@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: Crazy
Crazy लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Crazy लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 23 मार्च 2011

सपने को सच होने से कोई रोक नहीं सकता

ह निरा मूर्ख, दीवाना और निहायत पागल इंसान ही रहा होगा। उस की कौम के करीब डेढ़ सौ लोगों को जिन्दा जला डाला गया था। पूरी कौम सदमे में थी और बदले की आग से जल रही थी। तब वह अपनी मादरेजुबान पढ़ रहा था। उस पर लिख रहा था कि उस का क्या महत्व है। फिर उस ने दुनिया भर के सारे प्रसिद्ध लेखकों को पढ़ना आरंभ कर दिया। वह खुद तो उन्हें पढ़ता ही था, औरों को भी पढ़ने को कहता था। बदले की आग लगातार सीने में धधक रही थी। वह केवल उन लोगों से बदला नहीं लेना चाहता था जिन्हों ने, जिन के इशारे पर और जिन की मदद से कौम के लोग मारे गए थे। वह तो उन तमाम लोगों से बदला लेना चाहता था जो इंसान का खून चूसते थे और अपने कपड़ों पर दाग भी नहीं लगने देते थे। 
फिर उस ने अपने ही जैसे मूर्खों, पागलों और दीवानों को तलाश करना आरंभ कर दिया। वह सब  को किताबें पढ़ने को कहता, जो नहीं पढ़ते उन्हें खुद पढ़ाता। उसे अपने जैसे लोग मिलने लगे। वह फिर भी संतुष्ट नहीं था कि वह दुनिया के तमाम कातिलों को समाप्त कर सकता है। वह जानता था कि यह लंबा काम है और शायद अपने जीवन में न कर पाए। उस में जरा भी अक्ल होती तो असंभव दिखने वाले काम को छोड़ता। अपनी पढ़ाई का लाभ उठाता, रायबहादुर बन बैठता, और रुतबा बढ़ाता। लेकिन उस मूर्ख पर तो पागलपन सवार था। उस ने घर भी छोड़ दिया और इधर-उधर घूमता रहा। जरूरत पड़ती तो भेस भी बदलता। धीरे-धीरे उस ने गिरोह बना लिया। 
भी पागलों की तरह उसे भी विश्वास हो चला था कि लोग बहरे हो चुके हैं, उनकी खालों पर परत-दर-परत मैल जम गया है। खालों का मैल उतारने को उन की धुलाई करनी होगी, बहरों को सुनाने को धमाका करना पड़ेगा। पर उस में तो खतरा था, जान जाने का खतरा। पर पागलों के लिए जान की क्या कीमत है?  लोग भी तो चाहते हैं कि ऐसे पागल जो सभी को परेशान करते हैं, मर ही जाएँ तो अच्छा है। उस ने मरना कबूल कर लिया। कुछ लोगों ने कहा कि वह फिजूल मर रहा है, वह पढ़ा-लिखा है कुछ कर के दिखा सकता है। उस की जगह वे मरने को तैयार हैं। पर पागल की जिद तो जिद है, उसे कोई जीत पाया है? फिर पढ़ा-लिखा पागल, उस ने सब को तर्क-हीन कर दिया। अब उसे मरने से कौन रोक सकता था? वह मरने चल दिया। मरने से पहले उस ने धमाका किया। बहरों के कान खुल गए। वे सुनने लगे, समझने लगे। पर उन की समझ कमजोर रह गई। उन्हों ने कौम के हत्यारों के मददगारों को तो अपने देस से जाने को मजबूर कर दिया। लेकिन हत्यारों के साथ समझौता कर लिया। अब हत्यारे सरे आम हत्या करते हैं। लेकिन किसी पागल का खून नहीं उबलता। कोई मूर्ख उत्तेजित नहीं होता, दीवानगी इतिहास की चीज हो गई। 
लोग उस की शहादत के दिन मेले लगाते हैं, उस की मूर्तियाँ तलाश कर उन्हें धोते हैं, रंगते हैं और मालाएँ चढ़ाते हैं। उन्हों ने उस मूर्ख, दीवाने और पागल को भगवान का दर्जा दे दिया है। वे सोचते हैं कि एक दिन भगवान अवतार लेगा और उन की धरती को हत्यारों से मुक्ति दिला देगा। वे भूल गए कि उन का भगवान तो खुद किसी भगवान को नहीं मानता था और न ही पुनर्जन्म को। वह जानता था कि हत्यारों से मुक्त होना है तो दीवानों की फौज खड़ी करनी होगी। हत्यारों को नष्ट करना होगा। फिर दुनिया बदलनी होगी। एक नई दुनिया बनानी होगी। जिस में कोई हत्यारा नहीं होगा, किसी को किसी का खून चूसने की आजादी नहीं होगी। लोग कहते हैं, यह उस का सपना था, और सपने भी कहीं सच होते हैं? 
ज कुछ लोग मिले, जो उसी की तरह मूर्ख थे, पागल भी और दीवाने भी। उन्हों ने भी उस की तस्वीर को माला पहनाई और कसम खा कर कहा कि वे भी उसी का जैसा सपना देखते हैं और उसे सच कर के दिखाएंगे। सपने को सच कर दिखाने के लिए कुछ भी करेंगे। अपने जीवन में उसे सच न कर सके तो ऐसे लोगों की फौज खड़ी करेंगे जिन की पीढ़ियाँ भी मूर्खों, पागलों और दीवानों की होंगी, और तब तक होती रहेंगी जब तक सपना सच नहीं हो जाता।  मुझे लगा कि अब सपने को सच होने से कोई रोक नहीं सकता। 


गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कुछ दिनों के शहंशाह से मुलाकात

प नौकरी करते हैं, हर माह वेतन मिल जाता है। भविष्य की सुरक्षा के लिए भी कुछ न कुछ पीएफ आदि में जमा होता है। चिकित्सा और दुर्घटना के वक्त की भी कुछ न कुछ सुरक्षा रहती है है। आप कोई ठीक ठीक व्यवसाय करते हैं तो भी कुछ न कुछ जमा कर के रखते हैं या फिर जमा को कहीं नियोजित कर अपनी सुरक्षा कर लेते हैं। मगर दुनिया में बहुत लोग ऐसे होते हैं जो सुबह कमाने निकलते हैं और शाम कुछ लेकर आते हैं तो जिन्दगी चलती है। इन में से कुछ तो बचत कर रखते हैं। इस श्रेणी के कुछ लोग कुछ ऐसे धंधों में उलझे रहते हैं जिस में कभी मालामाल तो कभी कंगाल वाली स्थिति रहती है। ये सटोरिए, जुआरी या लाटरीबाज कुछ भी हो सकते हैं। इन्हीं में से एक से इन दिनों मुझे मिलने का अवसर मिला।
 मैं एक मुकदमा लड़ रहा हूँ। जिस में एक विधवा स्त्री ने एक मकान के बंटवारे का मुकदमा किया हुआ है। मकान की कीमत कोई 24-25 लाख है। उस विधवा स्त्री का हिस्सा भी 1/24 ही है। इतना ही उस की दो बेटियों और उस के पुत्र का है,  बाकी हिस्से उस के देवरों के हैं। मुकदमा करने के बाद जब प्रतिवादियों को समन मिले तो उन में से एक देवर सीधे मेरे पास चला आया कहने कि आप ही मेरा मुकदमा लड़ लें। मैं ने मना कर दिया कि मैं तो आप की भाभी का वकील हूँ और आप प्रतिवादी हैं। दूसरा वकील करना पड़ेगा। उस ने मेरे नजदीक बैठने वाले एक वकील को तय कर लिया, उन्हों ने उस की ओर से वकालतनामा दाखिल कर जवाब पेश करने के लिए समय ले लिया। अगली पेशी पर वह नहीं आया, न ही वकील से संपर्क किया और न ही उन्हें फीस दी। वकील साहब ने एक पेशी ले ली, वह फिर भी नहीं आया। मुकदमे में उस का जवाब पेश करने का अवसर समाप्त कर दिया गया। विवाद्यक बन गए और मुकदमा साक्ष्य में आ गया। मैं ने अपनी मुवक्किल की ओर से गवाह सबूत पेश कर दिए। मुकदमा प्रतिवादियों की गवाही के लिए निश्चित हो गया। 
चार दिन पहले इस मुकदमे में पेशी थी। सुबह अदालत के लिए रास्ते में ही फोन आया कि आप अभी तक कोर्ट नहीं आए और हम यहाँ आप का इंतजार कर रहे हैं, मैं ने फोन करने वाले को नहीं पहचाना। अदालत पहुँचने पर मेरे कनिष्ठ ने बताया कि एक आदमी आप को तीन बार पूछ गया है, पागल सा लगता है और उस महिला के मुकदमे से संबंधित है। मैं उसी मुकदमे में अदालत जाने वाला था कि वह व्यक्ति आ गया। आते ही बोला -आप मुझे मुकदमे की फाइल दे दें। मैं ने पूछा -भाई तुम कौन हो? उस ने बताया कि वह उस विधवा स्त्री का देवर है। मैं ने उस से कहा -तुम तो हमारे प्रतिवादी हो तुम्हें फाइल कैसे दे दूँ? तुम मेरी मुवक्किल को भेज दो उसे दे दूंगा। इस पर वह बिफर उठा -आप ने कुछ नहीं किया, साल भर हो गया। आप फाइल कैसे नहीं देंगे? मैं ने उसे कहा कि तुम हमारे मुवक्किल नहीं हो, मैं तुम्हारे खिलाफ वकील हूँ। तुम्हें मुझ से बात नहीं करनी चाहिए। तुंम यहाँ से जाओ। इस पर वह लड़ने को उतारू हो गया। मुझे भी कुछ गुस्सा आया। मैं ने उसे डांटा भी। एक बारगी तो मन में आया कि उसे एक-दो हाथ जड़ दूँ। पर उस से क्या होगा? यह सोच रुक गया। इतने में मेरे कनिष्ठ उसे पकड़ कर ले गए और दूर छोड़ आए। इस बीच हो-हल्ला सुन कर भीड़ इकट्ठी हो गई। 
कुछ देर बाद मैं अदालत में पहुँचा वहाँ एक और प्रतिवादी के वकील मिले। उन्हों ने बताया कि वह कल शाम दारू पी कर उन के दफ्तर पहुँचr था और उन्होंने उसे भगा दिया था। मुझे कहने लगे उस की तो पिटाई कर देनी चाहिए थी। मैं ने उन्हें कहा कि इस का हमें क्या हक है? हर किसी को सिर्फ न्यूसेंस को हटाने का हक है वह हम ने हटा दिया। कुछ देर बाद वह व्यक्ति भी एक वकील के साथ न्यायालय में आ गया। जिस वकील को साथ ले कर आया था वह कहने लगा कि उन्हें तो केवल हमारी केस फाइल की प्रतिलिपि चाहिए ताकि वे आगे कार्यवाही कर सकें। मैं ने उन्हें बताया कि पहले एक और वकील इन के वकील रह चुके हैं, उन के पास इस की फाइल होगी और उन की अनुमति य़ा अनापत्ति के बिना दूसरा वकील इस में आ नहीं सकता। आप के मुवक्किल को उन से संपर्क करना चाहिए। मुकदमे में उस दिन की कार्यवाही के बाद अगली पेशी हो गई। 
ज सुबह मैं एक नए मुकदमे में अपने मुवक्किल की ओर से वकालतनामा दाखिल करने के लिए उस अदालत में जा रहा था कि सीढ़ियों के नीचे वही व्यक्ति मुझे दिखाई दे गया। उस ने मुझे नमस्ते किया और मेरी ओर आने लगा तो पास में खड़े सिपाही ने उस का हाथ पकड़ लिया। सिपाही के साथ ही वह मेरे नजदीक आया, तो मैं ने देखा कि उस के हाथ, पैऱ चेहरा सब सूजे हुए हैं, जैसे उसे खूब मारा गया हो। मैं ने पूछा -ये क्या हुआ?  सिपाही ने जवाब दिया कि इस के खिलाफ 4/25 शस्त्र अधिनियम का मुकदमा बना है। वह कहने लगा -साहब मुझे तो घर से उठा कर ले गए, थाने और वहाँ खूब पिटाई की है, मुझे पूरा सुजा दिया है और मेडीकल भी नहीं करवा रहे हैं। मैंने उसे कहा -तुम्हें मजिस्ट्रेट को ये सब बताना चाहिए। उस ने कहा -मजिस्ट्रेट के सामने तो मुझे पेश ही नहीं किया। सिपाही ने मुझे बताया कि -इस की जमानत देने वाला कोई नहीं आया इसलिए इसे जेल ले जाना पड़ेगा। फिर कहने लगे -इस का मामला ऐसा ही है, यह साल में कम से कम एक बार तो अंदर हो ही जाता है।  यूँ तो अपनी जरूरत के मुताबिक कमाने में ही इस का इतना समय निकल जाता है कि यह केवल शरीफ ही बना रह सकता है।  लेकिन यह थोड़ा बहुत सट्टा वगैरा लगाता रहता है। कभी लग गया, तो इकट्ठा पैसा मिलते ही यह बादशाह और थोड़ी शराब गले से नीचे उतरते ही शहंशाह हो जाता है। फिर किसी को कुछ नहीं समझता। किसी से लड़ पड़ता है, मारपीट कर देता है। जिस से लड़ेगा वह पुलिस के पास ही आएगा। फिर हम इसे पकड़ लाते हैं। नशे की हालत में यह पुलिस को भी कुछ नहीं समझता। ऐसे बात करता है  जैसे पुलिस कमिश्नर लगा हो। तब इस की यह हालत होती है और कुछ दिन बड़े घऱ का मेहमान बन कर लौटता है।
मैं कहानी समझ गया था कि हर बार पुलिस इसे पुलिस एक्ट में या शांति भंग के आरोप में पकड़ती होगी और यह एक-दो दिन में छूट जाता होगा और मुकदमा भी वहीं समाप्त हो जाता होगा। इस बार पुलिस ने इस से  कोई धारदार हथियार या तो वाकई बरामद कर लिया है और नहीं तो बरामद करना दिखा कर लंबा तान दिया है ताकि कम से कम तारीखें तो करेगा। शायद इसी से इस की ये आवारगी काबू में आ जाए।