Sunday, April 28, 2013

ये आग नहीं बुझेगी

ल सुबह टंकी पर चढ़े सेमटेल-सेमकोर पिक्चर ट्यूब कारखानों के श्रमिक प्रशासन से बातचीत और आश्वासनों के बाद शाम को टंकी से नीचे उतर गए। पर प्रश्न है कि क्या प्रशासन उन्हें उन का बकाया वेतन दिलवा सकेगा? कारखाने 7 नवम्बर 2012 को बंद हुए थे। अक्टूबर 2012 के पूरे महिने श्रमिकों ने पूरी मेहनत से काम किया था और क्षमता से अधिक उत्पादन किया था। उस माह का वेतन भी आज तक बकाया है। इस वेतन को वसूल करने के लिए एक मुकदमा श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ पेश किया गया। जिस में निर्णय हुए आज चार माह हो चुके हैं। लेकिन न तो राज्य सरकार मालिक से वेतन की वसूली कर सकी है और न ही वसूल करने के लिए कंपनियों की संपत्ति पर कुर्की का कोई आदेश जारी कर सकी है। उलटे मालिक ने कारखाने बंद करने की जो अनुमति सरकार से मांगी थी उस आवेदन का 60 दिन में निर्णय कर के मालिक को सूचित न करने के कारण मालिक को स्वतः ही अनुमति मिल गई है। 

 
स से स्पष्ट है कि राजस्थान सरकार मालिकों के साथ है। मजदूरों के लिए उस के पास कुछ नहीं है। लगता है सरकार में बैठे मंत्रियों कि निगाहें इस कारखानों की बेशकीमती जमीन को हथिया कर उसे  बिल्डरों को बेच कर करोड़ों के वारे न्यारे करने की योजना की तरफ हैं। मजदूरों का क्या वे छह माह से हकों की लड़ाई लड़ रहे हैं कितने दिन लड़ेंगे। जब खाने को नहीं बचेगा और किरानी और मकान मालिक अपने पैसों के लिए दबाव डालेंगे तो वे अपने आप मैदान छोड़ कर भाग जाएंगे।  आज देश में जो सरकारें हैं वे इसी तरह काम कर रही हैं। उन्हें काम करने वालों से बस इतना मतलब है कि काम करने के वक्त वे काम करते रहें। उन्हें उन की मजदूरी और उन के हक मिलें न मिलें इस की उन्हें कोई परवाह नहीं।

लेकिन जो आग मजदूरों में, उन के परिवारों के सदस्यों में, स्कूल जाने वाले बच्चों में पैदा हुई है वह नहीं बुझेगी। सरकार और पूंजीपति समझ रहे हैं कि उस पर राख पड़ जाएगी। पर आग तो आग है, वह राख के नीचे भी सुलगती रहेगी। फिर यह आग पेट की भूख से पैदा हुई है जो कभी नहीं बुझती।  इन मजदूरों के परिवार कुछ महिनों में अपने अपने गाँव चले जाएंगे या फिर रोजगार की तलाश में देश के विभिन्न हिस्सों में चले जाएंगे। सरकार, नौकरशाह और पूंजीपति समझेंगे काम खत्म। लेकिन ये लोग देश के जिस भी हिस्से में जाएंगे आग को साथ ले जाएंगे।  

रकार, नौकरशाह और पूंजीपति जान लें कि उन्हों ने हनुमान नाम के बंदर की पूंछ में आग लगा दी है। उस की पूंछ की यह आग तभी बुझेगी जब लंका के तमाम सोने के महल आग की भेंट न चढ़ जाएंगे।

Saturday, April 27, 2013

मजदूरों के पास लड़ने और मर मिटने के सिवा रास्ता क्या है?

सेमकोर ग्लास लि. और सेमटल कलर लि. के पिक्चर ट्यूब बनाने वाले दो कारखाने कोटा में हैं। पिछली नवम्बर में दोनों कारखानों को चलता छोड़ कर प्रबंधन चलता बना। कारखाना रह गया और मजदूर रह गए। कारखाना बंद हो गया। प्रबंधन ने अनेक दस्तावेजों में खुद यह माना कि कारखाना बंद हो गया है और अब वह नहीं चला सकता। लेकिन कारखाना सरकार से इजाजत लिए बिना बंद करना अपराध है। इस लिए बाद में कारखाना बंद करने की अनुमति के लिए सरकार के पास प्रबंधन ने आवेदन प्रस्तुत किया। मई और जून 2013 में कारखाने को बंद करने की अनुमति मांगी गई। राजस्थान सरकार ने न तो अनुमति दी और न ही इन्कार किया। कुल मिला कर प्रबंधन को अनुमति मिलना मान लिया गया क्यों कि कानून यह है कि यदि राज्य सरकार आवेदन देने के 60 दिन में आवेदन को निरस्त करने का आदेश प्रबंधन को न पहुँचाए तो प्रबंधन को यह मानने का अधिकार है कि उसे कारखाना बंद करने की अनुमति मिल गई है। यानी सरकार ने अनुमति नहीं दी, उस में सरकार को आदेश लिखना पड़ता जिस में कलम घिसती ऊपर से मजदूरों का बुरा बनना पड़ता। इसलिए सरकार चुप हो गयी। अब जबर किसी को मारे और राजा जी चुप रहें इसे राजा जी का अन्याय थोड़े ही कहा जाएगा। अब कारखाने के मालिक खुश हैं और मजदूर साँसत में। 

कारखाने अभी कागज में बंद नहीं है। एक मई में और दूसरा जून में बंद होगा। मजदूरों को अक्टूबर 2012 से वेतन नहीं मिला है। मजदूर खूब आंदोलन कर चुके हैं। उन्हों ने सब किया है। सरकार और प्रशासन कहता है कि वे उन की पूरी मदद करेंगे। लेकिन कोई करता नहीं है। परदे के पीछे से सब मालिक की मदद करने पर उतारू हैं। अब मजदूर न सरकार का पेट भर सकता है और न अफसरों का वह तो केवल कारखाने का मालिक ही भर सकता है। मजदूर पहले मार्च 2013 में पानी की टंकी पर चढ़ गए थे। तब मुख्यमंत्री के आश्वासन पर उतरे थे। आज तक कुछ नहीं हुआ तो आज फिर टंकी पर चढ़े हुए हैं। सरकार ने इस बार कुछ ठान लिया है। टंकी के नीचे जो मजदूर इकट्ठे थे उन्हें पकड़ कर शहर के विभिन्न थानों में बैठा दिया गया है। विपक्षी दल भाजपा की भी इस मामले में वही नीति है जो मौजूदा कांग्रेस सरकार की है। उस ने भी मजदूरों से सहानुभूति दिखाने के सिवा पिछले सात महीने में कुछ नहीं किया, यहाँ तक कि मजदूरों के साथ खड़ा तक न हुआ। उसे अपना राज लाना है। ताकि मौजूदा सरकार के स्थान पर वे मालिकों की चाकरी बजा सकें।  मजदूरों के पास लड़ने और मर मिटने के सिवा रास्ता क्या है?

जदूर जानते हैं कि कारखाने नहीं चलेंगे। वे केवल कारखाना बंद होने की अनुमति जिस दिन के लिए मिली है उस दिन तक का वेतन उन्हें मिले, छंटनी का मुआवजा मिल जाए और उनकी ग्रेच्यूटी व प्रोवीडेण्ट फण्ड का पैसा मिल जाए। ये सब उन के कानूनी अधिकार हैं।  फिर वे जाएँ और कहीं और रोजगार तलाशें। लेकिन मालिक केवल नवम्बर 2013 तक का वेतन देना चाहता है और उसी हिसाब से मुआवाजा आदि। वह भी तब देगा जब मजदूर इस पर  समझैौता कर लें उस के आठ-दस महिने बाद। तब तक मजदूर क्या करें? मालिक जानता है कि कानूनी हक वह न देगा तो मजदूर अदालत जाएंगे जहाँ अगले बीस साल फैसला नहीं होने का। तब तक मजदूर कहाँ बचेंगे। इस लिए कानूनी हक क्यों दिया जाए। सरकार में इतना दम नहीं कि वह मालिक से मजदूरों का हक दिलवा दे। उसे सिर्फ मजदूरों पर लाठी भाँजना, गोली दागना, उन्हें जेल भेजना, दंडित करना आता है वही कर रही है। मजदूर समझ रहे हैं कि अब जब तक निजाम को बदला नहीं जाता। खुद एक राजनैतिक ताकत बन कर इस पर कब्जा नहीं किया जाता तब तक उन्हें न्याय नहीं मिलेगा। वे जानते हैं कि ये रास्ता दुष्कर है लेकिन और कोई रास्ता भी तो नहीं। कब तक ऐसे ही पिटते लुटते रहेंगे?

Friday, April 19, 2013

ओ........! सड़कवासी राम! ...

हरीश भादानी जन कवि थे। 
थार की रेत का रुदन उन के गीतों में सुनाई देता था।
आज राम नवमी के दिन उन का यह गीत स्मरण हो आया ...

ओ! सड़कवासी राम!

  • .हरीश भादानी

ओ! सड़कवासी राम!
न तेरा था कभी
न तेरा है कहीं
रास्तों दर रास्तों पर
पाँव के छापे लगाते ओ अहेरी
खोलकर
मन के किवाड़े सुन
सुन कि सपने की
किसी सम्भावना तक में नहीं
तेरा अयोध्या धाम।
ओ! सड़कवासी राम!


सोच के सिर मोर
ये दसियों दसानन
और लोहे की ये लंकाएँ
कहाँ है कैद तेरी कुम्भजा
खोजता थक
बोलता ही जा भले तू
कौन देखेगा
सुनेगा कौन तुझको
ये चितेरे
आलमारी में रखे दिन
और चिमनी से निकलती शाम।
ओ! सड़कवासी राम!

 
पोर घिस घिस
क्या गिने चौदह बरस तू
गिन सके तो
कल्प साँसों के गिने जा
गिन कि
कितने काटकर फेंके गए हैं
ऐषणाओं के पहरुए
ये जटायु ही जटायु
और कोई भी नहीं
संकल्प का सौमित्र
अपनी धड़कनों के साथ
देख वामन सी बड़ी यह जिन्दगी
कर ली गई है
इस शहर के जंगलों के नाम।
ओ! सड़कवासी राम!

Sunday, April 14, 2013

कन्यादान क्या ह्यूमन ट्रेफिकिंग नहीं है? ... फेसबुक पर एक संवाद



फेसबुक पर कल मैं ने एक स्टेटस लगाया था। स्टेटस और संवाद दोनों यहाँ ज्यों का त्यों प्रस्तुत है। आप पढ़िए और अपनी भी राय दीजिए ...

दिनेशराय द्विवेदी

गुरूवार





कन्यादान करने का अर्थ है स्त्री को संपत्ति समझना। एक तरह से यह ह्यूमन ट्रेफिकिंग है। फिर कन्यादान करने वाले और लेने वाले सभी लोगों के विरुद्ध ह्यूमन ट्रेफिकिंग का मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार कर के सजा क्यों नहीं दी जाती है? जरा सोचिए और कुछ कहिए!!!

    Anil Manchanda, Ravindra Ranjan, Durgaprasad Agrawal और 44 अन्य को यह पसंद है.
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    Pawan Mishra आप के पोस्ट पर टीप मारते हुये डर लग रहा है कही न्यायालय के चक्क्र न लगाने पडे अभी न समय है न पैसा...फिर भी यह कथन निहायत ही बचकाना है....

        Rajendra Singh पता चला करोड़ो लोग अंदर हो गए ..इसकी जगह कोई और शब्द इस्तेमाल होना चहिये
   
    Lalit Sharma सभी के गिरफ़्तार होते ही वकीलों की चांदी कटने लगेगी, मुकदमे ही मुकदमे हा हा हा हा
   
    Bs Pabla दान का अर्थ ही है किसी सामाजिक उन्नत्ति के लिए अपना सह्योग बिना कुछ लिए दे देना, अब वो सामाजिक उन्नत्ति क्या है इस पर तो ....

    Deepak Pandey कोई नही बचेगा. सब अंदर हा हा हा बकील भी.
   
    Raj Bhatia इस दान का मतलब बहुत गहरा हे, यह कोई बिखारी वाला दान नही, इस मे समर्पन हे, वैसे कोई भी आदमी अपने दिल के टुकडे को दान नही करता, लेकिन इस दान मे लडकी का भला होता हे.....

    Anand R. Dwivedi Customs and Usages नाम की भी कानूनी चिड़िया होती है..जिनके पर कतरना इतना आसान नहीं!!

    दिनेशराय द्विवेदी Raj Bhatia भाटिया जी, आप बहुत साफ मन के हैं, इस कारण से ऐसा कह रहे हैं। कन्यादान कन्या के माता-पिता या उन के अभाव में उस के संरक्षक करते हैं। लेकिन दान सदैव वस्तु का ही किया जाता है, न कि किसी मनुष्य का। इस कारण यह तो सही है कि जब कन्यादान किया जाता है...और देखें

    Sumant Mishra · 91 mutual friends
    अत्यंत अभद्र और अबुद्धिहीनता पूर्ण वक्तव्य। आप के तर्क से सभी हिन्दू माँ-बाप रण्ड़ी के भडुवे हैं? सोंचिये और बार-बार सोंचिये......! कानून को आप जैसे लोग ओढ़े और बिछाये किसी को ऎतराज नहीं लेकिन ६५ साल में १०० से अधिक बार संविधान संशोधित हो चुका है ऎसे कानून की दुहाई मजाक के अतिरिक्त कुछ नहीं।
    दिनेशराय द्विवेदी सुमंत जी जब तर्क का कोई उत्तर नहीं होता तभी लोग गाली गलौच पर उतर आते हैं। संविधान मनुष्य जीवन के लिए है मनुष्य संविधान के लिए नहीं। वह संशोधित भी होगा और बदला भी जाएगा।
   
    Anand R. Dwivedi इस हिसाब से तो दत्तक ग्रहण (u/r Hindu Adoption and Maintenance Act) भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग के अंतर्गत लाया जाना चाहिए..Vijay Manchanda And Anr. vs State Of J & K And Ors. on 8 October, 1987 में ये कहा गया है कि "the adoption is considered as a sacred gi...और देखें
   
    Misir Arun स्त्री को खरीदने बेंचने और दान में दिए जाने की वस्तु समझना प्राचीन धर्मसम्मत सभ्यता का अंग रहा है ...जो वस्तुतः एक असभ्यता ही कही जा सकती है ।

    Anand R. Dwivedi ये भी एकदम सही है कि संविधान मनुष्य के लिए है , लेकिन मनुष्य भी संविधान के लिए उतना ही उत्तरदायी है...कोई भी संविधान public at large की मान्यताओं पर तब तक हावी नहीं हो सकता जब तक उसकी अवहेलना न हो!!
   
   

दिनेशराय द्विवेदी Anand R. Dwivedi, दत्तक ग्रहण दान नहीं है। वहाँ केवल माता-पिता और संतान के अधिकारों और दायित्वों का हस्तान्तरण होता है। यदि किसी निर्णय में उसे दान बताया गया है तो गलत बताया है। न्यायाधीश भी समाज में प्रचलित विचारों से प्रभावित होते हैं और उन के निर्ण...और देखें
    न्यायाधीश और अधिवक्ताओं के पूर्वाग्रह न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं।

    केरल उच्च न्यायालय की निवर्तमान न्यायाधीश के. हेमा ने उन की सेवा निवृत्ति पर आयो...और आगे देखें
   
    दिनेशराय द्विवेदी Anand R. Dwivedi, संविधान मनुष्यों का समूह ही निर्मित करता है। इस कारण उस के लिए वह उत्तरदायी है। आप का यह कहना भी सही है कि कोई भी संविधान public at large की मान्यताओं पर तब तक हावी नहीं हो सकता जब तक उसकी अवहेलना न हो!! और यह भी सही कि कन्यादान वास्त...और देखें
   
    Anand R. Dwivedi आदरणीय निश्चय ही न्यायिक निर्णय पत्थर की लकीर नहीं होते, परन्तु वास्तविकता की खोज में न्यायिक निर्णय अहम् साबित होते हैं...जिन दायित्वों के हस्तांतरण की बात अपने कही..उन्ही दायित्वों के हस्तांतरण का एक स्वरुप कन्यादान को भी माना गया है..दत्तक ग्रहण में...और देखें
   
    Anand R. Dwivedi हिन्दू पंथ में कन्यादान का विशेष स्थान है जिसमे दायित्वों के स्वस्थ और इमानदारी से निर्वहन की प्रतिज्ञा निहित है..इसे एक बंधन माना गया है जिसमे पिता अपने जीवन के अंग को दान करता है..जिसका उद्देश्य व्यवस्थित जीवन मात्र है...बुद्धिजीवी इसे कुछ भी कहें परन्तु इसके उद्देश्य को कतई नाकारा नहीं जा सकता अन्यथा विवाह नाम की संस्था ही एक अपराध हो जाएगी जो ह्यूमन ट्रैफिकिंग का सर्वोत्तम उदाहरण होगा!
   
    दिनेशराय द्विवेदी Anand R. Dwivedi, मान्यताएँ बदलती रहती हैं। कितनी मान्यताएँ वे जीवित हैं जिन्हें हम पचास वर्ष पहले मानते थे। सती प्रथा को सदियों तक गौरवान्वित किया जाता रहा। लेकिन अब सती का महिमामंडन करना अपराध हो गया है। किसी दिन ये भी हो ही जाना है।

    Baldeo Pandey " बेटियों को दान में देना, भले ही यह रिवाज़ सदियों से हिन्दू विवाह का अभिन्न और पवित्र हिस्सा माना जाता रहा हो, लेकिन ' कन्या दान ' महिला समाज के प्रति पुरुष प्रधान समाज का पुरातन, दकियानूस और अमानवीय नजरिया दर्शाता है - आमीन!"
   
    जय प्रकाश पाठक नमस्कार ! कन्यादान और अन्य बहुत से क्रित्य इसलिये कर दिये जाते हैं क्योंकि आधुनिक जीवन लायक एक पूर्ण व मान्य प्रक्रिया का अभाव है. शंकराचार्य गण नवीन प्रक्रिया पर विचार नहीं चाहते.
 
    Ram Singh Suthar श्रीमान,नमस्कार
    जिस तरीके से हमारे विचार बदल रहे है उस हिसाब से तो भारतीय संस्कृति खतम हो जायेगी। जिस दान को सर्वोतम दान समझा जाता रहा है,उसे संपति से जोड़ना सही नही है ओर न ही किसी ग्रंथ या धार्मिक पुस्तक मे इसे संपति का नाम दिया गया है जहा तक कानून क...और देखें

    रजनीश के झा
    गुरूवार को 05:35 अपराह्न बजे · पसंद
    बबीता वाधवानी सम्‍पति समझते रहे है इसलिए तो जीने का अधिकार छीनते रहे है। हर स्‍त्री को अपने इस तरीके से दान किये जाने का विरोध शुरू कर देना चाहिए । दकियानुसी विचारो ने जीने की तमन्‍ना छीनी है औरतो से।
   
    Rajendra Prasad Sharma श्रीमान -पुरानी कोई भी वस्तु या विचार हो क्षरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है - इस परंपरा का अंत देखने के लिए समय का अन्तराल कितना ...... होगा ? संभवतया कहा नहीं जा सकता .
   
    Bavaal Hindvee rahi sahi kadar aur poori ho jaye. saare mard jail me aur auratain bahar.
    
    दिनेशराय द्विवेदी Ram Singh Suthar यहाँ धर्म ग्रंथ की बात नहीं है। यहाँ बात ये है कि समाज वास्तव में क्या समझता है। क्या ये कहावत पूरे भारत में नहीं कि औरत पैर की जूती है। अब आप बताएँ कि जूती संपत्ति है कि नहीं?

    Sudha Om Dhingra दिनेशराय द्विवेदी जी मेरे पापा ने कन्यादान नहीं किया था, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरा दान हो और मेरे पति डॉ. ओम ढींगरा भी मेरे साथ सहमत थे। हालाँकि रिश्तेदारों ने एतराज़ किया था, पर कुछ देर बाद सब ठीक हो गया था।
   
    दिनेशराय द्विवेदी Sudha Om Dhingra आप को उस घटना को एक अभियान का आरंभ मान कर उसे आगे बढ़ाना था। और यह चलाया जाना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है कि स्त्रियों में खुद दान होने का प्रतिरोध होना चाहिए। क्यों कि अभी भी अधिकांश माएँ इस विचार से ग्रस्त हैं कि बेटी का कन्यादान करने से उन्हें पुण्य मिलेगा। वे इसे अपना अधिकाार समझती हैं और उसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
   
    सुशील बाकलीवाल OMG
    प्रथा ही तो है,
    रघुुकुल रात सदा चली आई...
    लगभग एक घंटा पहले mobile के द्वारा · पसंद

    Ram Tyagi I think the comparison is not right.... Vidya daan is another daan which you can not express in terms of money..., in fact the thing you donate has no monetary value as its worth of your emotions and feelings and your love.
   
    Brijmohan Shrivastava -पुराणों में दस महादानो का वर्णन है इनमें से एक तो हुआ कन्यादान वाकी नौ है --स्वर्ण ,अश्व ,तिल , हाथी ,दासी ,रथ ,भूमी ,ग्रह और कपिला गौ /ध्यान रहे यह सब सम्पत्ति है /स्त्री हमेंशा से संपत्ति मानी जाती रही थी / उसका क्रय विक्रय होता था , उसे गिरवी रखा ज...और देखें
   
    दिनेशराय द्विवेदी Brijmohan Shrivastava धन्यवाद बृजमोहन जी, मेरी व्यस्तता में आप ने पूरी तरह तर्कसंगत और तथ्य पूर्ण उत्तर दिया है।
   
    Ravindra Ranjan आप स‌ही कह रहे हैं
   
    Jitendra Choubey सनातन धर्म में बेटियां लक्ष्मी का रूप मानी जाती हैं और दामाद लक्ष्मिपति यानि भगवान् विष्णु का रूप.. दोनों के चरण छुए जाते हैं.. पिता लक्ष्मी सौंपता है उसके वर को बेचता नहीं है.. कन्या और गौ का विक्रय सनातन धर्म में अधर्म माना गया है.. द्रोपदी को दाव प...और देखें
   
    Jitendra Choubey और मेरे भाई तो बता दूं की राजा हरिश्चन्द्र, और नचिकेता कन्या नहीं थे लेकिन एक को चंडाल ने खरीदा था और दुसरे को उसके पिता ने मृत्यु को दान दे दिया था...
   
    Yadav Shambhu मेरे ख्याल में सर इसकी इतनी सरल व्याख्या नहीं हो सकती ....
   
    Ashutosh Acharya Jitendra choubey ji absolutely right ,i agree.
   
    दिनेशराय द्विवेदी जितेन्द्र चौबे जी, जो धार्मिक प्रवचन आप ने यहाँ किया है वह हमारे समाज के दिखाने के दाँत हैं। खाने के दूसरे हैं? मुझे समझ नहीं आता कि। हम कितने मूर्ख और भोले हैं। सामने की वास्तविकता हमें दिखाई नहीं देती और उसे मिथ्या सिद्ध करने के लिए अपने ग्रंथों को उठा लाते हैं। हमारे ग्रन्थों का अब यही उपयोग रह गया है। अपनी गलती छुपाने को उन की आड़ लेते हैं। वास्तविक बदलाव की जरूरत को नकारने का इस से अच्छा तरीका नहीं हो सकता।
   
    Ashutosh Acharya दिवेदी जी अब आप यहाँ कुतर्क कर रहे है , कन्यादान धर्म से जुड़ा होता है इसलिए धार्मिक प्रवचन ही देना पड़ेगा .कन्या दान हिन्दू धर्म की व्यवस्था है इसलिए इसमें हिन्दू धर्म से जुड़े साक्ष्य ही देने पड़ेगें यह दिखाने और खाने वाले दांत वाली बात नही है l
   
    Shiv Shambhu Sharma ऎसा है सर कि अंग्रेजों ने ऎसा कोई प्रावधान नही रखा था इसीलिये वर्ना यह कब का हो चुका होता ।

    Jitendra Choubey द्विवेदी जी आप मुझसे कहीं ज्यादा अनुभवी हैं..और आपकी ये बात भी सत्य है की रिश्ते की शुरुआत दहेज़ की बात से शुरू होती.. लड़की का बाप कहता है की अच्छा लड़का बताओ १० लाख तक की शादी करेंगे. लेकिन फिर भी दाल पूरी तरह से काली नहीं हुई.. ह्यूमन ट्रेफिकिंग का मामला बनने में देर लगेगी..और फिर हम उसे कन्यादान कहना बंद कर देंगे..
   
    दिनेशराय द्विवेदी आशुतोष जी, इसे मेरा कुतर्क ही समझ लीजिए। मैं तो अपनी बेटी दान नहीं कर सकता। आप शौक से कीजिए। लेकिन फिर उसे दान समझिए भी। उस से कोई रिश्ता न रखिए। उस की तरफ झाँकिए भी नहीं। आप यह कहना चाहते हैं कि दान को दान नहीं समझा जाए। दान को दान समझने में कौन सा कुतर्क है?
   
    दिनेशराय द्विवेदी यदि आप की लड़की आप की संपत्ति नहीं है तो उस का दान आप कैसे कर सकते हैं? आप को क्या अधिकार है उसे दान करने का? यदि अधिकार है तो आप उस के स्वतंत्र अस्तित्व से इंकार कर रहे हैं।

    दिनेशराय द्विवेदी जितेन्द्र जी, मैं जानता हूँ कि यह ह्यूमन ट्रेफिकिंग नहीं है। उस से भी बुरी चीज है। लेकिन उस बुरी चीज पर हमारा समाज गौरव कर रहा है जिस के लिए उसे दंडित किया जाना चाहिए, जिस पर उसे शर्मिंदा होना चाहिए। यदि इस अपराध के लिए कोई दंड निर्धारित नहीं है तो होना चाहिए।
Jitendra Choubey अद्येति.........नामाहं.........नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि - अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ......... नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पत्नीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे । वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति ।
Ashutosh Acharya दान करने का अर्थ यह नही की उससे मिलना जुलना देखना बात करना मना हो गया ,हाँ यह सही है कि उसको वापस लेना वोह गलत है l दहेजप्रथा तो गलत ही है यह तो पाप भी है और अपराध भी l वैसे दिवेदी जी में आपसे किसी भी प्रकार से तर्कों में नहीं जीत सकता क्यूंकि आप तो संविधान और कानून के महान ज्ञाता है और में एक तुच्छ अल्प ज्ञान रखने वाला .

Jitendra Choubey दिवेदी जी कानून लागू करवा भी देंगे तो भी सालों तक थाने में एक भी रिपोर्ट न होगी क्योकि यहाँ न दान होने वाला शिकायत करेगा न पाने वाला न करने वाला.. इस दान प्रक्रिया में सभी खुश रहते हैं.. लड़की विदा के बाद ८-१० दिन में घर भी आ जाती है.. तीन बार विदाई होती है.. 

Sangita Puri अर्थ का अनर्थ निकालने वाले किसी भी शब्‍द का कोई अर्थ निकाल सकते हं ... बोलने और लिखने से अधिक जरूरी है .. व्‍यवहार में पविर्तन हो .. नारी को उचित मान सम्‍मान मिले ...


   

Saturday, April 13, 2013

सही और विज्ञान सम्मत वर्षारंभ आज बैसाखी के दिन

भारतवर्ष एक ऐसा देश है जिस में आप नववर्ष की शुभकामनाएँ देते देते थक सकते हैं। लगभग हर माह कम से कम एक नया वर्ष अवश्य हो ही जाता है। उस का कारण यह भी है कि यही दुनिया का एक मात्र भूभाग है जहाँ दुनिया के विभिन्न भागों से लोग पहुँचे और यहीं के हो कर रह गए। उन्हों ने इस देश की संस्कृति को अपनाया तो कुछ न कुछ वह भी जोड़ा जो वे लोग साथ ले कर आए थे। वस्तुतः भारत वसुधैव कुटुम्बकम उक्ति को चरितार्थ करता है। 
र्ष का संबंध सीधे सीधे सौर गणित से है। धरती जितने समय में सूर्य का एक चक्कर पूरा लगा लेती है उसी कालावधि को हम वर्ष कहते हैं। लेकिन काल की न तो यह सब से बड़ी इकाई है और न ही सब से छोटी। इस से छोटी इकाई माह है, जिस का संबंध चंद्रमा द्वारा पृथ्वी का एक चक्र पूरा करने से है। लेकिन दृश्य रूप में चंद्रमा एक दिन गायब हो जाता है और फि्र से एक पतली सी लकीर के रूप में सांयकालीन आकाश में पतली सी चांदी की लकीर के रूप में दिखाई देता है। इसे हम नवचंद्र कहते हैं। एक दिन एक क्षण के लिए पृथ्वी से पूरा दिखाई देता है जिसे हम पूर्ण चंद्र कहते हैं।  इस तरह से नव चंद्र से नव चंद्र तक की अथवा पूर्ण चंद्र से पूर्ण चंद्र तक की अवधि को हम मास या माह कहते हैं। इस से छोटी इकाई दिन है, जिस का संबंध पृथ्वी का अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा कर लेने से है। फिर इस के दो भाग दिवस और रात्रि हैं। उन्हें फिर से प्रहरों, घड़ियों, पलों और विपलों में अथवा घंटों, मिनटों और सेकण्डों में विभाजित किया गया है।
ब इन में ताल मेल करने का प्रयत्न किया गया अर्थात वर्ष, मास और दिवस के बीच। एक वर्ष की कालावधि में 12 मास होते हैं। लेकिन उस के बाद भी लगभग 10 दिनों का अंतराल छूट जाता है।  इस तरह तीन वर्ष में लगभग एक माह अतिरिक्त हो जाता है। इस का समायोजन करने के लिए भारतीय पद्धति में प्रत्येक तीन वर्ष में एक वर्ष तेरह माह का हो जाता है। लेकिन सौर वर्ष को जो वास्तव में 365 दिन 6 घंटे 9 मिनट 10 सैकण्ड का होता है को बारह समान भागों में बाँटने का कार्य बहुत महत्वपूर्ण था। जब पृथ्वी सूर्य का एक चक्र पूरा करती है तो सूर्य आकाश की परिधि के 360 अंशों की यात्रा करती है। इस खगोल को हम ने 30-30 अंशों के 12 बराबर हिस्सों में बाँटा। प्रत्येक हिस्से को उस भाग में पड़ने वाले तारों द्वारा बनाई गई आकृति के आधार पर नाम दे दिया। इन्हीं आकृतियों को हम राशियाँ या तारामंडल कहते हैं। मेष आदि राशियाँ ये ही तारामंडल हैं। जब एक राशिखंड से दूसरे राशि खंड में सूर्य प्रवेश करता है तो हम उसे संक्रांति कहते हैं। इस तरह पूरे एक वर्ष में सूर्य 12 बार एक राशि से दूसरी राशि में संक्रांति करता है। प्रत्येक संक्रांति को हम ने उस राशि का नाम दिया जिस राशि में सूर्य प्रवेश करता है। 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो हम उस दिन को मकर संक्रांति का दिन कहते हैं। इस तरह कुल 12 संक्रांतियाँ होती है।
क्यों कि वर्ष का संबंध पृथ्वी द्वारा सूर्य का एक चक्र पूरा कर लेने से है जो हमें सूर्य के खगोल में यात्रा करते हुए महसूस होता है। इस कारण से हमें वर्ष का आरंभ भी सूर्य कि इस आभासी यात्रा के किसी महत्वपूर्ण पड़ाव से होना चाहिए।  राशि चक्र का आरंभ हम मेष राशि से मानते हैं और स्वाभाविक और तर्क संगत बात यह है कि सूर्य के इस मेष राशि में प्रवेश से हमें वर्षारंभ मानना चाहिए।  सूर्य के मेष राशि में प्रवेश को हम मेष की संक्रांति कहते हैं। यह दिन भारत में विशेष रूप से पंजाब में जो भारत की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता सिंधुघाटी सभ्यता का केन्द्र रहा है बैसाखी के रूप में हर वर्ष 13 अप्रेल को मनाया जाता है। इसी 13 अप्रेल को हम वैज्ञानिक रूप से सही वर्षारंभ कह सकते हैं। यह मौसम भी  नववर्ष के लिए आनन्द दायक है। जब फसलें कट कर किसान के घर आती हैं। किसान इन दिनों समृद्धि का अहसास करता है। उन घरों में उल्लास का वातावरण रहता है। इन्ही दिन अधिकांश वृक्षों में कोंपले फूट कर नए पत्ते आते हैं। तरह तरह के रंगों के फूलों से धरती दुलहन की भांति सजी होती है। सही में नया वर्ष तो इसी दिन आरंभ होता है। आज फिर यही दिन है। बैसाखी का दिन।
बैसाखी के इस खुशनुमा दिन पर मैं आप को फिर से नव वर्ष की शुभकामनाएँ देना चाहता हूँ। आज का यह दिन इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि आज ही के दिन जलियाँवाला बाग में सैंकड़ों निहत्थे लोगों ने आजादी के लिए लड़ने की कसम खाते हुए अंग्रेजों की बन्दूकों का सामना किया और शहीद हो गए। इसलिए पहले शहीदों को

श्रद्धांजलि!  
 

 फिर शुभकामनाएँ....

बैसाखी, 13 अप्रेल से आरंभ होने वाला यह वर्ष भारतवर्ष के जनगण के लिए मंगलमय हो !

Sunday, April 7, 2013

आलू के कापे बनाम पोटेटो चिप्स


सुबह सुबह मैं अपने घर ऑफिस में बैठा काम कर रहा था कि आदेश हुआ -छत पर चलो¡ मैं ने पूछा- क्यों? तो उत्तमार्ध कहने लगी -बन्दर आ गए हैं, उन्हें भगाना है, मुझे आलू के चिप्स सुखाने हैं धूप में।

ज नींद जल्दी खुल गई थी। उत्तमार्ध रसोई में थी। मैं पानी पीने उधर गया तो रात को बनाए हुए चिप्स फिटकरी के पानी में उबाले जा रहे थे। उन्हें सुखाना तो निहायत जरूरी था। मैं ने कहा- बन्दर भागेंगे नहीं। वैसे ही चले जाएंगे। इधर उन की रुचि का कुछ नहीं है। बस वे रात के आसरे से आज की कर्मस्थली की और जाते हुए इधर से गुजर रहे होंगे। बस निरीक्षण करते जा रहे होंगे कि इधर कुछ उन की रुचि का तो नहीं है। तभी एक बन्दर नीचे आंगन में उतरा और पक्षियों के लिए रखा गए पानी के पाउण्डे से पानी पीने लगा। जैसा सोचा था। कुछ देर बाद श्रीमती जी छत पर चली गईं। उन के जाने के बाद मैं भी छत पर पहुँचा। दूर दूर तक बन्दर नहीं थे। फिर भी मैं ने पूछा -बन्दर चले गए?

-न्दर तो तभी चले गए। वे आधी चटाई पर चिप्स फैला चुकी थी। कहने लगी – बाकी के चिप्स आप सुखा दीजिए। मैं तब तक नीचे से और ले आती हूँ। मुझे आश्चर्य हुआ –अभी और हैं? उन्हों ने कहा –हाँ। पर मुझ से तो नीचे बैठा नहीं जाएगा। डाक्टर ने उकडूँ बैठने से मना किया है। बैठ तो जाउंगा, पर उठने में परेशानी होगी। वे बोली –चलो रहने दो। मैं फैला दूंगी। आप ध्यान रखिएगा इतने मैं बाकी के ले आती हूँ। वे नीचे उतर गईं।

मैं फालतू कैसे वहाँ खड़ा रहता। छत पर कुर्सी या स्टूल भी न था जिस पर बैठ जाता। मैं चटाई के नजदीक नीचे ही बैठ गया। चिप्स फैलाने लगा। जब तक वे लौटी, मैं लगभग सारे चिप्स फैला चुका था। फिर भी चटाई पर कुछ स्थान शेष था। उन्हों ने कुछ चिप्स चटाई पर डाल दिए । मैं फैलाने लगा। वे दूसरी ओर एक पुरानी साड़ी पर चिप्स फैलाने लगी। मैं फालतू हो गया तो नीचे आ गया। कुछ देर बाद वे भी नीचे उतर आई। मैं शेव बनाने लगा तभी एक मुवक्किल दफ्तर में नमूदार हुआ। मैं दफ्तर जा कर बैठ गया। मुवक्क्लों से निपटते निपटते ग्यारह बज गए। उत्तमार्ध ने मुझे स्नान करने का आदेश दिया तो मैं उठ कर स्नानघर चला गया।

स्नान कर के निकला तो तले हुएचिप्स तैयार थे। मैं ने पूछा –इतनी जल्दी सूख भी गए और तल भी गए। वे बोली -ये तो कल बनाए जो हैं।

चपन से ही चिप्स घर पर बनते देखे हैं। तब हम इन्हें चिप्स नहीं कापे कहा करते थे। चिप्स नाम तो बाद में महानगरीय लोगों से सुनने को मिला। अब कापा शब्द गायब ही हो गया है। घर के बने चिप्स खाने में जो स्वाद है वह बाजार के थैली पैक चिप्स और हलवाई की दुकान के चिप्स में कहाँ? सब का बनाने का तरीका भिन्न है। घरों पर भी तरीका बदल गया है। पहले आलू को हलका उबाल कर छिलका उतारा जाता था और फिर बना कर सुखाए जाते थे। अब उन्हें चाकू से छील कर सीधे पानी में चिप्स बना दिए जाते हैं। फिर फिटकरी के पानी में उन्हें उबाल कर धूप में सुखा कर संग्रह कर लिया जाता है। उन्हें कभी भी तल कर नमक-मिर्च और अन्य मसाले लगा कर खाया जाता है। हलवाई उन्हें सीधे फिटकरी के पानी में बना बिना उबाले और सुखाए तल देता है। ये फैक्ट्री वाले क्या करते हैं? ये तो वे ही जानें।