँ तक कि कोई बड़कऊ के बाग-बगइचा से खरिका-दातौन भी न तोड़ पाये। एक आम गैरमजरूआ जंगल था 'कुकुरबनवा', जहाँ गाँव भर के मवेशी चरा करते थे। वहाँ भी जाने से रोका जाने लगा। मजदूरों के पास अपनी जीवन-रक्षा का एक भी अवलम्ब न रहा। रात-बिरात वे खेतों में से चोरी-छुपे कुछ उखाड़ लाने लगे। गाभिन गैया से कोई दूध निकाले तो माघ में खेतों से अन्न भी पा ले। फ़सल तो अभी गदरा ही रही थी... चने के साग और मटर का गादा मिल सकते थे। सँपेलवा को भी मारो तो मरते-मरते भी उसकी चेष्टा एक बार डस लेने की होती है। मजदूर भी मरण-दंश देने पर उतारू हो गये। गुपचुप तय हुआ कि जगतनारायण के गैरकानूनी मिल्कियत वाले खेतों पर धावा बोला जाय। इसके सिवा अब कोई दूसरा चारा नहीं। पीपल के पेड़ से सटे ही आठ दूनी सोलह यानी दो बैलगाड़ियों के आने-जाने लायक सोलह हाथ चौड़ी एक डगर निकलती थी। डगर की बायीं ओर इन लोगों का अपना गाँव ''बलुआँ'' था और दायीं ओर ''पीपरपाँती'' गाँव था। एक तरह से दोनों गाँवों के बीच सीमा-रेखा भी थी यह डगर। लेकिन जगतनारायण की जमीन की भूख ऐसी बढ़ी कि उन्होंने इन्हीं मजदूरों से उस डगर को तुड़वाकर खेत बनवा लिया। मजदूरों की राय से चलें तो इन खेतों पर सरकार का हक बनता है और मेहनत भी इन्हीं की लगी हुई है। कुछ ऐसा ही तर्क ढूँढ़कर वे एक रात उस खेत से कुछ मटर उखाड़ लाये। एक दिन बीच डालकर यानी तीसरी रात को भी मजदूर मटर उखाड़ ही रहे थे, तब तक पीपल के नीचे टुटही जोन्ही (उल्का) जैसा कुछ कौंधा और तड़ातड़ गोलियाँ चलने लगीं। जिधर सींग समाया, उधर ही मजदूर खेतों को रौंदते हुए भाग चले... छिन गया यह भी निवाला। तब तक चार लोगों को गोली लग चुकी थी। भागे मजदूरों का कहना है कि उस वक़्त उनमें जान बाकी थी, लेकिन हमलावरों ने उन चारों आहतों को पकड़ लिया। उन्हें नंगा किया और उन्हीं की धोती से पैर बाँधकर डाल से उलटा लटका दिया। और तब तक मारते रहे जब तक उनके प्राण-पखेरू न उड़ गये। बाद में मूंड़ी काटकर लेते गये। यह सबक था आइंदा से विरोध करने वालों के नाम... सचमुच कोटर-कोटर आँखें निकल आयी थीं पीपल की और पत्ते-पत्ते कान। बड़े ही निर्लिप्त भाव से गवाही दिये जा रहा था खैरा पीपल। देर से खड़ी मानुस-मूरत को देख उलटे-लटके चमगादड़ की आँखों में शिकार का भ्रम हुआ। वह तेजी से झपटा उनके चेहरे की ओर। कमलाकांत ने झंप मारकर बचा लिया खुद को। उन्होंने तटस्थ-सा खेतों की ओर देखा। कच्ची-अधपकी छीमियाँ गंजे होते सिर पर बच रहे बालों के गुच्छे की तरह टापा-टुआँ दीख रही थीं। उनके जबड़े भिंच गये और आँखों में जुगनू कौंधने लगे। धीरे-धीरे उनकी मुट्ठी बंधी और दाहिना हाथ भूख के मोरचे पर कुरबान चढ़े शहीदों को लाल सलाम देने के लिए खुद-ब-खुद कंधे से ऊपर उठता गया। उनके लिए तो जाड़ा अब न जाने कांचनजंगा के किस कंगूरे पर जा भगा था।

जल्दी-जल्दी चलते हुए वह बलुआ हाई स्कूल के मैदान में पहुँचे। जहाँ मद्धिम जादव साइकिल का एक पुराना टायर जलाकर आग तापते हुए उन्हीं का इंतजार कर रहे थे।

''मुझे लगा कि अगिया बैताल यहाँ भी आ गया और लपटें फुफकार रहा है।'' वह उनके सामने खड़े हो गये। ''और ई साला प्लास्टिक का जूता...'' कमलाकांत ने जूते से पाँव निकाला और आग की ओर बढ़ा दिये।

मद्धिम जादव कुछ और पत्ते झोंकते हुए बोले, ''माघ ऐसा मकरा रहा है कि ससुरा हाड़-हाड़ हिला जाता है।'' पत्ते शीत से सील गये थे। धुआँ होने लगा तो मद्धिम ने टायर खिसका लिया।

''यही तो सवा महीना का मकरचिल्ला है।'' कमलाकांत खुद को लपट की जद में लेते हुए बोले।

''हाँ, मसल है कि धनु की पनरह मकर पचीस, चिल्ला जाड़ा दिन चालीस।'' मद्धिम जादव सिसकारने लगे, ''आप बहुत बिलम गये। तभी से आपकी आवाई ताक रहा हूँ।''

''सूचना ही लेट से मिली। वह भी रामगोबिन मास्टर ने भूइलोटन के मार्फ़त खबर भिजवायी। आज सुबह भी उनसे मुलाकात हुई थी, लेकिन 'हाँ-हूँ' कुछ नहीं बोले।'' कमलाकांत परेशान दिखने लगे। सेंक से अंगुलियाँ कुछ ढीली हो चली थीं। वह गाँठ चटखाने लगे।

''हमको भी भूइलोटन भाई ने एकदम गरदबेरे, (गोधूली) में बताया, हमें पता था कि आप इधर से आयेंगे ही, सो यहीं बैठ गया।''

''देरी का एक कारण और है। पीपल के पास से गुजरा तो थथमा लग गया।'' कमलाकांत ने कहकर मद्धिम को थमा दिया जैसे।

''मत कहिए कामरेड, उसकी याद से छाती फटने लगती है।'' मद्धिम जादव ने उस दुखद प्रसंग को छोड़े रखने का अनुरोध किया और लगे रामगोबिन मास्टर पर भड़ास निकालने, ''मास्टर साहेब ऐसी दरार में हगते हैं कि सूअर को भी बास नहीं मिलती। पता नहीं कैसा चक्कर है?'' नासमझी में वह जोर-जोर से मुण्डी हिलाने लगे, ''अबकी मीटिंग का पूरा इंतजाम रामगोबिन मास्टर के जिम्मे है, जबकि आपने ही राज्य कमेटी तक दौड़-धूप की थी कि वे लोग आकर यहाँ का हाल देख लें।''

देरी के एक और कारण को छुपा गये कमलाकांत। टायर ने चारों ओर से आग पकड़ ली थी... छल्ले की शक्ल में जलती हुई आग जमीन से ऊपर उठने लगी। अब यह कमलाकांत के सिर के चारों ओर अधर में जलने लगी, चाँद के प्रभामंडल की तरह या परीक्षा के लिए तैयार अनलचक्र की तरह। सिर को झटका दिया कमलाकांत ने, ''चला भी जाय। यहीं देर करने में कोई फ़ायदा नहीं।'' वह पता नहीं कहाँ से बोल रहे थे... जूड़ी में तपते बच्चे के पास से, पेड़ में लटके किसानों के पास से या पार्टी की उस मीटिंग के स्थान से, जहाँ अभी पहुँचे भी न थे। मन तो भनभनाते ततैया की तरह कभी यहाँ तो कभी वहाँ चक्कर काटे जा रहा था। अस्थिर... बेचैन।

चल पड़े वे। चलते-चलते उनके बीच ठंड पर ही बात होती रही। मद्धिम जादव उदास सूरत बनाकर बोले, ''माघ में पानी पड़ गया। लगहर (दुधारू) गायें एकदम चौपट हो जायेंगी।''

''मैनी (नीचे झुके सींग) गैया मनगर दूध दे रही है न?'' अगर कोई देखता तो शायद कमलाकांत का चेहरा उसे फटे दूध की तरह नजर आता।

मद्धिम जादव एकबारगी दोरसे मौसम के ऊपर बरस पड़े, ''देगी कहाँ से! कुकुरबनवा में हमारी गायें चरती थीं। जगत नारायण ने वहाँ भी पहरे खड़े कर दिये। कल बैजू की बछिया कांजी हौस में डाल दी गयी है। ऊपर से माघ का पानी... माघ बरसे तीन जाय, गेहूँ-गाय-बिवाय।''

''अरे भाई, मुझे दूध का उठौना चाहिए।'' आग अब उनके सीने में गुमड़ आयी थी। मुँह में जैसे कसैला धुआँ भर गया हो, बिना उगले अब रहा न जायेगा उनसे। ''बेटा बीमारी से बहुत कमजोर हो गया है। फल-फूल तो खिला नहीं सकता। दूध भी मिल जाये तो बहुत अच्छा।'' कहने के साथ ही कमलाकांत के अंदर बिवाई जैसा कुछ चिलका।

हठात उनके कानों में ''चर्र-चर्र, पुट् पुट्'' की आवाज आयी। जैसे फ़सल का गाभा नोचा जाय। कहीं इन लोगों के बहाने चोर-चाँई हाथ तो नहीं मार रहे हैं? दोनों चौकन्ने हो गये। घने कुहरे के चलते साफ़ कुछ दिखलाई नहीं पड़ता था। सधे क़दमों से वे आहट की ओर बढ़ने लगे। डर भी लग रहा था। हवा के क़तरे-क़तरे तक में क़ातिल घूम रहे हैं। बहुत कोशिश के बाद भी कुछ साफ़ नजर न आया। फ़क़त एक आभास-सा मिला। कई काली-सफ़ेद छायाएँ एक खेत में क़वायद कर रही थीं। दोनों जने एक-दूसरे से लगभग सट-से गये। ''चर्र-चर्र... पुट्-पुट्... पड़-पड़''... आवाजें तेज से तेजतर होने लगीं। बीच-बीच में कुछ कड़कड़ा उठता था। कंकालों की ठठरी बज रही हो जैसे। मद्धिम जादव कहीं से खोजखाज कर ईंट का एक अधपावा उठा लाये और बहुत हिम्मत करके उसे छायाओं की ओर उछाल ही तो दिया। छायाएँ पल-भर को ठिठकीं। उनमें से दो-तीन ने उछाल मारी... जैसे दोनों हाथ और दोनों पाँव के बल माँव बना कोई थिरक रहा हो। मद्धिम काँप गये। काटो तो खून नहीं। उनकी बेवकूफ़ी भरी हिम्मत महंगी पड़ी।

''धत्तेरे की! नीलगायें फसल चर रही हैं।'' मद्धिम जादव की जान में जान आयी। यदि इस वक़्त खेत का कोई विजूखा भी इनसानी शक्ल में होता तो वे दोनों उससे भिड़ जाते या भाग ही चलते।

''अब हमारा खाली हाथ चलना ठीक नहीं, कॉमरेड!'' मद्धिम पफुसपफसाये, ''न हो तो कोई गुप्ती-कटारी भी रखनी चाहिए। पता नहीं हम कब दबोच लिये जायें।''

''अपनी तरफ़ से तैयार तो रहना ही चाहिए।'' कमलाकांत पगडंडी से नीचे उतर आये। ''चलो हाँक दिया जाय।'' वह चादर को कमर में लपेटते हुए बोले, ''नाहक किसी की फसल बरबाद होगी।''

''छोड़िए भी। इधर के खेत धड़ाका सिंह के हैं। वह भी जगतनारायण के गुट का है।'' मद्धिम जादव नफ़रत से बिदककर बोले, ''पापियों की चीज ऐसे ही नष्ट होती है। पुन्नी संचै साधु खाय, पापी संचै दीमक खाय।''

''चीजों को नष्ट होते देना हमारा मकसद नहीं है, साथी!'' सर्द हवा और कमलकांत की आवाज में कोई फर्क करना मुश्किल था। हथेलियाँ पीटते हुए वह नीलगायों की ओर बढ़ चले। नीलगायें झुंड बनाकर ही भागती हैं। इसलिए उन्हें हाँकने में कुछ खास दिक्क़त न हुई। काफ़ी दूर तक खदेड़ने के बाद वे लोग फिर डगर पर आ गये।

आगे अरहर के खेत थे। रास्ता दोनों बाजू से तुप-सा गया था। एक लोमड़ी निश्चिंतता से किसी मरे जानवर का सड़ा मांस खा रही थी। इन लोगों ने नाक पर गमछा रख लिया। आदमी को देखते ही लोमड़ी के होश गुम हो गये। 'खेंक-खेंक' करती हुई वह कमलाकांत के दोनों पैरों की संध से ही निकल भागी। वह चिहुँककर गिरते-गिरते बचे।

''काटा तो नहीं न?'' घबड़ाकर पूछा मद्धिम ने।

''लगता है, ससुरी मूतकर भाग गयी।'' कमलाकांत का पैर भीग चला था। उनके तलवे में गुनगुनी सरसराहट-सी महसूस होने लगी। थोड़ी देर में तो पूरा जूता छप-छप बोथ गया। यदि खून की धार है तो दर्द क्यों नहीं हो रहा है? अचकचा कर वह नीचे-झुके तो पता चला कि पानी सरसराकर बहे आ रहा है। ''लगता है, कहीं से नलकूप का अरघा टूट गया है। नील-गायें इधर आयी होंगी... पानी पीने।'' अरहर के खेत पार कर लेने पर टूटा-अरघा दीख गया। अभी पतली-सी ही दरार पड़ी थी, लेकिन कगार गल रहा था। वह खड़े होकर गौर से देखने लगे।

''अब अरघा की मरम्मत भी करेंगे क्या?'' मद्धिम जादव हैरानी में बोले।

कमलाकांत ने कुछ जवाब नहीं दिया। चुपचाप गीली मिट्टी थोपने लगे, अरघे की तोड़ पर। बेचारे मद्धिम जादव भी कगार के ऊपरले सिरे से दो-एक ईंट उखाड़कर सहायता करने लगे। कामचलाऊ ढंग से तोड़ भर दी गयी।

सचमुच, इस आदमी को समझना मुश्किल है। कीचड़ सने हाथ धोते हुए मद्धिम सोच रहे थे। कमलाकांत की इस निस्संगता से उनका दम फूल रहा था। वह गंतव्य की टोह लेने लगे। कल्पना में तनिक दूर अलाव में लपलपाता रामगोबिन मास्टर का दुआर और उस लपलपाहट में काँपती इंसानी आकृतियाँ नजर आयीं। अब तो कमलाकांत का चेहरा खिल उठना चाहिए- उन्होंने कमलाकांत की ओर देखा- हाँ, उनका अनुमान सही था। या मद्धिम को कम-से-कम ऐसा ही लगा।

धुन में तो कुछ महसूस न हुआ। काम खत्म हो जाने पर उन्हें लगा कि हाथ-पाँव गलकर गिरे जा रहे हैं। ''जानता, तो टायरवा में से कुछ बचा लेता।'' पिघलते रबर की तरह मद्धिम की आवाज निकली, लेकिन तुरंत जमकर वह होंठों पर चिपक भी गयी। जमे शब्दों को जैसे उन्होंने नाखून से खुरचा, ''पुरनिया लोग ठीक कहते हैं

माघ मास की बादरी, और कुआरा घाम।

ये दोनों जो कोई सहै, करै पराया काम...''

वक़्त काफी जियान हो चुका था। ठार होते हाथ-पाँव बिना ढुलकाये गर्माहट नहीं मिलने को थी... वे दुलकी चाल चलने लगे। अलाव की लप-लपाहट आमंत्रण दे रही थी और शायद इसी ने उनके हाथ-पाँव की नसें गर्म कर दीं।



रामगोबिन मास्टर के दुआर पर पहुँचते ही इन्होंने अलाव के पास जगह ले ली।

''आप लोगों की ही राह देखी जा रही थी।'' कमलाकांत के पास चले आये रामगोबिन मास्टर। अब वह मद्धिम जादव को आत्मीय-सी फटकार देने लगे, ''का कमरेडवा! खाली मेले ददरी में हाथ चलता है! सुना है, बारह रकम के मसाले डालकर लिट्टी बनाना जानते हो। लेकिन यहाँ तो आग तापने लगे। ऐसे कैसे फरिआयेगा? चलो चार्ज संभालो।''

ईंट जोड़कर बने चूल्हे पर चाय का देग रखा हुआ था। एक ओर लिट्टियाँ गढ़ी जा रही थीं। उपले का आड़ा लपलप तैयार हो रहा था। ''जरा चाह पी लूँ कामरेड!'' मद्धिम लहसकर बोले। जल्दी-जल्दी चाय सुड़ककर और डबल खिल्ली खैनी होंठों तले दाबकर वह आटा हमवार करने लगे। दहकते अंगारे पर वह बेहिचक लिट्टियाँ रखते जा रहे थे, मानो उनका हाथ लोहे का चिमटा हो।

जिला कमेटी के सचिव चक्रधर जी कमलाकांत को एक तरफ़ ले गये और उनके कान में खुसरपुसर करने लगे, ''कॉमरेड आपकी दौड़-धूप ने रंग लाया। बात बहुत ऊपर तक चली गयी है। पोलित ब्यूरो के निर्देश पर बंगाल से दो कामरेड्स आये हुए हैं। एक आइडियालॉग हैं और दूसरे पार्टी के मुखपत्र से संबंधित हैं। इन पर इस घटना के साथ-साथ बिहार की परिस्थितियों के अध्ययन का भार भी सौंपा गया है। वैसे पहले वाले कॉमरेड हैं तो दक्षिण भारत के, लेकिन अर्से से बंगाल में रहते हैं। इन्होंने कुछ दिनों तक मध्य प्रदेश में भी काम किया था, लेकिन अब पार्टी के निर्देश पर पूर्वांचल का कार्य देखने लगे हैं।''

''ये लोग हिन्दी समझ लेंगे?''

कॉमरेड चक्रधर मन-ही-मन मुस्कराये, जैसे कोई आश्चर्यजनक भेद बताने जा रहे हों, ''रक्तध्वज के छद्म नाम से इन्होंने हिन्दी में ही कई, किताबें लिखी हैं। हाँ, दूसरे कॉमरेड बता रहे थे कि उन्हें हिन्दी नहीं आती।''

कमलाकांत को अपरिमित प्रसन्नता हुई, ''...तो रक्तध्वज जी यही है। अरे, इनकी लिखी पुस्तिकाएँ मैंने पढ़ी हैं और मजदूरों के बीच इनका पाठ भी किया है। अब तक इन किताबों को मैं हिन्दी अनुवाद समझता था।'' वह आल्हादित हो गये, ''कितना अच्छा संयोग है। अब बहुत कुछ जानने-समझने को मिलेगा। इनकी एक पुस्तिका 'आखिरी वक़्त का बिगुल' से मुझे बहुत सहायता मिली है। और इस संकट की स्थिति में हमारे लिए पार्टी की गाइडलाइन बहुत जरूरी है।''

''इसीलिए तो आये हैं वे लोग।'' चक्रधर जी की आवाज धीरे-धीरे गंभीर होने लगी, ''आपको बहुत होशियारी से 'फ़ेस' करना है, कॉमरेड। जाने या अनजाने में कुछ ऐसी बातें हो गयी हैं यहाँ, जिस पर आपत्तियाँ उठ सकती हैं।''

''आपत्ति?'' कमलाकांत का देहाती मन चौंका, ''लेकिन ऐसा क्या हो गया है?''

''अरे वही...'' चक्रधर जी टालमटोल करने लगे, ''कुछ नहीं... आप खुद संभाल लेंगे। असल में आपने अकेले निर्णय ले लिया न। स्वाभाविक है, कुछ कदम ग़लत भी पड़ जायें।''

''खैर, हम अपनी समस्या रखेंगे। निर्णय तो अब पार्टी को ही लेना है।'' कमलाकांत ज्यादा तूल-तबील में न गये। फिर भी एक हल्की-सी शिकायत की, ''कॉमरेड चक्रधर! दूसरे कामरेड को हिन्दी नहीं आती तो भोजपुरी या मगही तो आती होगी?''

''अंगरेजी जानते हैं, भई!'' चक्रधर ने आवाज को जरा लम्बा खींचा।

''बगैर जनभाषा जाने वह अध्ययन क्या करेंगे?'' कमलाकांत का देहाती फिर से सिर उठाने लगा।

''हम साथ रहेंगे। बीच-बीच में व्याख्या करते चलेंगे।''

''और वही सब लिखा जायेगा मुखपत्र में? हिन्दी नहीं जानते हैं तो मत जानें, लेकिन जिस इलाके का अध्ययन करना है वहाँ की कोई बोली तो जाननी चाहिए। सिर्फ़ अंगरेजी के बल पर हिन्दुस्तान का ठीक-ठीक अध्ययन हो पायेगा, मुझे संदेह है।'' अब कमलाकांत का देहाती आदतन वाचाल होने लगा।

''यह तो मजबूरी है। पोलित ब्यूरो में इतने बड़े हिन्दी प्रदेशों का एक भी आदमी सदस्य नहीं है, तो क्या वहाँ का काम रुक गया है? हिन्दुस्तान के आकलन में कोई कमी रह गयी है?'' चक्रधर जी बोले, ''हमारे लिए भाषा कभी आड़े नहीं आनी चाहिए।'' उन्होंने इस प्रसंग को यहीं रोक दिया, ''मार्क्स जब एशियाई ग्राम समाज पर लिख रहे थे तो क्या यहाँ की भाषाएँ जानते थे?''

''तभी तो उनका विश्लेषण कुछ-कुछ ग़लत रह गया... तमाम सद्भावना के बावजूद... खासकर भारत वाले मामले में, क्योंकि उन्हें अंगरेजी में उपलब्ध तथ्यों पर निर्भर रहना पड़ा था।''

''क्या कहा? फिर से कहिए तो। मार्क्स का विश्लेषण ग़लत रह गया?'' लगा कि चक्रधर जी उनका मुँह नोच लेंगे, ''आप मार्क्स को पढ़िए...फिर से पढ़िए।''

''पढ़ता हूँ। मार्क्स हमारी तरह जड़ नहीं थे। वह द्वंद्व को स्वीकार करते थे... और मार्क्सवाद ने मुझे यही सिखाया है कि अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार उसका क्रियान्वयन किया जाना चाहिए... लेकिन पोलित ब्यूरो का आकलन तो आजकल स्थितियों को नारों में ढालना सिखला रहा है।''

''आपने भंग-वंग खा लिया है, क्या?'' चक्रधर जी तैश में आ गये।

कमलाकांत बोलना चाहते ही थे कि राज्य सचिव के साथ रक्तध्वज जी आते दिखे। उनको देखकर चक्रधर जी लौटने लगे। कमलाकांत को यह सारा कुछ अजीब लग रहा था। उन्हें अब एक नयी कचोट काटने लगी थी, ''कॉमरेड चक्रधर!...''

''क्यों अब क्या हुआ?''

''नहीं माने कि... मीटिंग प्रभावित इलाके में ही कहीं करवानी चाहिए थी। हत्या के बाद से वहाँ के लोग बड़े सहमे हुए हैं। साथ ही बैठकर चर्चा होती तो उनका हौसला भी बढ़ता।'' अपने मन की सबसे बड़ी भड़ास निकालकर उन्होंने खुद को काफ़ी हल्का महसूस किया।

''वहाँ खतरा जो था।'' चक्रधर जी ने कुछ इस ढंग से कहा, मानो अनिष्ट आसपास ही मंडरा रहा हो। ''सुरक्षा की दृष्टि से प्रभावित इलाके से दूर मीटिंग की जा रही है। वैसे वह इलाका आपके प्रभाव क्षेत्र में आता है। जब आप आ गये तो समझें कि सब आ गये।''

कमलाकांत के चेहरे से अविश्वासी-सा हो जाने का क्षोभ टपकने लगा। राज्य कमेटी के सचिव से तो उन्होंने उसी इलाके में मीटिंग करवाने का अनुरोध किया था। उन्हें ऐसा ही आश्वासन मिला था। अपने यहाँ के पीड़ितों को उन्होंने यही बात बतायी थी। लेकिन आज की मीटिंग न जाने किसके इशारों पर अफरा-तफरी में होने चली है कि अंत समय तक इस परिवर्तन के बारे में वह कुछ जान न पाये।

इसी बीच वे लोग बरामदे में पुआल पर बिछी दरी पर आकर बैठ गये थे। कॉमरेड रक्तध्वज सबसे एक सच्चे जन-नेता की तरह अहककर मिल रहे थे। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली था। गहरे ताम्बई रंग का कद्दावर शरीर, खुली सीपियों की तरह ज्ञानरंजित आँखें, लम्बी दाढ़ी जो भारत की दक्षिणी सीमा की तरह नीचे की ओर क्रमशः नुकीली होती गयी थी। ठुड्ढी पर से दाढ़ी के सफ़ेद हो रहे बालों का एक गुच्छा यों बढ़ता चला गया था, जैसे काली चट्टानों के बीच फेनिल झरना बहता है। सिर के आधे से अधिक उड़ चुके बाल उनके अनुभव और चिंतन की व्यापकता का परिचय दे रहे थे। उन्होंने एक बहुत ही नजर-खींचू लाल कोट पहन रखा था और कंधे पर गर्म ऊनी चादर तहिया कर डाल रखी थी।

कॉमरेड आलोक भट्टाचार्य, जो पार्टी के मेन ऑर्गन से संबंधित थे, गोरे, सुंदर मगर दुबले-पतले शरीर वाले थे। उन्होंने फ्रेंचकट दाढ़ी रखी थी। उन्होंने सिर के बाल इस तरह सँवारा हुआ था, मानो वे नहाते वक़्त भी कभी बिखरते न होंगे। उन्होंने बंगाल हैंडलूम के कुर्ते-पाजामे पर शाल ओढ़ रखी थी।

रामगोबिन मास्टर से अपनी उत्सुकता को रोका न जा सका। वह कोट का झूलता सिरा छूते हुए बोल ही तो पड़े, ''कॉमरेड, यह कोट! बड़ी ही उम्दा 'कोआलिटी' का मालूम पड़ता है।''

रक्तध्वज जी ने अपने शरीर को ऊपर से नीचे की ओर देखा। ''इदर का नईं है।'' किंचित मुस्कराये वह, फिर कुछ देर के लिए उनकी आँखें मुँद गयीं और वह विदेहावस्था में चले गये, जैसे कोई साधक गुनिया अपने इष्ट से संपर्क साधने के पहले खो-सा जाता है। आहिस्ता-आहिस्ता उनके चेहरे पर एक सुरूर-सा खिला और बोल पड़े वह, ''पिचले साल रूस गया ता। वईं उपहार में मिला ता। कजाकिस्तान के गाँउ में अइसा कोट-अ हात से बनाते हैं। उजली बेंड के ऊन से और वनस्पतियों से उस पर लाल रंग-अ चड़ाते हैं। ये देकिए...'' उन्होंने कोट उतार दिया और कालर की तरफ से उलटकर दिखाने लगे, ''लेबल-अ के रूप में दस्तकारी संघम की अउरतों ने पार्टी-ई के निशान को एमब्रॉयडर-अ किया है। अइसा कोट-अ जार के टाइम-अ में किसान अपना लिए बनाते ते। लेकिन बाद में सोवियत काल में बी हस्तकलाओं के संगरक्छन के लिए इसे अउर डेवलप-अ किया गया।''

रक्तध्वज जी काफ़ी ठहर-ठहरकर व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध हिन्दी बोल रहे थे। सिवाय कुछ ध्वनियों को छोड़कर जैसे 'भेड़' को 'बेंड', 'झंझट' को 'जंजट' या 'देखिए' को 'देकिए', उनकी 'त' और 'थ' ध्वनियों से इतना सूक्ष्म अंतर था कि किसी डिक्टाफ़ोन द्वारा भी उसे पकड़ना असंभव होता।

कोट के नीचे भी उन्होंने स्वेटर पहन रखा था। इसलिए प्रायः सब लोग कोट को उलट-पुलटकर प्रशंसा भाव से देखने लगे।

रक्तध्वज जी उदास-से दिखने लगे और उनकी भाषा में एक अजीब-सी लापरवाही झलकने लगी, ''ब्रिटिशों की अउप्निवेशिक लूट-अ ने हमें कईं का नईं रका। हमारे उद्योग-दंदे, लोक कलाएँ, दस्तकारी सबको नष्ट-अ कर दिया। उन साम्राज्यवादियों ने। ये कोट-अ क्या है? कउन-कउन-सी चीज नईं बनती तीं हमारे यहाँ। वस्त्र उद्योग तो हमारा बहुत ही उन्नत ता... हमारे ही सूत अउर कपास से इंग्लैंड-अ की मिलें चलती तीं।''...'ट-ड' ध्वनियों पर तो उनकी जीभ का निपात ऐसे होता था, जैसे छापेखाने का प्लेट खट से कागज पर गिरता है। कमलाकांत के अंदर उनकी हिन्दी बोलने की कोशिश पर श्रद्धा उमड़ आयी।

आलोक भट्टाचार्य तो और दुखी होकर बोले, ''हमारा पूर्बो बांग्ला में बेश भालो-भालो आउर सॅब माफिक का जिनिश बॅनता था। आप लोगिन श्योर शुना होगा ढाका का मॅलमॅल का बारा में। एक ठो आंग्ठी का भीतॅर से समस्तो कापॅड़ शाँप का माफ़िक बाइर हो जाता था। जारा ई ठो देखुन ना....'' उन्होंने अपनी शाल उतार दी और चमड़े की एक सदरी, जिसे उन्होंने हैंडलूम के कुरते पर पहन रखा था, दिखाने लगे, ''पोलैंड से एक टा डेलिगेशन आया था, उई लोगिन इशको हामको प्रेजेंट किया था, परां...तू, हाम जान्ता है हमारा हिन्दुस्तान में इशशे भी दारुन जिनिश गुली बनने शेकता है। बाबा! हामारा इंडिया का माथा कॅम आछे ना की?'' उनके गोरे ललाट पर चिंता की काली-काली लकीरें बल खाने लगीं। लेकिन इतनी पेच बतियाने के बाद भी भट्टाचार्य की सदरी किसी का ध्यान खींचने में असमर्थ रही। जूते और चमड़े का कारोबार करने वाले जियावन रैदास ने उसे दो-तीन बार छूकर परखा और वह चमड़े की किस्म के बारे में अपनी जानकारी देने लगे, ''लगता है ई उदंत (जवान) बाछा के चाम से बना है।''

भूइलोटन गड़ेरिया देख रहे थे कि अभी भी सबके आश्चर्य का केन्द्र लाल रूसी कोट ही बना हुआ है। अपने हाथ का 'गुर' दिखाने का शायद इससे अच्छा मौका न मिलता। अपना ताजा बुना कम्बल रक्तध्वज जी के आगे फैलाते हुए चहकने लगे, ''कमरेड साहेब, तनी हेकरा के छूइए तो, आजमाइए तो। उजर भेंड़ि के बार से हमहूँ बीने हैं। किनारी पर ऽ एकबरनिया करिया भेड़ि का बार लगाये हैं। अइसी भेड़ि साइते-संयोग से नु मिलती है। कई बरिस से तनी-तनी बार बटोरने पर अबकी साल जाके एगो कम्मर तेआर होखा।''

रक्तध्वज जी ने एक कुशल ज़र्रानवाज की तरह कम्बल ओढ़ लिया... बाप रे! कम्बल है कि नागपफनी की चादर! स्वेटर छेदकर गड़ने लगा उनको। झटके से उतारकर रख देने का मन किया, लेकिन शिष्टता के खयाल से बहाना बना गये, ''गरम तो इतना है कि मैं एक मिनट-अ नईं रक पा रहा हूँ।'' वह बड़े ही मृदुल स्वर में बोले, ''तनिक चुब रहा है। तोड़ा अउर सॉफ्रट-अ रहता तो...''

''गरम है तो ले लीजिए न, कमरेड साहेब!'' भूइलोटन बिछ पड़े।

''नईं-नईं। आपको कष्ट-अ जेलना पड़ेगा।'' रक्तध्वज की रूह काँप गयी, ''मेरे पास तो हैं ही गर्म कपड़े।''

उन्होंने कम्बल को सहला भर दिया और बोले, ''बेंडों के ऊपर क्लाइमेट-अ का असर पड़ता है। मैदानी इलाकों की बेंडों के रोवें कड़े हो जाते हैं, वईं कश्मीर बगैरा में स्पंज की तरह मुलायम रहते हैं। राजस्तान के सरहदी इलाके की बेंडों को रोवें उतने मुलायम तो नईं, लेकिन लम्बे अउर चटक रंग वाले होते हैं। राजस्तान में एक विशेष प्रकार का कम्बल बनता है। लूँकार कहते हैं उसे। वह भी एक-दम काली बेंड के ऊन से बनता है, लेकिन बार्डर-अ पर लाल रंग से काम किया रहता है। अब देकिए ना... पश्मीना, शाहतूश और जामावार न जाने कइसी-कइसी शालें बनती तीं हमारे यहाँ। शालबापों की एक से एक बुनाई और उन पर बड़े यत्न-अ से किये गये काम का नमूना देखने को मिलता ता। लेकिन पूंजी के इस युग में उनके हात का कौशल चिन गया। अब वह स्तान मशीनों ने चीन लिया।''

बातचीत अभी सम पर पहुँच ही रही थी कि रामगोबिन मास्टर बड़े अपनेपन से आग्रह करने लगे, ''अब जरा चाह-पानी हो जाय। काहे कि भोजन में अभी अबेर है। मीटिंग में न जाने कितना समय लग जाये, कोई ठीक नहीं।''

उनके कहते ही कार्यकर्ताओं ने सबके आगे चाय का कुल्हड़ और चार-चार ब्रिटेनिया बिस्कुट रखना शुरू कर दिया।
कमलाकांत को हँसिए के ब्याह में खुरपी का गीत रुच नहीं रहा था। वह सिर लटकाये बैठे रहे। चाय पड़ी-पड़ी ठंडी हो गयी और बिस्कुट अनकुतरा ही पड़ा रहा। जियावन रैदास की नजर पड़ी तो टोका उन्होंने, ''कमरेड, आप खा नहीं रहे हैं?''

रामगोबिन मास्टर ने उनके आगे की ठंडी चाय फेंककर गर्म चाय रख दी। वातावरण को खुशगवार करने के लिए उन्होंने चुहल की, ''बिस्कुट मत खाइए, क्योंकि इसमें विष कूट-कूटकर भरा रहता है, लेकिन चहवा तो पीजिए, कामरेड!'' उन्होंने मद्धिम जादव को पुकारा, ''कमरेडवा! चाह और दे दो।''

कमलाकांत ने एक सड़ाके में चाय सुड़क ली। सबके चाय-बिस्कुट से फारिंग हो लेने के बाद रामगोबिन मास्टर ने आज के इस आयोजन के उद्देश्य के बारे में बताया। जिला कमेटी के सचिव चक्रधर जी ने इलाके की समस्याओं और इनसे संबंधित पार्टी की गतिविधियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी। फिर राज्य कमेटी के सचिव सत्यार्थी जी ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति और भारतीय वामपंथी आंदोलन की भूमिका का विश्लेषण किया। भारतीय वामपंथी आंदोलन में भटकाव और इस भटकाव में भी अपनी पार्टी की सही नीतियों के बारे में बताया। इसके बाद कॉमरेड आलोक भट्टाचार्य से बोलने का अनुरोध किया गया।

उन्होंने बड़े ही तंद्रालस भाव से कहना शुरू किया, ''खॅमा कोरबेन, कॉमरेड्स! हींदी ते ना बोलार जोन्ने। ताऊ कामरेड्स! आमी बेशी किछु बोलते चाइ ना...सुधु इंग्रेजी ते दु-एक टी कॅथा रेखे निजेर वक्तव्यो शेष कोरबो...''

अचानक रक्तध्वज जी ने यहाँ वीटो पावर का इस्तेमाल किया, ''कॉमरेड-अ बट्टाचार्या, न हो तो आप बाद में बोलिएगा... यहाँ के लोकल लोगों को कुच बोलने दिया जाय।''

''...तो आप ही बोलिए न।'' कॉमरेड चक्रधर रक्तध्वज जी से ही बोलने का आग्रह करने लगे।

''अबी नईं।'' वह कमलाकांत को देख रहे थे।

कमलाकांत उलझन में पड़े हुए दीख रहे थे। जिस घटना को लेकर इस मीटिंग का आयोजन था, उसका कहीं जिक्र भी न हुआ। रामगोबिन मास्टर ने आयोजन का उद्देश्य महज संगठन में वृद्धि और उसे सुदृढ़ करने तक ही सीमित कर दिया। चक्रधर जी ने इलाके की समस्या में उनके गाँव की घटना का भूलकर भी उल्लेख न किया। यह क्या हो रहा है? उन्हें बोलने का मौका दिये बिना आलोक भट्टाचार्य या रक्तध्वज जी से ही बोलने का आग्रह किया जाने लगा है।

रक्तध्वज जी ने उनकी हड़बड़ाहट और आंगिक मुद्राओं को पहले ही ताड़ लिया था। तभी उन्होंने कॉमरेड आलोक को रोक लिया था। उन्होंने कमलाकांत से पूछ ही लिया, ''कॉमरेड-अ उपाद्याय। आप बेचैन दीक रहे हैं। कुछ बोलना है क्या?''

कमलाकांत ने जल्दी-जल्दी बीड़ी का कश लिया और टोंटा नीचे मसलने चले तो दरी नजर आयी। वह हड़बड़ाकर उठे और दो-तीन लोगों के पैर कुचलते हुए ओसारे से बाहर निकल आये और टोंटा दूर फेंक डाला। खड़े होते ही उन्हें लगा, बात को प्रभावशाली ढंग से कहने के जितने तरीके उन्होंने सोचे थे, सब भूल गये, सारा कुछ सपाट हो गया, पुआल पर बिछी उस दरी की तरह। उस सपाटता में सिर्फ़ चार खेत मजदूरों के झूलते शव नजर आये, बाकी सब साफ़। बिना किसी भूमिका के वह बोल उठे, ''मेरे गाँव में चार खेतिहर मजदूरों की हत्या कर दी गयी। हमारे गाँव में एक भूमिपति हैं बाबू जगतनारायण सिंह। ढाई-तीन सौ बीघे की काश्तकारी है उनकी। न्यूनतम मजदूरी को लेकर विवाद चल रहा था। इसी में उन्होंने हमारे दल के चार मजदूरों की हत्या करवाकर उनकी लाश पेड़ पर टंगवा दी।''

राज्य कमेटी के सचिव कॉमरेड सत्यार्थी जी बोल पड़े, ''कॉमरेड उपाध्याय, बातचीत के क्रम में उस घटना पर चर्चा अवश्य होगी। पहले जरूरी मुद्दों पर 'डिस्कशन' कर लिया जाय।''

''कॉमरेड सेक्रेटरी! आपकी नजर में मजदूरों की हत्या जरूरी मुद्दा नहीं है? आखिर यह मीटिंग किसलिए बुलायी गयी है? आज पखवारे भर से मैं पपीहा बना फिर रहा हूँ... इसी मीटिंग के लिए। इधर मेरे और कुछ साथियों के अपहरण की योजना बनायी जा रही है... फिर भी आप लोगों को यह जरूरी मुद्दा नहीं लगता?'' कमलाकांत जोर-जोर से बोलने लगे, ''कॉमरेड सत्यार्थी, मैं अपने गाँव में मीटिंग बुलवाने के लिए आपके पास पटना गया था। लेकिन यह सब क्या हो रहा है? मीटिंग यहाँ हो रही है। मुझे सूचना ऐन शाम को पहुँचायी जा रही है। हमारी पार्टी के ही लोग मारे गये हैं। और लोगों के मारे जाने की आशंका है। इसमें पार्टी हमें कितनी सहायता दे सकती है, इसे बताने को मैं जरूरी मुद्दा मानता हूँ।''

वे लोग बगलें झाँकने लगे।

''तो इतना चिल्लाते काहे हैं?'' रामगोबिन मास्टर ने मौन भंग किया, ''जैसे यहाँ भी कोई आपकी घेंटी दबा रहा है।''

''हमारे लोग आपकी गलती से मारे गये हैं, कॉमरेड कमलाकांत!'' चक्रधर जी ने हस्तक्षेप किया, ''मैं नहीं चाहता था कि यह बात खुले। मगर आप यहाँ भी अनुशासनहीनता का परिचय दे रहे हैं... तब बोलना पड़ा।''

''मेरी ग़लती से?'' कमलाकांत का चेहरा फक पड़ गया। कुछ देर तक उनसे बोलते न बना।

''जी हाँ, आपकी ग़लती से। न्यूनतम मजदूरी को लेकर तनातनी चल रही थी तो आप लोगों को संगठित करते, जनआंदोलन छेड़ते। ऐसी परिस्थिति में आपने मजदूरों को खेत लूटने के लिए क्यों उकसाया?'' रामगोबिन मास्टर क्रोध में बोले, ''आपने मुझसे भी राय नहीं ली।''

''अच्छा! मुझे कटघरे में खड़ा करने के लिए ही मीटिंग यहाँ बुलवायी गयी है।'' कमलाकांत असुविधा महसूस करने लगे। ''जिस दिन लठैतों ने मजदूरों के मेठ और हमारे पार्टी कार्यकर्ता शिवचरण राम को पीटा था, उसी दिन मैंने आपसे सलाह-मशविरा करना चाहा था, लेकिन आपने सब्र करने के सिवा और कौन-सी राय दी थी?''

''तो क्या कहता? मैं उसमें का नहीं हूँ जो कह दूँ, 'चढ़ जा बेटा सूली पर भला करे भगवान'।''

''अगले दिन भी मैं आपके पास गया था तो पता चला कि आप अपनी सास के श्राद्ध में ससुराल चले गये, नेवता लेकर...''

''आप क्या चाहते हैं कि मैं समाज से कट जाऊँ? एक तो ऐसे ही कम्यूनिस्टों के बारे में धारणा है कि वे नास्तिक होते हैं, विधर्मी होते हैं...तब तो कोई हमें सुनेगा भी नहीं।''

''कॉमरेड-अ उपाद्याय!'' इस बार रक्तध्वज जी बोले, ''मुझे इस गटना के बारे में पता है अउर यह बी पता है कि आपने प्रीमैच्योर्ड-अ स्टेज में इतना बड़ा दुस्साहस कर डाला। कैर, इसे सुलजाने के लिए ही हम एकत्र हुए हैं। आप दैर्य तो रकें।''

''कॉमरेड! दुस्साहस अगर किसी ने किया है तो ग़रीब मजदूरों की भूख ने। खेत लूटने को किसी ने उकसाया है तो मजदूरों के खाली पेट ने। पेट भरा हो तो धैर्य रखा जा सकता है। लेकिन भूखे पेट को धैर्य कहाँ! आप बिहार की परिस्थितियों का अध्ययन करने आये हैं। यदि गंभीरता से अध्ययन करें तब शायद पता चले कि यह दुस्साहस कौन करवाता है। लेकिन आप अध्ययन कर नहीं पायेंगे। खेद है कि पूरी बात सुने बिना आपने कह दिया कि इस घटना के बारे में मुझे पता है।''

''टीक है, आप बी बताइए अपना पक्छ।'' रक्तध्वज जी ने उदात्त भाव से कहा।

वह अभी बताने ही जा रहे थे कि कैसे न्यूनतम मजदूरी का विवाद उठा, कैसे जगतनारायण की तरफ से मारपीट करवायी गयी। इसके बाद किस मजबूरी में लोग खेत लूटने को बाध्य हुए। उनकी बात अभी चल ही रही थी कि रामगोबिन मास्टर और उनके पक्ष के लोगों की ओर से हल्ला-गुल्ला शुरू हो गया, ''बंद कीजिए यह बकवास! गाये हुए गीत को ही दुबारा गाये जा रहे हैं। यह मीटिंग इतिहास-पुराण सुनाने के लिए नहीं बुलायी गयी है। हम अगली कार्यनीति पर विचार करने के लिए एकत्र हुए हैं।''

रक्तध्वज जी ने बीच बचाव करके सबको शांत किया। वह कमलाकांत की ओर उन्मुख हुए, ''मजदूरी के सवाल पर टेन्सन-अ चल रहा ता तो समजौता बी करवाया जा सकता ता, उपाद्याय जी।''

''समझौते के लिए मैंने खुद पहल की थी, कॉमरेड! लेकिन जगतनारायण ने इसे हमारी कमजोरी समझा। बातचीत के लिए मैं दो-एक बुजुर्ग लोगों के साथ उनके दुआर पर भी गया था कि सरकार की तयशुदा मजदूरी से कुछ कम पर भी मामला पट जाय। लेकिन वह तो मुझे रीति-नीति समझाने लगे कि मैं ब्राह्मण जाति में जन्म लेकर भी नीच जातियों का पक्ष ले रहा हूँ, कि मैं कुल का कलंक हूँ वगैरह-वगैरह। मेरे विरोध करने पर बातचीत की कौन कहे उलटे उसने मेरे ऊपर लाठी चला दी। संयोग कहिए कि बगल में एक खूँटा गड़ा हुआ था। क्रोध में अंधा होकर वह दौड़ा तो उसी में ठेस लग गयी और निशाना चूक गया, वरना मेरी खोपड़ी के दो टुकड़े हो गये रहते। साथ के बुजुर्गों के मना करने पर वह चिल्लाकर ही रह गया, नहीं तो मैं इतनी आसानी से छूटने वाला न था। कहने लगा, 'भगवान ने मुझे ब्रह्महत्या से बचा लिया नहीं तो आज से कमलाकांत की लीडरी झाड़ दिये होता। हत्या के भरोसे कानी गाय खेत चरती है और सराप के भरोसे ब्राह्मण मुँहे लगता है। अब सीधे मन घसक जाओ यहाँ से।' मैं क्या करता?... मुँह लटकाये चुपचाप लौट आया।'' कमलाकांत सफ़ाई-सी देने लगे, ''यह जगतनारायण किसी की सुनता थोड़े है, जहाँ सोच लेगा वहीं खूँटा ठोककर ही मानेगा।''

''खूँटा काके बोलता?'' आलोक भट्टाचार्य की गर्दन प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह तन गयी और उन्होंने मास्टर साहब से पूछ लिया।

कुछ देर विचारने के बाद वह बोले, ''खूँटा इज ए स्मौल पीस ऑफ बम्बू, कॉमरेड!... हाफ़ भीतर ऐंड हाफ़ बाहर।'' इसके आगे वह बोलने से ज़्यादा इशारों से बाहर और भीतर की स्थिति समझाने लगे।

''व्हाट?'' आलोक भट्टाचार्य की आँखें कोइन (महुवे का बीज) की तरह बाहर निकल आयीं, ''व्हेदर इट इज पुश्ड इनटू ह्‌यूमन बॉडी?... सो बूचरली...!''

विषम परिस्थिति में भी कमलाकांत हँस दिये, ''रामगोबिन भाई की अंगरेजी ही ऐसी होती है। खूँटे से पशु बाँधे जाते हैं। यहाँ खूँटा ठोंकने से मतलब अपनी जिद्द पर अड़े रहना है।''

''ताई तो बोली की...'' आलोक जी को सुकून मिला एकाएक।

''आप हमारी बात समझ तो रहे हैं न, कॉमरेड? या इंटरप्रेटर की जरूरत पड़ेगी?''

''नॉट सो, कॉमरेड! गो अहेड।'' आलोक जी अचकचा गये, ''हाम हिन्दी एकटू-एकटू जड़ू र सॅमॅजने शेकता। केबॅल बोल्ने आउर लिखने-पड़ने में नहीं शेकता। यू कैरी ऑन...'' कहकर उन्होंने चारमीनार सिगरेट सुलगा ली। उन्होंने बड़े प्यार से एक सिगरेट कमलाकांत की ओर भी बढ़ायी, ''शिग्रेट खाइए, कॉमरेड!''

कमलाकांत बीड़ी पी रहे थे, ''फिर भी उन्होंने पत रखने के लिए एक सिगरेट ले ली और उसे कान पर खोंस लिया।
मास्टर साहब बेतरह चिढ़ गये। एक तो अपनी अंगरेजी की खिल्ली पर, दूसरे कॉमरेड आलोक द्वारा सिगरेट पिलाकर बढ़ायी जा रही अंतरंगता पर। एक तरह से मास्टर साहब उनसे प्रतिस्पर्धा रखते थे। वैसे पार्टी के पोर्टफोलियो होल्डरों में अपनी वाक्‌चातुरी के बल पर उन्हें काफ़ी सम्मान प्राप्त था, लेकिन जनप्रियता के नाम पर कमलाकांत उपाध्याय उनसे बीस पड़ जाते थे। मास्टर साहब कमलाकांत उपाध्याय के साथ ही बलुआँ हाई स्कूल में ही हिन्दी के शिक्षक थे। उनका कम्यूनिज्म से पुराना लगाव था। लेकिन पिछले दो-तीन सालों से, जब से वह कलकत्ते से लौटकर आये हैं, तब से यह लगाव और गहरा हो गया है। कलकत्ता गये थे हाइड्रोसील का ऑपरेशन करवाने। उनका छोटा भाई वहाँ मारवाड़ी रिलीफ़ सोसायटी हास्पिटल में स्टोरकीपर है। गये थे दो महीनों के लिए, लेकिन रह गये नौ महीने...। इन नौ महीनों के बाद वह मानते हैं कि उनका नया जनम हुआ है। वह तो लौटना ही नहीं चाहते थे, लेकिन घर से चिट्ठी गयी कि स्कूल के हेडमास्टर और सेक्रेटरी उन्हें निकाल देने की धमकी दे रहे हैं... तब आये वह। वहीं कुछ-कुछ बंगला का अधकचरा अभ्यास हुआ और वामपंथी समझ भी विकसित हुई। कलकत्ते के मारवाड़ी रिलीफ़ सोसायटी हास्पिटल की सुव्यवस्था के पीछे वह वहाँ वामपंथी सरकार का होना मानते हैं... एक बिहार है, जहाँ श्मशान और अस्पताल में कोई फ़र्क ही नहीं दिखता। वह अपने कलकत्ता प्रवास के अनुभव सुनाते-सुनाते इतने उदास हो जाते हैं कि बिहार की जनता की चेतना कितनी 'लो' है... अंतहीन अनुभवों और सुरसामुखी संस्मरणों को सुनाते-सुनाते इतने उदास हो उठते हैं कि उन्हें होश ही नहीं रहता कि सुनने वाला बिहारी है या बंगाली और वह घंटों बंगला में ही बोलते रह जाते हैं... अभी आलोक भट्टाचार्य को ऐसा करते देख उनकी पीड़ा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था। कुढ़ते हुए वह भोजन की व्यवस्था देखने चले गये।
इस बार रक्तध्वज जी काफी धीरज के साथ बोले, ''बातें तो सबी टीक हैं, लेकिन हमें शांतिपूर्न तरीकों से ही आंदोलन को आगे बड़ाना होगा। चोटे किसानों को अपने सात रकना होगा। मजदूरी अउर बूमि संबंदी विवाद में कबी बी समजौते की राह को बन्द-अ नईं करना चाइए। किसी डिमांड-अ को एक्सट्रीम-अ प्वाइंट-अ पर पउँचा देना किसी के हक में अच्चा नईं होता। इसके लिए जरूरत है विबिन्न तबकों के किसानों को अउर केतिहर मजदूरों को संगटित करने की। यदि आइसा, एक बड़ा-सा संघम बन जाता है तो ये सामंती उत्पीड़न अपने आप बन्द हो जायेंगे। नईं तो इक्का-दुक्का प्रयास से हम कुद ही मारे जायेंगे।''

''समझौते के बारे में किसी ने ठीक ही कहा है, कॉमरेड, कि वह एक ऐसी व्यवस्था की कोशिश है, जिसमें जो चीज मुझे नहीं मिलने वाली वह किसी दूसरे को भी न मिले। हमने सिर्फ़ मांग रखी थी, बदले में हमें मौत मिली। मारपीट भी उसी ने करवायी और हत्या की शुरुआत भी उधर से ही हुई।'' कमलाकांत बेचैन होकर बोले ''कॉमरेड रक्तध्वज, आप तो देश-विदेश घूम चुके हैं। आपको पता होगा, बिहार में उत्पीड़न अपने निकृष्ट रूप में है। अतः इन सामंती उत्पीड़नों, प्रहारों को रोकने के लिए उसे उसी भाषा में रिफ्लेक्ट करना एक तरह से पीड़ित लोगों की बाध्यता बनती जा रही है।''

कॉमरेड रक्तध्वज के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण लोग भी चौंक उठे, ''आपका तात्पर्य?''

''पार्टी की तरफ़ से हमारे बीच हथियारों की सप्लाई की जानी चाहिए। बिना हथियार उठाये अब हमारा बचना मुश्किल है।'' कमलाकांत ने बेहिचक कह डाला।

''दादा, ई ठो केया बॅकता है आप? ओब्भी जॅदी पुलिस आपका धूल झाड़ दे तो कॉमरेड कमलाकांतो का सारा कमिटमेंट, सारा रिभल्यूशनिज्म झड़े जाबे।'' पार्टी ऑर्गन वाले आलोक भट्टाचार्य बुरी तरह भड़क गये और फ़र्राटेदार अंगरेजी में बोलने लगे। जिसका अर्थ था कि आपका यह कदम सामूहिक आत्मघात की ओर जाने वाला है। यह एक रूमानी क्रांतिकारिता है। जब तक बहुसंख्यक जनता इसके लिए प्रस्तुत नहीं होती तब तक सशस्त्र संघर्ष अंधे कुएँ में गिरने जैसा है। आप जिनके खिलाफ लड़ेंगे, वे आपसे अधिक शक्तिशाली हैं। पुलिस और प्रशासन उनके पक्ष में है। गंगा के इस मैदानी इलाके की, जहाँ आप रहते हैं, भौगोलिक संरचना इसकी इजाजत नहीं देती। चारों तरफ़ सड़कों का जाल बिछा है... दस मिनट के अंदर सुदूरवर्ती अंचलों में भी फ़ौज की पूरी बटालियन डिप्लॉय की जा सकती है। क्या आप फूस की इन झोंपड़ियों में से खूनी संघर्ष चलायेंगे? यह कुरुक्षेत्र का धर्मयुद्ध नहीं जो आप दिनभर लड़ेंगे और रात को निश्चिंत होकर थकान मिटायेंगे या विरोधियों के साथ बैठकर नीति-शास्त्र पर चर्चा करेंगे। आपको पता होगा, रूसी सहयोग से अंतरिक्ष में जाने वाले भारतीय अंतरिक्ष यात्री का कहना है कि धरती पर की छह इंच ऊँची कोई चीज भी वहाँ से साफ़ देखी जा सकती है। सारी मशीनरी, सारा तंत्र उनके पास है। आप किस बूते पर ऐसा सोचते हैं?

''तैश में आने की जरूरत नहीं, कॉमरेड! हम कोई स्टारवार करने नहीं जा रहे हैं। हम कुछ करें या न करें, लेकिन पुलिस हमारी धूल झाड़ती ही रहती है। वैसे किसी हिरोशिमा-नागासाकी पर अणु बम गिराना जितना आसान होता है, उससे कई गुना कठिन होता है देश में फैली बग़ावत की एक छोटी-सी चिनगारी को दबाना। सरकार बड़े-बड़े फौजी हमले को झेल लेती है, लेकिन जन आंदोलन के एक छोटे-से बीज से घबरा जाती है।''

''तो केया आप सिविल वार कॅरने मांगता है?''

कमलाकांत ने विवाद को भरसक बचाते हुए कहा, ''संभव है तर्क में आप मुझे परास्त कर दें। लेकिन मेरा एक छोटा-सा सवाल है। यदि आप लोग उसका समाधान कर दें तो हमारी सारी मुश्किल मिट जाये। मैं पूछता हूँ, जब भूमिपति सामंत तनिक विरोध पर ही हमें मारने को दौड़ रहे हैं तो क्या हम चुपचाप मार खा लें?''

''आप इसकूल का छेले का माफ़िक प्रश्नों कॅरता है...जस्ट लाइक अ मोरोन।'' आलोक भट्टाचार्य ने उन्हें बुरी तरह झिड़क दिया।

रामगोबिन मास्टर राज्य कमेटी के सचिव से शिकायत करने लगे, ''मैं पहले ही कहता था, कामरेड सेक्रेटरी, कि यह आदमी हम सबको भंडसार में झोंकवा देगा। मैं मना कर रहा था कि इनको मीटिंग में बुलाने की जरूरत नहीं, लेकिन आपने एक मौका देना चाहा। अब आपको कैसा प्रमाण चाहिए पार्टी विरोधी गतिविधि का? देखिए इस आदमी को... कैसे बहस किये जा रहा है। जिसे पार्टी की नीतियों से कोई वास्ता नहीं, पार्टी के अनुशासन को मानना नहीं, सोचिए वह जनता के साथ क्या सलूक करेगा।'' उनके होंठ वक्र हो गये।

''क्रांतिकारी जी सिविल वार करना चाहते हैं...ग्रीह-जुद्ध चाहते हैं, अराजकता फैलाना चाहते हैं... एक ऐसे समय में जब देश आंतरिक और बाहरी दोनों संकटों का सामना कर रहा हो।'' लगा कि देश की बात आते ही वह फूट-फूटकर रो पड़ेंगे।

''बातें तो सबी टीक हैं।'' रक्तध्वज जी ने रोका उन्हें, ''कामरेड-अ उपाद्याय! गाँउ-जोआर के सबी गरीब आपके सात हैं? सारे मजदूरों को आपने राजनीतिक रूप से प्रशिक्छित कर लिया है? जनमत आपके पक्छ में है? इसके बिना आपका हतियारबंद दस्ता सिवाय दो-चार कून-कराबा के अउर कुच नईं कर पायेगा।'' उन्होंने कमलाकांत की ओर तर्जनी उठायी, ''यदि आप स्वस्त तरीके से आंदोलन का विकास चाहते हैं तो पार्टी-ई आपकी सहायता करेगी। हम आँक के बदले आँक पोड़ने में आपकी मदद नईं करेंगे।''

कमलाकांत समझाने की गरज से धीरे से बोले, ''कॉमरेड आपने मुझे गलत समझा। मैं आतंकवाद के द्वारा समाज में सनसनी पैदा करना नहीं चाहता। हथियारों से लैस मरजीवड़े दस्ते की बात मैं आत्मरक्षा के लिए कर रहा हूँ, शक्ति में संतुलन के लिए कर रहा हूँ।''

''वाह जी... वाह! हमीं को हथियारबंद दस्ते की उपयोगिता सिखाने लगे...'' रामगोबिन मास्टर ने ताना मारा, ''जजमान की लकड़ी, जजमान का घी और पंडित जी का केवल ओम नमो स्वाहा। हथियार उठाकर मजदूर मरते रहें और आपकी सरदारी चलती रहे।''

''मान लीजिए आपने जगतनारायण को मार दिया। कुच अउर जमींदारों को मार दिया। आपको न्यूनतम मजदूरी बी मिल गयी। तो क्या इसके बाद आपका आंदोलन टप्प पड़ जायेगा?''

''बहुत-सी बातें रास्ते में स्वयमेव तय हो जाती हैं। समस्या केवल न्यूनतम मजदूरी की ही नहीं है। हमारे समाज में सामंतशाही ने लोगों के दिल और दिमाग पर कब्जा कर लिया है। इस सामंती हेकड़ी को तोड़े बिना किसी बदलाव की आशा धोखा है। अस्सी बरस का पोपले मुँह वाला बाप भी नहीं चाहता कि उसका बेटा उससे सर उठाकर बात करे। निखट्टू मर्द भी नहीं चाहता कि उसकी बीवी बराबरी की व्यवहार करे। इस कठोर काँच को उससे भी कठोर हीरे से ही काटा जा सकता है।''

''काँच के लिए एक छोटा पत्थर काफी है, कमलाकांत जी!'' रामगोबिन मास्टर बेरुखी से बोले, ''और आप उसके लिए कठिनाई से मिलने वाला महँगा हीरा तलाश रहे हैं। अरे, ककड़ी के चोर के लिए लात-मुक्का ही काफी है।''

''पत्थर से काँच चकनाचूर किया जा सकता है, लेकिन उससे मनमाना आकार नहीं पाया जा सकता।'' कमलाकांत बोले, ''किसी चीज को चूर-चूर करना कोई भी समझदार पसंद नहीं करेगा।''

भूइलोटन को भी यह नीति कुछ अटपटी-सी लगी तो रक्तध्वज जी से बोले, ''कमरेड साहेब, आप का चाहते हैं? हम सिरिफ मार खाते रहें?''

''ना चुप रहबऽ...धोती से बाहर मत होखऽ...'' रामगोबिन मास्टर उनको चुप कराने लगे, ''ये सब गूढ़ बातें हैं, सिद्धांत की। तुम्हारी समझ में नहीं आयेंगी।''

''ई कइसन सिधांत है, मास्टर साहेब, जे गरीब मनई के जान चल जाय बाकिर ऊ पलटा जबाब ना दें?''

''इतने दिनों से समझाते आ रहा हूँ, लेकिन दिमाग की कोठरी खाली हो तब न! उसमें तो भेड़ की लेंड़ी भरी हुई है...ठीक ही कहा गया है, सार-तत्व समझे बिना कागा हंस ना होय।'' रामगोबिन मास्टर तुनक गये। भूइलोटन का पूछना उन्हें छोटी बुद्धि बड़ी बात लगी। ''अरे जोंक जब नून देने से ही मर जाय तो उसके लिए संखिया लाने की क्या दरकार है? जगतनारायण कोई बाघ थोड़े हैं जो मान में नहीं आयेंगे।''

''मुझसे तो शांतिपूर्ण हल नहीं निकल सका। मैं अपनी कमजोरी मान लेता हूँ... तो आप हैं। रक्तध्वज जी भी आ गये हैं, सत्यार्थी जी और चक्रधर जी भी हैं... सब लोग मिलकर कल जगतनारायण से बात कीजिए। न हो तो पंचायत ही बैठायी जाय। शायद कोई रास्ता निकल आये।'' कमलाकांत ने आत्मसमर्पण कर दिया।

''एँह...एँह, देखिए कॉमरेड सत्यार्थी! इस आदमी की चाल देखिए। हम सबको यह 'गजरा-मूरई' की तरह कटवाना चाहता है।'' रामगोबिन मास्टर की जाँघ की पेशियाँ फड़कने लगीं, ''जगतनारायण एक नंबर का हंड़िकस (एक प्रकार का गूंगा भूत जो चुपके से पकड़ लेता है) है...और अभी तो वह जैसे जोड़ खाते नाग-नागिन को कोई छेड़ दे, वैसे बौखलाया हुआ है।'' मास्टर साहब को लगा कि उनका डर जाहिर हुआ जाता है तो बात पलटने लगे, ''मुझे कोई भय नहीं। मैं चाहूँ तो अभी दंड-पंचायत बैठा दूँ...लेकिन रक्तध्वज जी, आलोक जी को लेकर सोचना पड़ जा रहा है। इनके साथ यदि कुछ ऊपर नीच हो गया तो...।''

''अइसा कतरनाक है वह?'' ख़ौफ़ के मारे रक्तध्वज जी भी घबड़ा गये।

''और क्या!'' रामगोबिन मास्टर कूटनीति का सहारा थामने लगे, ''हड़बड़ी का काम शैतान का होता है। मैंने पूरी प्लानिंग कर ली है कि कैसे उसको नाथा जायेगा। कल हम जैतपुरवा गाँव के महेन्दर प्रसाद सिंह के पास चलेंगे। वे हमारी पार्टी के मेम्बर हैं... खानदानी रईस जमींदार हैं, फिर भी हमारी दिल खोलकर मदद करते हैं। जैसे पागल हाथी को ऊँट कान चबाकर काबू में कर लेता है, वैसे ही जगतनारायण को महेन्दर बाबू सोझ करेंगे...।'' वह फुसफुसा पड़े, ''टैक्टिस चाहिए, कामरेड सत्यार्थी, टैक्टिस!''

''अरे, वही महेन्दर प्रसाद सिंह न, जो क्रांतिकारी गीत-वीत भी लिखते हैं?'' सत्यार्थी जी ने पूछा।

''हाँ-हाँ, वही। रईस होते हुए भी वे प्रगतिशील मिजाज के हैं।''

''उससे क्या हुआ। एंगेल्स भी तो पूंजीपति थे। यदि वे नहीं होते तो बेचारे मार्क्स को कितनी मुसीबत झेलनी पड़ती। तालस्ताय, इतने बड़े लेखक, जमींदार ही तो थे।'' सत्यार्थी जी ने बताया, ''...और हमारे ये रक्तध्वज जी...इनके चाचा का बंगलोर के पास स्टील का बर्तन बनाने वाला विशाल कारखाना है। ये भी वहीं पर मैनेजर थे, लेकिन मजदूरों का शोषण देखकर समूची सुख-सुविधा पर लात मारकर चले आये।''

''हमारा बाबा जखुन पूर्वो बांग्ला शे आया, हुआ सुन्दोर बाड़ी, केला गाँछ का एक ठो बागान, रुई माछ का एक ठो पुखुर, ताल गाँछ का एक ठो बागान छुड़ के आ गिया।'' आलोक भट्टाचार्य ने बताया, ''हमारा बैकग्राउंड भी तो जमींदार फेमिली का था, परांतू उशशे केया...। शॅब मायेर भोगे चले गेलो।''

''क्रांति के लिए जरूरी है, पहले कुद को डीक्लास करना।'' रक्तध्वज जी जैसे स्मृति के सागर में गोते लगाकर ऊपर उठते हुए बोले, ''कुद को डीक्लास करने के लिए मैं जब मजदूरों के सात रहने लगा तो मेरे अंकुल ने जानते हैं क्या ब्लेम-अ लगाया?... ब्लेम लगाया कि कारकाना हड़पने के लिए मैं मजदूरों को बड़का रहा हूँ।'' कहते-कहते वह अपना शरीर हिलाने लगे, जैसे बारिश में भीगा पक्षी परों को झाड़कर पानी उड़ाता है। इस तरह से शायद वह अपने चाचा का निराधार आरोप उड़ा रहे थे।

''महेन्दर प्रसाद खुद अपने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दे पाये हैं जो हमारी मदद करने चले।'' कमलाकांत भड़क गये, ''आप लोग उसी महेन्दर प्रसाद सिंह से मदद की आशा करते हैं, जो हमारी पार्टी का मेम्बर होते हुए भी अपने आचरण में घोर सामंती है। अपनी बीवी को छोड़कर वह एम.ए. पास एक लड़की को रखे हुए है। कभी उसे वह क्रांतिकारी कवयित्री बताता है, तो कभी अपने क्रांतिकारी गीतों की गायिका।''
''ओह कबूतरी का गीत हमहूँ सुने हैं।'' भूइलोटन गड़ेरिया बोले, ''गाती है तो लगता है कि सरपत के जंगल में बकरी मेंमिया रही है।''

रामगोबिन मास्टर को उनका भड़कना अच्छा लगा। वह चाहते थे कि कमलाकांत गुस्से में अपना आपा खो बैठे। ''आचरण में एक आप ही तो वैष्णव हैं, बाद बाकी सभी गणिका हैं आपके लेखे।'' मास्टर साहब निहायत ही ठंडी आवाज में बोले, ''महेन्दर प्रसाद हमारी सहायता नहीं करेंगे, तो न करें। हम मृतकों को मुआवजा दिलाने के लिए डी.एम. का घेराव करेंगे...। एकता रहे तो पचासों उपाय हैं।''

''यह हुई एक बात।'' चक्रधर जी ने समर्थन किया, ''घेराव के लिए पाँच सौ आदमी का जिम्मा मैं लेता हूँ।''

इधर लोगों के बीच कानापफूसी शुरू हो गयी।

...पार्टी ऐसी बातों को कभी पसंद नहीं करती...

...फिर भी कमलाकांत आज कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं...

...पहले तो यह ऐसे न थे...

...किसी ने बरगला तो नहीं दिया?

...नक्सलियों ने झाँसापट्टी पढ़ाई होगी...

...ये साले नक्सली अब इधर भी टाँग पसारने के फिराक में हैं...

'मैं किसी नक्सली-फक्सली को नहीं जानता, साथियो!'' कमलाकांत चिल्लाते ही रह गये, ''यहाँ की स्थितियों ने ऐसा कदम उठाने के लिए हमें बाध्य कर दिया है। हक के लिए तन-मन से जूझ पड़ना ही नक्सली कहलाना है तो आप लोगों की खुशी... जो चाहें, कहें...''

...ये नक्सली और क्या करेंगे? किसी को नहीं छोड़ते ये...ममहर में बहिन बिआहते हैं...कानाफूसी जारी थी।

लिट्टी पककर तैयार हो चली थी। फुलौना मल्लाह उसमें लगी राख झाड़ने के लिए कपड़ा खोज रहे थे। रामगोबिन मास्टर ने एक छोटी-सी गमछी दी तो फुलौना ने असमर्थता जतायी, ''ढेर सारी लिट्टियाँ हैं...गमछा से झाड़ने पर पूरी रात सिगर जायेगी।'' फिर भी उन्होंने गमछी फैलाकर देखी तो राम-राम करने लगे, ''हटाइए मास्टर साहेब... ले जाइए इसे... इसमें किसी ने नेटा पोंछ दिया है।'' और उन्होंने गमछी छान पर फेंक दी।



आग तापते-तापते या गर्मागर्म बहस के बीच कमलाकांत ने न जाने कब अपनी चादर उतार दी थी... उन्हें पता ही न चला। रामगोबिन मास्टर उसे फालतू पड़ा समझकर उठा ले गये और लगे उसी से लिट्टी झड़वाने।

चक्रधर जी ने सबको रोकते हुए कहा, ''यह बहस सारी रात भी चले तो खत्म नहीं होने की। समय काफ़ी हो चुका है। अब भोजन कर लेना चाहिए। कमलाकांत जी अभी उत्तेजित हैं। जरा नार्मल हो लें तो फिर बातें होंगी। इस इलाके में इन्होंने पार्टी के लिए जो किया है, उसे देखें तो अब भी काफ़ी उम्मीद है इनसे।''

भोजन की अकुलाहट अधिकांश लोगों के अंदर थी। कहने भर की देर थी कि वे लोग खरखरा कर उठ गये। केवल तीन-चार लोग बैठे रहे।

रामगोबिन मास्टर ने भूइलोटन से पूछा, ''का हो, तू ना खइबऽका?''

''इच्छा नहीं है, मास्टर, साहेब!''

''तो चलो, परोसो...मेहमानों को खिलाओ।'' मास्टर साहब ने उनकी काँख में हाथ लगाकर उठा दिया, ''चलो भाई!''

मद्धिम जादव भी पीछे रह जाने वालों में थे। मास्टर साहब बड़े प्रेम से बोले, ''चलिए मद्धिम भाई। यह कैसी बात है? इतने प्रेम से आपने लिट्टी बनायी और अब बैठ गये।''

''मेरा भी मन नहीं है। मैं खाकर आया हूँ।''

''उससे क्या! अघाया भैंसा भी तीन कट्ठा चरता है। ठीक है, बाद में खा लीजिएगा। अभी चलकर परोसिए तो...''

वह कमलाकांत से मनुहार करने लगे, ''आप तो खाने बैठिए ही।''

''ब्रह्मभोज में किसी अश्रोत्रिय को खिलाया गया अन्न अकारथ जाता है, मास्टर साहब!'' कमलाकांत कुढ़कर आनाकानी करने लगे, ''यह सब अच्छा नहीं लगता मुझे।''

ऐसा नहीं कि रामगोबिन मास्टर ने व्यंग्य न समझा हो, लेकिन उनका मानना था कि भोजन के लिए कुत्ते को भी पुचकारकर बोलना चाहिए। यह तो फिर भी अपने साथी हैं। ''अच्छा किसे लगता है!'' न चाहते हुए भी उन्होंने एक स्वर में स्वर मिलाया, ''लेकिन क्या किया जाय? कोयल अंडे फोड़ देती है और उन्हीं से अपना बच्चा भी पलवा लेती है, तो क्या कौआ फिर से अंडे देना बंद कर देता है? या चारा चुगना छोड़ देता है? आपके या मुझे नहीं खाने से जो चले गये, वो तो आने से रहे। चलिए दो-चार कौर ही खा लीजिए।''

कॉमरेड रक्तध्वज ने भी उनका कंधा थपथपाया, ''आप मेरे सात बइटिए।'' और उन्हें लगभग खींचते हुए वे पंगत तक ले चले।

लोग आसन रोपकर बैठ गये थे। चीजें परोसी जा रही थीं... शुद्ध घी में चभोरी लिट्टियों की सोंधी महक...कोल्हू के पेरे सरसों के तेल में सना आलू और बैंगन का मसालेदार चोखा...भुने धनिया और जीरे की बुकनी डली टमाटर की खटमीठी चटनी...प्याज-गाजर-मूली-धनिया पत्ता का सलाद, जिस पर गोलमिर्च और काले नमक का चूर्ण तथा ईख का सिरका छिड़का गया था...

...भूख ऐसी बढ़ आयी कि लिट्टियों की कुटम्मस होने लगी।

रक्तध्वज जी कमलाकांत को साथ लिये अलाव की ऐन बगल में बैठे। कुछ देर बाद उनको गरमी लगने लगी। उन्होंने कोट उतार दिया और मोड़कर उसे घुटनों पर रखने ही वाले थे कि रामगोबिन मास्टर खातिरदारी में लपके, ''भूइलोटन भाई, कोटवा टाँग दो कहीं। मोड़ के रखने से घूर्ची पड़ जायेगी।''

भूइलोटन गड़ेरिया ने आगे बढ़कर कोट उठा लिया। उसे सहलाते हुए वह बड़ाई करने लगे, ''अजब सरकस बनवैया हैं रूस के लोग!''

मास्टर साहब ने मीठी चुटकी ली, ''तुम तो ऐसे सुहरा रहे हो, मानो सुगनी की माई (भूइलोटन की पत्नी) की जुलुफी हो।''

भूइलोटन लजा गये। कोट को वह बरामदे की खूँटी पर जतन से टाँग आये। अब रक्तध्वज जी से बतरस करने लगे, ''ई कोटवा ओही रूस के नु है, कमरेड साहेब, जहँवा से गोबरचन जी आये थे?''

रामगोबिन मास्टर रक्तध्वज जी को लिट्टी खाना सिखला रहे थे, ''ऐसे नहीं, कामरेड! लिट्टी को दबाकर फोड़िए... हाँ, ऐसे...दो टुकड़ों में...अब सत्तू वाला हिस्सा ऊपर कीजिए-अब लीजिए...'' उन्होंने सत्तू के ऊपर पैरी (लोहे या काठ की बड़ी करछी, जिसकी डंडी लंबवत रहती है) से गर्म-गर्म घी ढालना शुरू किया, ''अब खाइए...।''

''कौन गोबरचन?'' रक्तध्वज जी का सिर ऊपर उठा। झटके से। हालाँकि लिट्टी फोड़ने में वह माहिर हो चले थे, लेकिन दूसरी लिट्टी को दबाया ही था कि वह क्रिकेट की गेंद की तरह लुढ़कने लगी।

चक्कर काटते एक कुत्ते को मौका मिला और लिट्टी को दाँतों से दबाकर ले भागा।

''इन बिहारियों को जिन्दगी-भर हिन्दी बोलना नहीं आयेगा। श्रद्धेय लोगों का नाम भी ऐसा बिगाड़ देंगे!''

रामगोबिन मास्टर रोष में बोले, जैसे वह खुद बिहार के न होकर चिकमंगलूर के रहने वाले हों। लिट्टी छिटकने पर दुःख प्रकट करते हुए उन्होंने 'गोबरचन' शब्द को क्लियर किया, ''गोर्बाच्योव के बारे में कह रहे हैं, भूइलोटन। इनकी बेवकूफियों से मैं आजिज आ गया हूँ। कितना सिखाया 'मार्क्स' कहने को लेकिन यह 'मार-कस' से आगे नहीं बढ़ पाये।''

''नामों का अच्चा स्वदेशीकरन है!'' रक्तध्वज जी हँस पड़े।

उनके हँसते ही पार्टी अनुशासन की अच्छी मिसाल पेश करते हुए कुछ और लोग भी हँस पड़े। मजबूरी में रामगोबिन मास्टर को भी भभाकर हँसना पड़ा।

रूस का नाम उठा तो रक्तध्वज जी के अंदर कुछ गुरूर-सा खिला उनकी पाँचों उँगलियाँ घी से चिकनी हो रही थीं और रूस की स्मृतियाँ इस गुरूर से सुगंधित हो उठीं, ''रूस की ही बात लें, कामरेड-अ उपाद्याय! क्रांति वहाँ अनिवार्य हो गयी ती। वह अइसा वक्त ता, यदि क्रांति नईं होती तो लोगों का बचना मुहाल ता। कोई बी चीज समय पर होती है, जब बदलाव की सारी परिस्थितियाँ उसके गर्ब में आकार दारन कर लेती है। चीन में बी वइसा समय आ गया ता। वहाँ की हालत इतनी कराब ती कि अन्न के बदले अच्चे घरों की स्त्रियाँ अपनी देह बेचने लगी तीं। रोटी के केवल एक टुकड़े के लिए। यह सब कहने का मतलब है कि बारत में अइसी कराब स्तिति आने बी नईं देगा। कमलाकांत जी, एक बात याद रकें, उतावली में कोई काम नईं करना चाहिए। आपके बारे में मैंने सुना है। आपने दीरे-दीरे ही यहाँ के लोगों को एकजुट किया है। अब सई वक्त का इंतजार कीजिए, वक्त आते ही चोट कीजिए... सफलता जरूर मिलेगी।''

...जरा सलाद...

...लिट्टी एक इधर...

लोग चटखारे ले-लेकर खा रहे थे।

कमलाकांत का दिल बुझ-सा गया था। क्षुब्ध मन से वह कौर तोड़ते जा रहे थे। खाने का दिखावा करते हुए।

भोजन एकदम बेस्वाद लग रहा था, जैसे उन मजदूरों के श्राद्ध का अन्न खा रहे हों। आलोक भट्टाचार्य लिट्टी की खूब बड़ाई कर थे, ''बाह! केया जिनिश है लिट्टी! शच में प्रॅतेक प्राभिन्स का खाना में अलादा-अलादा मॅजा लागता है...डिसेंट एंड भिभिड टैस्ट!''

मद्धिम जादव ने इसे अपने लिए समझा। थोड़ी देर के लिए अपनी पाक कला पर आत्ममुग्ध-से हो गये। हालाँकि आलोक जी को यह पता नहीं था कि लिट्टी किसने बनायी है। वह मनुहार करने लगे, ''लेकिन खा कहाँ रहे हैं? कभी की परसी दूनो लिट्टिया में से खाली आधा खाँड़ा खाये हैं... और लीजिए ना।''

''दाँत में थोड़ा तोकलीफ है।''

''अरे, तब तो घी में फुलाकर खाइए।'' रामगोबिन मास्टर घी की कटोरी और पैरी लिए लपके, ''बंगाल का रसगुल्ला जैसा न हो जाये तो फिर कहिएगा।''

रक्तध्वज जी को मजाक सूझा, ''मचली के बिना इनका काम नईं चलता। एक बार गुजरात गये ते। वहाँ 'मांच-बात' के लिए बड़ा परेशान हुए।''

''ओफ्फोह! जानता तो फुलौना मल्लाह से मछली मंगवा लेता।'' मास्टर साहब बोले।

''अउर आप भी तो 'रसम्‌' खुजता था।'' आलोक जी ने भी इसका जवाब ठिठोली में दिया, ''साउथ इंडियन डिश नेंही माँगता था आप?''

भूइलोटन गड़ेरिया ने आलोक जी के पत्तल में बिना माँगे चोखा डालते हुए बंगला बोलने की कोशिश की, ''कामरेड दादा! इतना गँवे-गँवे खाबेन तऽ कबहूँ ना ओराबे... पलथी मारके बइठुन ना, आराम से। पैजामा का फीता तनी नीचे सरका दिन। पेट तबे से अउँसा गइल होबे।'' रामगोबिन मास्टर के चलते बंगला की कुछ क्रियाओं से उनका भी परिचय हो चला था। कलकत्ता प्रवास के ललित संस्मरण सुनाते-सुनाते वह भूइलोटन से बंगला में ही बतियाते जाते थे। वैसे भी भूइलोटन में जिज्ञासा का सहज संस्कार था।

आलोक जी हँस दिये, पता नहीं अपने बैठने के ढंग पर या उनकी बंगला पर।

रक्तध्वज जी ने कमलाकांत के कान के पास मुँह ले जाते हुए हौले से कहा, ''कामरेड-अ उपाद्याय! आप गबराते क्यों हैं? मैं यहाँ से जाते ही मुख्यमंत्री से मिलूँगा। देकिए न, मैं अइसा उपाय आजमाना चाहता हूँ कि साँप बी मर जाये अउर लाटी बी न टूटे।''

कमलाकांत के पूरे शरीर में आग लग गयी जैसे। मुँह में कौर रखे हुए ही वह ऊँट की तरह गलगलाने लगे, ''क्यों मजाक कर रहे हैं, कॉमरेड? मुख्यमंत्री किसके हैं? वह गरीबों की तरफ कब से हो गये?''

राज्य कमेटी के सचिव सत्यार्थी जी ने जड़ दिया, ''तभी तो मैं जोर देता हूँ कॉमरेड, कि जनता को राजनीतिक रूप से सचेत किया जाय। तभी तो वे अपने पक्ष के प्रतिनिधि चुन सकेंगे। तब कोई असंभव नहीं कि बंगाल की तरह, केराला की तरह एक दिन बिहार के मुख्यमंत्री भी हमारे हो जायें।''

''मैं भी पहले इस मुगालते में था, कॉमरेड सेक्रेटरी! लेकिन अब लग रहा है कि दर्जन-भर से अधिक प्रांतों में बंगाल की तरह मुख्यमंत्री हो जायें, तब भी वे कुछ कर नहीं पायेंगे।'' कमलाकांत ने पानी के घूँट से कौर निगल लिया था, ''उन्हें वर्तमान संसदीय व्यवस्था की कार्यप्रणाली के अनुसार चलना पड़ेगा। इस व्यवस्था में इतने बड़े-बड़े खाँचे हैं, जिसमें उनके नुकीले दाँते भी गच से फँस जायेंगे। इस व्यवस्था के साथ उनका चेन और व्हील का संबंध बन जाता है...चेन सरकता रहता है, व्हील घूमती रहती है। अपनी धुरी पर स्थिर। वैसे भी मसल है कि बूढ़ी घोड़ी को लाल लगाम लगा देने से चाल नहीं बदल जाती।''

...मद्धिम भाई, जरा चोखा...

...मास्टर साहेब, तनिक घी ढालिए तो...

...अरे-रे, हाथ बार लिया... कम से-कम एक और लीजिए...

...चप-चप...चपर-चप...
मांगने-खाने-मनुहार करने के स्वर आपस में घुलमिल रहे थे। कमलाकांत को लग रहा था कि वही लोमड़ी अपने दल-बल सहित इस भोज में भी आ बिराजी है।

''नो कॉमरेड! इट इज अंडरएस्टिमेशन ऑफ अवर एचीभमेंट।'' आलोक जी ने प्रतिवाद किया, क्योंकि बंगाल की मिसाल आते ही वह उस बहू की तरह खुश हो गये, जो बगैर दहेज के आयी हो, फिर भी सास ने उसके मायके की बड़ाई कर दी हो। वह अंगरेजी में टिप्पणी करने लगे, जिसका अर्थ था कि चुनाव भी एक तरह का वर्गसंघर्ष है, मजदूर वर्ग के प्रतिनिधि को सत्ता सौंपने का संघर्ष। हम इसमें सफल भी होते जा रहे हैं, क्योंकि इसमें हमें तेजी से बढ़ रहे मध्यवर्ग का भी साथ मिलता जा रहा है, जबकि सशस्त्र संघर्ष में मध्यवर्ग तनिक भी दिलचस्पी नहीं दिखाता।

तभी से जुमलेबाजी सुनते-सुनते और बोलते-बोलते कमलाकांत का अक्खड़ मन ऊबने लगा था। उन्होंने बिफरकर कहा, ''सच कहूँ तो आप लोगों का व्यवस्था-विरोध उस वेश्या के गुस्से की तरह है, कॉमरेड, जो तभी तक गुस्से में रहती है, जब तक उसे पूरे नजराने नहीं मिल जाते। फिर तो वह अपने को ऐसा परोसती है...ऐसा परोसती है...कि अब क्या कहूँ?'' उन्होंने दाँत से जीभ काट ली, ''वेश्या तो फिर भी हमारी एक मजबूर बहन ही है।''

''सच डिक्शन इज रादर ऑब्जेक्शनेब्‌ल...'' कॉमरेड आलोक भट्टाचार्य ने कसकर डाँटा। वह अभी चीख-चीखकर कुछ कहने ही वाले थे कि रक्तध्वज जी ने उन्हें इशारों से मना कर दिया। कमलाकांत की यह शैली वाकई बुरी लगी उन्हें भी, लेकिन राजनीति में उन्हें अनगिनत अवसरों पर इससे भी ज्यादा कड़े शब्दों, प्रतिवादों, आक्षेपों, आपत्तियों, तर्कों आदि का सामना करना पड़ा है। अंत में उन्हें अपने ज्ञान और अनुभव का सहारा ही लेना पड़ता है। कुतर्क करने वालों को भी वह अपने अकाट्य तर्कों से ही परास्त करते आये हैं। यदि अगले का उद्देश्य आपको विचलित करने का है और आप उसकी किसी दलील पर तिलमिला गये तो आपकी वैचारिक कमजोरी ही प्रकट होगी। रक्तध्वज जी ने भीतरी तिलमिलाहट को दबाकर एकदम जैसे कुछ हुआ ही न हो वैसे कहा, ''सशस्त्र संघर्ष बी एक तरीका होता है बदलाव का। लेकिन ऐसे संघर्ष से स्वस्त जन आंदोलन को बहुत दक्का पहुँचता है। मान लीजिए किसी जमींदार या पूंजीपति या टाइरेंट रूलर के किलाप जन आंदोलन चिड़ा हुआ है। इसी बीच उसकी हत्या कर दी जाती है तो वह जन आंदोलन वईं एकाएक रुक जाता है। जनता की लड़ाई एक व्यक्ति पर आकर टहर जाती है। यह किसी 'न्यूक्लियर एक्स-प्लोजन' की तरह अचानक होता है। इसके बाद का समूचा माहौल 'शॉक वेव' की चपेट में आकर दूलिसात हो जाता है।''

...तनिक चटनी...इनको...हाँ, इधर भी...

...पानी...जियावन जी...जरा-सा पानी...

...नहीं, अब लिट्टी नहीं...पेट फूल चला है...अब सिर्फ़ पानी...

खाना लगभग पूरा हो चला था। फिर भी कुछ लोग 'मनु भाव न जाने पेट भरने से काम' की तर्ज पर मिचरा-मिचरा कर टूंग रहे थे। कोई दाँत खोद रहा था तो कोई हाथ में लगे घी से मूँछें चिकना रहा था। कुछ लोग स्वादिष्ट भोजन के साथ-साथ पार्टी के वरिष्ठ लोगों की गरिष्ठ बातें भी सुन रहे थे।

''वह उदाहरण तो आपने सुना होगा...'' रक्तध्वज जी पत्तल से एक तिनका नोचकर दाँत खोदते हुए बोले, ''एक चोटे बच्चे ने सुबह-सुबह गुलाब का पौदा रोपा। उसे उम्मीद ती कि दोपहर तक उसमें पूल आ जायेंगे। पौदे में वह कूब काद-पानी डाल गया। हर तोड़ी देर बाद वह उसे जाँक लेता ता कि पूल किले या नईं। लेकिन पूल को नईं किलना ता तो नईं किला, दोपहर होते-होते चोटा बच्चा इतना जल्लाया कि उसने पौदे को ही उकाड़ पेंका। हमारे कुच बचकाने सातियों में क्रांति के प्रति कुच अइसी ही जल्दबाजी दीक रही है। मुजे तो शक है, वे कांग्रेस के ही एजेंट-अ हैं।''

''ए मद्धिम!'' अपनी आदत से लाचार भूइलोटन गड़ेरिया से रहा न गया, ''अरे ई चीन मुलुक के लहसून जी का कहानी है हो। तबकी पहिली मई के मास्टर साहेब सुनाये रहे।''

रामगोबिन मास्टर को इस बार नामों का बिगड़ना बुरा नहीं लगा। बल्कि वह प्रमुदित होकर बोले, ''यही कहानी मैंने पहली मई को सुनायी थी, कॉमरेड! इन लोगों को पोलिटिकली डेभलप करने के लिए मैं अकसर कुछ न कुछ सुनाता रहता हूँ।'' हठात वे 'यूरेका' की तर्ज पर बोल उठे, ''समझ गया...पहली मई की याद आयी तो आपके नाम का मरम समझ गया। उसी दिन मजदूरों के खून से सनी कमीज का झंडा बना था...

रक्तध्वज!''
''अघ... वई कून का द्वज।'' रक्तध्वज जी मुस्कराते हुए सिर हिला रहे थे।

रामगोबिन मास्टर ने उनके पास जाकर पूछा, ''जो आपने सुनायी, वह लु-शून की ही कहानी है न?''

''शायद यह वईं की एक लोक-कता है।'' उन्होंने अनिश्चय की स्थिति में बताया।

कौओं की जमात में उल्लू की दशा हो, वहाँ कमलाकांत उपाध्याय की वही दशा हो रही थी। 'मुझे उल्लू ही तो बनाया जा रहा है।' -उन्होंने सोचा। कुछ देर तक चुप रहने के बाद, माहौल को तोलने के बाद वह बोले, ''बहुत अच्छा दृष्टांत है। प्रसंगवश मुझे भी एक बोध कथा याद आ रही है, कॉमरेड रक्तध्वज!''

रक्तध्वज जी को खुशी हुई कि कमलाकांत उनकी बातों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। यह आदमी भी क्या करे- उन्होंने सोचा- आश्चर्य की बात है बिहार के ये हिंसक व्यक्ति हिंसा से अलग कोई भाषा ही नहीं समझते और अब तो पूरे देश में हिंसा का ही दौर चल पड़ा है। उन्होंने जिज्ञासु होकर हाथ हिलाया, ''अवश्य सुनाइए। इन कताओं में विशाल अनुबव के सार चिपे रहते हैं।'' दरअसल, उन्हें अपने ही विशाल अनुभवों पर भरोसा हुआ कि उनके तर्कों का प्रभाव कमलाकांत जैसे अड़ियल के ऊपर भी पड़ने लगा है।

''पंचतंत्र की कहानी है।'' कमलाकांत के अंदर विषण्णता की तेज हँसी फूटने को हो आयी, लेकिन होंठों को धीरे-धीरे खोलते हुए उन्होंने कहा, ''तीक्ष्णविषाण नाम का एक सांड था। हमेशा झुंड से अलग चलने वाला और अक्खड़। एक दिन प्रलोभन नाम का एक सियार उसके लटकते हुए लाल अंडकोष को देखकर सोचने लगा, 'सांड की जंघाओं के बीच यह कितना सुंदर और सुडौल फल लटका हुआ है। पक जाने से यह टह-टह लाल भी हो चला है...लगता है, अब गिरे-तब गिरे।' वह उसके पीछे लग गया। उसने निरंतर कई वर्षों तक उसका पीछा किया, लेकिन वह फल नहीं गिरा। क्या हमारे कुछ साथी वर्तमान संसदवाद के प्रति कुछ ऐसी ही आशा लगाये नहीं बैठे हैं? संसद के दोनों सदन के बीच लटकता हुआ फल। पता नहीं अभी और कितने दिनों तक उसकी तरफ टकटकी लगाये रखनी पड़ेगी।'' मायूसी में उनकी ठंडी साँस निकल गयी।

अचानक वहाँ खड़मंडल हो गया। चक्रधर जी क्रुद्ध सांड की तरह ही हुँकारने लगे, ''यह सरासर अनुशासनहीनता है। किसी को अपमानित करने का आपको कोई अधिकार नहीं है। आप एकदम उजड्ड हैं, अक्खड़ हैं। आपको बात करने की तमीज नहीं है। आपकी समझ बड़ी विध्वंसक है।'' रामगोबिन मास्टर उनके खिलाफ मौके की ताक में रहते ही थे। वह भी तारस्वर में गगन गुंजाने लगे, ''आपने इस इलाके में लुच्चे-लफंगों की जरा-सी फौज खड़ी कर ली तो अपने को तीसमार खाँ समझने लगे हैं? आपके बल पर इतनी बड़ी पार्टी नहीं चलती... समझे? रक्तध्वज जी को मैं जानता हूँ। इन्होंने दुनिया देखी है, कई जगह आंदोलन चलाया है। और आप? आप बंगला पर की मोदियाइन की चाह दुकान को छोड़कर जानते भी हैं कि दुनिया कितनी बड़ी है? आप क्या हैं? आप ईनार का बेंग हैं... आप गूलर का कीड़ा हैं...आप 'अलमुनिया' का तसला हैं, जी...तसलाऽऽ...पेंदा में आँच लगते ही गरम हो जायेंगे, जमीन पर रखते ही ठंडा।'' गुस्सा आ जाने पर मास्टर साहब अनगिन कवित्त और लोकोक्तियाँ सुनाने लगते थे। उन्होंने वही रूप पकड़ लिया, ''आप बड़ा दिसकूट (दृष्टकूट) झाड़ने चले हैं? शर्म नहीं आती, किससे बात कर रहे हैं! इसी को कहते हैं...महुआ नित उठि दाख सो, करत बतकही जाय।''

किसी को माहौल के इतना बिगड़ जाने का अंदाजा न था। अपनी-अपनी तरह से नाराजी जाहिर करते हुए लोग टिड्डी दल की तरह उठ गये। अब तक तो वह ठस-ठस जवाब देते आ रहे थे, लेकिन जब चारों ओर से व्यंग्य-बाणों की बौछार होने लगी तो कमलाकांत की सारी बुकराती गुम हो गयी। अब सिर झुकाये काठ की मूरत की तरह निष्कंप बैठे रहे।

''ऐसे तपाकी के साथ किसी निर्णय पर पहुँचना असंभव है।'' सत्यार्थी जी एक कोने में फुसफुसाकर सबसे हट जाने की सलाह देने लगे, ''अब इनसे बात करना अपना दिमाग़ खराब करना है। कल फिर कहीं बैठा जायेगा। हम खुद तय करेंगे कि क्या करना चाहिए। कहाँ इनको राज्य कमेटी में लेने की बात चल रही थी, लेकिन इन पर इस इलाके का भार देकर हमने आदमी समझने में सचमुच भूल कर दी।''

''मैं तो पहले ही कहता था, कॉमरेड सेक्रेटरी, कि यह आदमी सबको भंडसार में झोंकवा देगा।'' रामगोबिन मास्टर को खुशी इस बात पर थी कि उनका कहा होकर रहा। ''इसने मीटिंग की गरिमा और गंभीरता धूल में मिला दी। पूंजीवदिया सब क्या कहेंगे कि ये कम्युनिस्ट अपनी मीटिंग में पियक्कड़ों की तरह लड़ते हैं।''

''यह आदमी कम्युनिस्ट तो कहीं से नहीं लगता। कम्युनिस्ट मूवमेंट में इनको जरा-सा भी फ़ेथ नहीं है।'' चक्रधर जी ने लोगों को आगाह किया, ''अभी मीटिंग शुरू होने के पहले ये हजरत मार्क्स में ही खोट निकाल रहे थे। ही इज एन एजेंट ऑफ़ नक्सलाइट्स।''

लोग कमलाकांत को शक की निगाह से देखने लगे। वे यूँ खिसकने लगे जैसे उनकी छाया से बचना चाहते हों।

...लेकिन रक्तध्वज जी समाधिस्थ-सा बैठे रहे... कई बार पुकारे जाने के बावजूद। चोट उनके मर्म पर लगी थी, शायद।

कमलाकांत एक अजीब-सी बेचारगी की मुद्रा में आलोक भट्टाचार्य की दी हुई चारमीनार सिगरेट पीने लगे... शायद इस पराजय को धुआँ-धुआँ करने के लिए धुएँ का कवच बनाते हुए वह शून्य में ताक रहे थे। उनकी चेतना उस धुएँ के समान एक खास ऊँचाई तय करते हुए छितरा जा रही थी। उन्हें सिगरेट को दी गयी किसी विद्वान की परिभाषा याद आ गयी- सिगरेट उसे कहते हैं, जिसके एक सिरे पर आग होती है और दूसरे सिरे पर कोई मूर्ख। तो क्या वह मूर्खता कर रहे हैं? उस आग को अपनी चेतना और आचरण में खींचकर, जिसे क्रांति की ज्वाला कहते हैं। आज जिस आग को पीने के लिए वह कटिबद्ध हैं, इसके लिए माचिस की कितनी तीलियाँ घिसनी पड़ी थीं, ऐसे ओदे मौसम में... अनगिनत, बेहिसाब। गाँव के इन नंगे-भूखों को गोलबंद करना असाध्य-सा काम था, मेढक को तराजू के खुले पलड़ों पर तोलने जैसा। राजनीतिक पाठ का ककहरा सिखाना, डकैती-जुआ-शराब जैसे कुटेव छुड़वाना, गुप्त तरीकों से दस-दस, पाँच-पाँच आदमियों को किसी झोपड़ी में बैठाकर ढिबरी की रोशनी में पतली-पतली पुस्तिकाओं का बाँचना, कथा-कहानियों के माध्यम से जीवन के अलिखित रहस्यों को समझाना, एक नयी आशा का संचार करना...इसमें कितना घासलेट जला होगा, कितना वक़्त और कितना खून, कमलाकांत के पास कोई हिसाब नहीं। इतने दिनों का किया-कराया क्या एक धक्के से ही खत्म हो जायेगा? इसी के लिए उन्होंने अपना जीवन होम कर दिया।

राजनीति तो उन्होंने चक्रधर जी के साथ ही शुरू की थी। वही चक्रधर जिनके पास तन ढँकने के साबुत कपड़े तक नहीं थे... नहाते वक़्त धोती भीग जाती थी तो कमलाकांत की ही धोती पहनकर बाहर निकलते थे...और आज वह कहाँ पहुँच गये! जिला कमेटी के सचिव बनाये गये, जब से नगरपालिका की यूनियन करने लगे हैं, तब से न सिर्फ़ देह पर चर्बी चढ़ गयी, बल्कि शहर में मकान भी बनवा लिया, मटका-तसर ही पहनने लगे हैं, कॉन्फ्रेंस अटेंड करने लगे हैं। नहीं-नहीं! कमलाकांत का यह लक्ष्य कभी नहीं रहा। कुत्ते के कान से सटी चमजूई की तरह सत्ता से चिपक जाना चाहिए या जनता को जन-संघर्षों के माध्यम से एक वैकल्पिक व्यवस्था के लिए तैयार करना चाहिए?- उनके सामने बड़ा प्रश्न था कि वह क्या करें? पार्टी के इस टरकाऊ रवैये में वह भी शामिल हो जायें... लेकिन इससे तो पीड़ितों के बीच पस्तहिम्मती ही बढ़ेगी... अपने-आप फैसला लिया उन्होंने- मार्क्सवादी कर्मकांडियों की संघर्ष और क्रांति की किताबी व्याख्याओं के मकड़जाल से उन्हें बाहर निकलना ही होगा।

बाकी लोग जैसे 'फ़ेड आउट' हो गये थे, निरपेक्ष हो गये थे। सापेक्ष थे तो आपस में केवल वही दोनों- रक्तध्वज और कमलाकांत। दोनों की सोच में डूबी हुई आँखें मिलीं...चारों आँखों में कसक थी, असहायता के भाव थे। कमलाकांत धीरे से बोले, ''कॉमरेड मैं समझता था कि कम्युनिस्ट इतने भावुक नहीं होते... लेकिन...'' उन्होंने आँखें घुमा लीं।

रक्तध्वज जी के अंदर ग़जब की तितिक्षा थी। बहरहाल, वह एक कम्युनिस्ट इंसान थे। उन्होंने किसी ईसाई संत की तरह कमलाकांत की पीठ पर हाथ रखा, ''कॉमरेड-अ मतवेदों का मैंने कबी बी बुरा नईं माना है। मैंने हमेशा से कुले विचारों का स्वागत किया है।'' हठात उनके स्वर में बदलाव आ गया, खट्टी डकारें ले रहे हों जैसे, ''संसदीय पद्दति को आप पसंद नईं करते...चलिए मैं बी नईं करता... लेकिन मैं पूचता हूँ, यदि जनता आपको ही चुन दे तो आप क्या करेंगे? चुनौती से मुँह मोड़ लेंगे या...?''

''जनता हमें चुन कब पाती है, कॉमरेड?'' कमलाकांत के होंठों पर एक तिक्त मुसकान आ गयी, ''हाँ, चुनाव जीतने के लिए यदि हम भी उन्हीं चौरासी आसनों और चौंसठ कलाओं का सहारा लें तो बात अलग है।''

''साम्यवादी क्रांति के पहले जनवादी पड़ाव को पार करना ही होगा, कॉमरेड-अ उपाद्याय! आप बुनियादी बूल कर रहे हैं। इसके लिए जनता को इसी जनतंत्र में बागीदारी लेनी होगी। चुनने अउर मत व्यक्त करने की जो आजादी मिली हुई है। उसे बी चोड़ देने पर तो वर्गशत्रुओं को अउर सुविदा हो जायेगी।'' अब भी दुर्धर्ष चट्टान की तरह दीख रहे थे कॉमरेड रक्तध्वज।

''सतमासे बच्चे की तरह अविकसित भारतीय जनतंत्र में हमें जो थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता मिली हुई है, उसका वर्गहित में इस्तेमाल करना मैं भी पसंद करता हूँ। लेकिन व्यूह के भीतर घुसपैठ के साथ-साथ बाहर से भी आक्रमण करना पड़ेगा। बाहरी और भीतरी आक्रमण के बीच एक तालमेल होना चाहिए। अगर सिर्फ़ चुनाव तक ही अपने को समेट लें तो जनतंत्र में चुनने और मत व्यक्त करने के लिए जिस सामाजिक विवेक की जरूरत पड़ती है, उसे हम खो देंगे।'' कमलाकांत बिना किसी हिचक के अपनी बात रखते जा रहे थे ''...यह सामाजिक विवेक जनसंघर्षों के लम्बे अनुभव से ही अर्जित किया जा सकता है। मैं उनमें भी इस विवेक का अभाव देखता हूँ, जिनका दावा है कि उन्होंने हमें सभ्य बनाया, प्रजातंत्र का शऊर सिखाया। जी हाँ, कॉमरेड! उसी ब्रिटेन के एक चुनाव के बारे में मैंने कहीं पढ़ा था कि एक बार कावेंट गार्डन की सीट से कोई चार्ल्स फॉक्ट चुनाव लड़ रहे थे। उनकी एक जवान और खूबसूरत दोस्त जो शायद डेवन शायर की डचेस थी, ने उनको जिताने का एक उपाय सोचा। उसने प्रचार किया कि चार्ल्स को वोट देने वाले हर मतदाता को वह अपना चुंबन देगी। फिर तो ब्रिटेन की सबसे सुंदर डचेस का चुंबन पाने के लिए मतदाताओं में चार्ल्स को वोट देने की होड़ लग गयी। इससे घबराकर विरोधी पक्ष वाले मतदान केन्द्र पर 'लेडी सेल्सबरी' को ले आये, लेकिन लेडी सेल्सबरी सुंदरता में डचेस से एक कदम पीछे थीं, इसलिए जीत अधिक सुंदरता की हुई। अब यदि फोटो देखकर छाप मारने वाली भारतीय जनता मदारियों, भांडों और बहुरूपियों के झाँसे में आ जाती है तो क्या दोष?''

रक्तध्वज जी की एक घुटी-सी कराह निकल गयी। उन्होंने एक ठंडी साँस ली और नपे-तुले शब्दों में बोले, ''कॉमरेड-अ कमलाकांत, आपको जवाब देने की स्थिति में कुद को नईं पा रहा हूँ, न मैं यई कह सकता हूँ कि बारतीय जनता के विक्छोब को कउन-सी पार्टी-ई लीड-अ कर ले जायेगी। वह कोई चोटी-सी बी पार्टी-ई हो सकती है या कई पार्टी के संगटन से बनी कोई बड़ी पार्टी-ई बी। कैर, आपके संतोष के लिए इतना बता दूँ कि सचमुच यदि जरूरत हुई तो अपने आप हमारे पास हतियार आ जायेगा।'' अपने को संयत रखने की तमाम कोशिशों के बावजूद रक्तध्वज जी के शरीर में कँपकँपाहट थी, वाणी में निढालपना था, चेहरे पर दुविधा थी। वह चादर से अपने शरीर को बार-बार ढँकते हुए जम्हाइयाँ लेने लगे, ''अब चला जाय।''

''हाँ-हाँ, जाइए, कल से आपको बिहार का अध्ययन भी करना है न! खूब मोटी थीसिस लिखिएगा।'' व्यंग्य से कमलाकांत का चेहरा लम्बोतरा हो गया, ''बिहार प्रांत भी अजीब है, कॉमरेड! राजनीतिज्ञों को यह हरे-भरे चरागाह की तरह आकृष्ट करता है। इतना ही नहीं, लेखकों-कवियों-बुद्धिजीवियों को यहाँ का यथार्थ परीकथाओं की तरह आकृष्ट करता है। जलती हुई शमा के इर्द-गिर्द टूटते पतंगों की तरह सभी खिंचे आते हैं यहाँ, लेकिन अभागे बिहार की नियति को बदलने का समय आता है तो सब शिखंडी बनकर ताकने लगते हैं, दूसरों के द्वारा तीर चलाने की प्रतीक्षा में खड़े रहते हैं सब।''

रक्तध्वज जी के केवल होंठ फड़फड़ाकर रह गये। किसी अल्हड़ युवती के दुपट्टे की तरह उनकी चादर बार-बार सरकी जा रही थी। उसे किसी तरह संभालते हुए वह सोने वाली कोठरी में घुस पड़े।



कमलाकांत अब वहाँ किसलिए ठहरते। खड़े होकर उन्होंने एक लंबी जम्हाई ली। मीटिंग के पहले जिस जाड़े को वह छोड़ आये थे, अब मौका पाकर वह उनके कंधे पर सवार हो गया और बड़े प्यार से अपना यख हाथ उनके बदन पर फिराने लगा। सर्द हवा का एक तेज झोंका आया और उसके कुछ कतरे उनके कानों में समा गये। सीत्कार के साथ उन्हें अपनी चादर का होश आया। हड़बड़ाकर वहाँ गये, जहाँ चादर उतारी थी... चादर लेकिन नदारद थी। बड़े परेशान हुए।

''का खोज रहे हैं?'' भूइलोटन गड़ेरिया ने पूछा।

कमलाकांत को पत्नी याद आयी... आते समय भी वह चादर खोज रहे थे और जाते समय भी चादर ही। कैसा संयोग है! ''चदरिया नहीं मिल रही है, भाई!''

शीत लहर भेड़ों के झुंड की तरह चल रही थी... माघ की रात का अंतिम पहर।

''ऊ तो मास्टर साहेब ने लिट्टी झड़वा दी उससे।'' मद्धिम ने याद करते हुए बताया।

''तुमने रोका भी नहीं'' कमलाकांत को रामगोबिन मास्टर पर बेपनाह गुस्सा आया। वह आड़े के पास चले गये। उपले के ढेर पर पड़ी चादर राख और धूल से बुरी तरह किन-किन हो चली थी। वह पछीट-पछीटकर उसे झाड़ने लगे, लेकिन शीत के चलते राख चिपट गयी थी। भद्दा-सा मुँह बनाते हुए उसे वहीं पटक दिया और अलाव के पास चले गये। अलाव कब का बुझ चला था... राख में दुबकी लूतियाँ यदाकदा झिलमिला जाती थीं। तब तक उनकी नजर बरामदे में खूँटी से लटकते लाल रूसी कोट से टकरायी... उनकी आँख चिनगारी की तरह जल उठी।

वह तड़पकर उठे और चल दिये।

पीछे पैरों की आहट सुनायी दी... पलटे तो देखा कि भूइलोटन गड़ेरिया, मद्धिम यादव और जियावन रैदास चले आ रहे थे। ''कामरेड, ई कम्मरवा ओढ़ लीजिए।'' भूइलोटन ने भरे गले से कहा।

''और तुम? तुम कैसे जाओगे, साथी?''

''अं-हं ऽऽऽ। ठीक है। हमनी का दुनो आदमी ओढ़ि के चलते हैं।'' उन्होंने अपना कम्बल इस तरह फैला लिया जैसे किसी शिशु चिड़िया को उसकी माँ अपने पंख में समेट लेती है।

...दो बेटे-दो बाप, बीच जिनके तीन ओढ़ना

एक-एक कम्बल उन्हें दे दो, नहीं किसी को खुला छोड़ना

बच्चो, जरा हिसाब जोड़ना...

अभी भी कभी-कभार मौका मिलने पर वह बच्चों के साथ बैठ जाते हैं और उनसे इसी तरह का 'बैठौव्वल' पूछा करते हैं। इसे चुटकियों में हल करता हुआ वह काफ़िला बढ़ने ही वाला था कि रामगोबिन मास्टर दाँत खोदते हुए आ निकले। उन्होंने आँखें झपका कर कुछ पल तक उन चारों को देखा, फिर टोक ही तो दिया, ''भूइलोटन भाई, तुम कहाँ?''

''उपधेया जी के साथे... इनके पहुँचाने बदे।''

''तुम्हारा भी दिमाग खराब हो गया। सब कुकुर काशी ही जावेंगे तो हांड़ी ढूँढ़ने वाला भी कोई चाहिए न?''

मास्टर साहब तुनककर बोले। उन्होंने अपने अधिकार का प्रयोग किया, ''मैं कहता हूँ...तुम लौट आओ।''

उनकी अनसुनी करते हुए एक कम्बल के दो ओढ़वैए चल पड़े। रामगोबिन मास्टर को कुछ शुबहा हुआ, ''कंबलवा में कुछ छुपाये हो क्या?''

इस कुत्सित मनोवृत्ति पर उन लोगों को ठिठक जाना पड़ा, मास्टर साहब का संदेह गहराया। कोट उन्होंने भूइलोटन को ही रखने के लिए दिया था और आँख गड़ा-गड़ाकर वही उसे देख भी रहे थे। वह लपककर आगे गये और कम्बल खींचने लगे, ''रक्तध्वज जी का कोटवा तो नहीं लिये भाग रहे हो?'' उन्होंने भरपूर जोर लगाया कि लहंगाझारी कर लें।

''काहे कलंक लगाते हैं, मास्टर साहेब?'' भूइलोटन व्यथित होकर बोले, ''कोटवा ऊ देखिए खूँटी पर लटक रहा है।''

मास्टर साहब सकुचा-से गये।

'अपजस लागत लाज परानी'...कमलाकांत को गुस्सा उसी घड़ी आया था, जब चादर की दुर्गति देखी थी। उन्होंने आव देखा न ताव, झटके से बढ़े और कोट उतार लिया। अगले पल वह उनके बदन पर था। ''अब समझिए कि मैं ले जा रहा हूँ।''

रामगोबिन मास्टर ने लपककर कोट की आस्तीन पकड़ ली, ''मैं अकारण शक नहीं कर रहा था। आपकी नीयत अपने-आप व्याप गयी।'' वह वहीं से चीखने-चिल्लाने लगे। चख-चख सुनकर एक बार फिर लोग एकत्र हो गये। कमलाकांत और रामगोबिन मास्टर के बीच छीनाझपटी जारी थी। बटन खुला कोट उनके बदन पर ऐसे झूल रहा था जैसे कोई बड़े-बड़े लाल डैने वाला मुर्ग लड़ाई में झपट्टा मारने पर उतारू हो।
चक्रधर जी ने डाँटकर पूछा, ''यह कैसी बेहूदगी हो रही है?''

''रक्तध्वज जी का कोट चुराकर भाग रहे थे कमलाकांत।'' रामगोबिन मास्टर ने हाँफते हुए बताया, ''यही इनका सशस्त्र संघर्ष है। इसी के बहाने लूटपाट करना चाहते हैं। अरे, छिनाल का वश चले तो समूचे बधार में अरहर बुवा दे।''

रक्तध्वज जी को विश्वास न हुआ तो पास सरक आये और थरथराती आवाज में बोले, ''चुराने की क्या जरूरत ती, कामरेड-अ?''

कमलाकांत ने अट्टहास किया, ''ठंड से बचने का एक हथियार है कोट, जो अपने-आप मेरे हाथ लग गया। वाकई इसकी जरूरत है मुझे। आपने कहा था न, कॉमरेड! यदि सचमुच जरूरत हुई तो अपने आप हमारे पास हथियार आ जायेगा।''

रक्तध्वज जी भौंचक रह गये। वह बुरी तरह काँपने लगे। न जाने क्यों?... अपमान से या नुकसान से, युयुत्सा से या कुत्सा से, पकड़ से छूटते कालखंड से या बूँद-बूँद टपकती ठंड से...

कमलाकांत ने हँसते हुए कोट उतार दिया और बोले, ''मैं तो नब्ज टटोल रहा था कॉमरेड! आप जादुई कोट पहनकर सैद्धांतिक किताबें लिखिए। परवाह मत कीजिए कि कोई बात गाँव के लोगों की समझ में आयी या नहीं। हमें हमारी हालत पर छोड़ दीजिए। हम खुद निबट लेंगे।'' कमलाकांत की आवाज काफी ठहरी हुई थी, जैसे उन्होंने कोई फ़ैसला कर लिया हो। आगे बढ़कर उन्होंने कोट रक्तध्वज जी की ओर धीरे से बढ़ा दिया।

रक्तध्वज जी ने जल्दबाजी में कोट उलटा ही पहन लिया और तमतमाये हुए लौटने लगे। उनके साथ के खड़े लोगों ने कमलाकांत को ख़ौफ़ से देखा और रक्तध्वज जी के पीछे एक-एक कर लौटने लगे।

एक विचित्र-सी मुद्रा में कमलाकांत उपाध्याय उनका गुजरना देखते रहे। उनकी आँख के आगे लाल रंग वाले कोट-ही-कोट तैरने लगे...फ़क़त चलते-फिरते कोट, उनमें आदमी नहीं। हठात ये कोट उलटे लटक गये... धुंध में उनके सामने अब एक सीधा-सुधेर पीपल का वृक्ष उगना शुरू हुआ... और कुछ ही क्षणों में वह पूरा उग गया। कमलाकांत को शांति-सी मिली कि अब उन्हें बोलना न पड़ेगा... अब सारा वाक़या अपने-आप बयान हो जायेगा। लेकिन उनके कानों ने एक शब्द भी न सुना। चारों तरफ़ पागल सन्नाटा तारी था... उस सन्नाटे में ही उन्होंने देखा बिना सिर के चार उलटे लटके हुए धड़ टंग गये- पीपल की डालों से झूलते चार धड़!

कुदरत का धुनिया रात-भर ओसों की रुई धुनते-धुनते थक चला था। अब उसके चारों ओर धुनी हुई रुई की तरह कुहरे के पहाड़ खड़े थे। लेकिन कमलाकांत गाँव के ही आदमी हैं, उन्हें भटकने का भय नहीं, अपने शेष साथियों के साथ उनके सधे पाँव आगे बढ़ते गये।

(फरवरी, १९८९ में 'हंस' में प्रकाशित)



भोजपुर (बिहार) जिले के बलुआँ गाँव के एक व्यक्ति थे कमलनाभ उपाध्याय। मिडिल स्कूल में शिक्षक थे। वह पार्टी करते थे। कर्मठ, ईमानदार, परदुखकातर, समर्पित और मिलनसार प्रकृति के थे। जन्मना ब्राह्मण थे, लेकिन ब्राह्मणवाद से घृणा करते थे। दलित-दमित, शोषित-पीड़ित लोगों से सहजता से जुड़ जाते थे। मानवता के निकष पर खरे थे, लेकिन सवर्ण समाज में बेहद बदनाम भी थे।

मेरे साथ उनकी खूब छनती थी। वय वरिष्ठ होने के बावजूद कमलनाभ जी से मेरा दोस्ताना संबंध था। जब भी छुट्टियों में गाँव जाता तो उनसे जरूर मिलता। दुनिया-जहान, राज-समाज की खूब बातें होतीं। संस्मरण सुनाने में माहिर थे।

संभवतः जनवरी 86 की घटना होगी। एक शाम बड़े घबराए हुए से मिले। ठंड के बावजूद पसीने से लथपथ थे। घबराहट की वजह जाननी चाही, तो बोले कि यार! एक बहुत बड़ी गलती हो गयी है। मैंने पूछा कि क्या? तो झोले से एक लाल ओवरकोट निकालकर दिखाने लगे, 'इसे लेकर चला आया हूँ।' फिर तो पूरे विस्तार से उन्होंने माघ के महीने में गंगा के दियारे में स्थित एक गाँव में हुई उस पार्टी मीटिंग का पूरा ब्यौरा देना शुरू कर दिया। उस मीटिंग में बाहर से भी कई कॉमरेड आये हुए थे। पूरी घटना सुनने के बाद मैंने पूछा कि अब क्या होगा? बोले कि पार्टी से निकाल दिया जाऊँगा, मेरे ऊपर नक्सलवादी होने का ठप्पा मार दिया गया है। मैंने कहा कि तब आप ऐसी ही किसी समानधर्मा पार्टी से जुड़ जाइए। कमलनाभ उपाध्याय बहुत मायूस होकर बोले, ''वहाँ भी तो कोई समझदारी नहीं देख रहा हूँ। आमूलचूल परिवर्तन के बदले वहाँ भी वर्चस्ववाद की लड़ाई चल रही है, मेरे जैसा आदमी शायद हर जगह दुत्कारा ही जाएगा!''

पहली बार कमलनाभ उपाध्याय को इतना व्यथित और बेचैन देखा मैंने। यथार्थ का यही सचखंड मेरे हाथ लगा था। मैंने उनकी व्यथा को अपने मनोकोष में सहेज लिया कि सच्चे और प्रतिबद्ध लोगों की बेचैनी क्या चीज होती है। जनवरी 1986 से शुरू हुई लिखाई अक्टूबर 1988 में पूरी हुई। नवंबर 1988 में राजेंद्र यादव जी को प्रकाशनार्थ भेजी। फरवरी 1989 में कहानी 'हंस' में प्रकाशित हुई। इसके बाद की कहानी सबको मालूम है। लेखक और संपादक पर खूब हमले हुए। 'हंस' के साथ-साथ अन्य पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों में भी लगभग डेढ़ दो वर्ष तक लगातार बहसें जारी रहीं। इस कहानी ने मेरे लिए दोस्त कम दुश्मन ज्यादा पैदा किये। आज भी मुझे भद्र साहित्यिक समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता।

-सृंजय