Thursday, December 29, 2011

वर्षान्त पर .....

र्षान्त आ गया है। इस बार वर्षान्त माह मेरे लिए भी भारतीय संसद की तरह बहुत खराब रहा। पहली ही तारीख को पता लगा कि खोपड़ी की ऊपरी सतह पर फैले तंत्रिका जाल के किसी तंतु में निष्क्रीय पड़ा विषाणु वेरीसेला जोस्टर सक्रिय हो उठा है। इस विषाणु से केवल शरीर का रक्षातंत्र ही लड़ सकता था। बाहरी मदद सहायता अवश्य कर सकती थी किन्तु इस लड़ाई में निर्णायक नहीं हो सकती थी।  मुझे द्वंदवाद का मार्क्सवादी नियम स्मरण हो उठा कि किसी वस्तु में होने वाले परिवर्तन के लिए केवल उस वस्तु की अन्तर्वस्तु ही निर्णायक हो सकती है, बाह्य शक्तियाँ नहीं। इस विषाणु के सक्रिय हो उठने पर शरीर में मचने वाले बवाल के बारे में अंतर्जाल पर जो कुछ जानकारी मिली उसे मैं आप के साथ पिछली पोस्ट आखिर बंद आँख खुल गई में सांझा कर चुका हूँ। उस के बाद का हाल ये रहा कि जहाँ जहाँ फफोले हुए थे वहाँ वहाँ धीरे धीरे पपड़ी आई और फिर निकली भी। खोपड़ी पर जहां चमड़ी के नीचे मांस नाम मात्र का होता है वहाँ तो नुकसान करने को अधिक कुछ था ही नहीं पर जैसे ही तंत्रिका खोपड़ी से नीचे ललाट पर आई तो वहाँ फफोले कुछ बड़े हुए और जब पपड़ी उतरी तो उस स्थान पर अंदर की ओर गड्ढे दिखाई देने लगे। ललाट पर अब इन  की संख्या चार हैं लेकिन वे धीरे-धीरे भर रहे हैं। फिलहाल इन्हों ने शक्ल की सूरत बिगाड़ कर रखी है। ललाट पर कुछ धब्बे दिखाई दे रहे हैं, मुझे आशा है कि वे अस्थाई ही होंगे। पर पान वाले ने मुझे सोवियत संघ का आखिरी राष्ट्रपति गोर्बाचोव घोषित कर दिया है।

र्पीज का असर कम हुआ ही था कि अचानक एक रात नाक में जलन आरंभ हो गई। इतनी तेज की रात भर उस ने सोने न दिया। घर में रखी कुछ दवाओं का प्रयोग भी काम न आया। सुबह तक नाक को घोषित रूप से जुकाम हो गया। उसी दिन तंत्रिका विशेषज्ञ चिकित्सक से मुलाकात होनी थी। उस ने एक एलर्जीविरोधी लिख गोली लिख दी जो पाँच दिनों तक रोज एक खाना था। दो दिन तक नाक पूरी तरह बंद रही। जैसे जलूस के दिन रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और बाईपास से निकलना पड़ता है। मेरे श्वसन तंत्र ने भी इस आपात काल में मुख की राह पकड़ी। तीसरे दिन नाक का रास्ता यदा-कदा खुलना आरंभ हुआ। पाँचवें दिन वह पूरी तरह खुल गया। जुकाम से निजात मिली। लेकिन अभी कुछ और भुगतना शेष था।

29 दिसम्बर की शाम का भोजन करते हुए अचानक एक छोटा सा कंकड बाईं दाढ़ों के बीच आ गया। ऊपर की दाढ़ हिली और अचानक दर्द हुआ। मैं ने कंकड़ निकाल फैंका। पानी से कुल्ला किया और भोजन पूरा किया। भोजन से उठते ही दाढ़ में फिर दर्द उठा जिस ने मुझे ने बैचेन कर दिया। घर में रखी दातों पर ब्रश, और घर में रखी दवाइयों ने कोई असर नहीं किया। दर्द कभी कम हो जाता तो फिर से बढ़ जाता। आखिर रात दो बजे ध्यान आया कि लोंग का तेल दांत दर्द में रामबाण है ऐसा लोग कहते हैं। पर घर में लोंग का तेल तो नहीं था। लोंग का डब्बा तलाश किया गया। तीन-चार लोंगें निकाल कर चबाई गईं और उन से  बनी लुगदी को जीभ की मदद से दाँत और मसूड़े के उस हिस्से पर चिपका दिया जहाँ दर्द उठा था। कमाल हो गया। दो मिनट भी न निकले होंगे कि दर्द वैसे गायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग। आज उस दर्द के उठने से डर लगता रहा। उस दाढ़ के नीचे कुछ न आ जाए इस बात की सावधानी रखी गई। दवाएँ आरंभ कर दी हैं। देखते हैं क्या होता है। वैसे इन दांतों के साथ मैं ने भी अत्याचार कम नहीं किया। इन का इस्तेमाल ठीक उस दास-स्वामी की तरह किया जो अपने दास को बस इतना देता है कि वह मर न जाए और काम कस के लेता है।   कुल मिला कर यह वर्षान्त इस सूचना के साथ समाप्त हुआ कि दिनेशराय द्विवेदी! सावधान हो जाओ! जीवन का सत्तावनवाँ वर्ष है, अब तुम्हारे पहले वाले दिन नहीं रहे, जीवन जरा सावधानी से जिओ।

स महिने संतोषप्रद काम ये हुआ कि कानूनी मामलों के ब्लाग 'तीसरा खंबा' को अपने डोमेन की साइट में परिवर्तित होने की प्रक्रिया लगभग पूरी हो गयी। आज रात्रि को जैसे ही वर्ष बदलेगा वैसे ही ब्लॉगस्पॉट का ब्लाग तीसरा खंबा बंद हो जाएगा फिर उसे न आप देख सकेंगे और न मैं देख सकूंगा। लेकिन उस के साथ ही  तीसरा खंबा साइट अपने डोमेन <teesarakhamba.com> पर दिखाई देने लगेगी। आशा है इस नए रूप को पाठकों का वही सहयोग प्राप्त होता रहेगा जो ब्लाग के रूप में हो रहा था। इस माह अनवरत पर नियमितता बुरी तरह टूटी। लेकिन समझता हूँ कि मैं नए वर्ष के आरंभ के साथ ही पुन नियमित हो लूंगा।

यह इस वर्ष की आखिरी पोस्ट है। नए वर्ष में फिर मिलेंगे ....


 
   सभी पाठकों, ब्लागर मित्रों को 
नए वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ!!!


Tuesday, December 13, 2011

आखिर बंद आँख खुल गई

खिर आँख खुल ही गई। तीन दिनों से बंद थी। रात को शोभा ने मुझ से पूछा था सुबह अदालत कैसे जाओगे? तो मैं ने कहा था -सुबह अवश्य खुल जाएगी।
-और न खुली तो ... । उस ने आशंका व्यक्त की थी। 
मैं ने कहा -मुझे लक्षण नजर आ रहे हैं कि सुबह अवश्य खुल जाएगी। 
सुबह आँख कुछ प्रयास के बाद खुल रही थी। लेकिन मैं उस पर लगाए जाने वाले पेशियों के बल को शून्य कर देता तो वह फिर से बन्द हो जा रही थी। घंटे भर बाद मैं ने देखा कि वह कुछ कुछ खुल रही थी। थोड़ा प्रयास करने पर पूरी भी खुल जा रही थी। 
मैं स्नानादि कर के तैयार हो गया। इस बीच मुंशी आ गया था। उस ने सारी फाइलें बस्ते में जमा ली थीं। मेरे आने के बाद वह बस्ता ले कर अदालत चला गया। मैं अभी गाड़ी ड्राइव कर ने के मूड में नहीं था। कोई उसे साफ कर देता तो शायद में उसे ले चल पड़ता। लेकिन चार दिन हो गए थे, उस की धूल तक न झड़ी थी। स्नान किया हुआ मैं, वापस धूल के कण चिपकने से डर रहा था। आखिर एक मुवक्किल का फोन आ गया। मैं ने कहा वह मुझे घर से अदालत ले चले। उस ने घंटे भर में पहुँचने का वायदा किया। मैं अखबार देखने लगा। 

किस्सा 30 नवम्बर को आरंभ हुआ था। मामाजी के देहान्त के कारण गाँव गया था। अंत्येष्टी के बाद वापस लौटा तो कपाल के बाएँ भाग के मध्य़ के कुछ पीछे एक नस फड़फड़ाने लगी थी। मैं ने सोचा दिन भर अन्त्येष्टी की गतिविधियों का असर है। मैं ने सामान्य दर्द निवारक ले ली। लेकिन उस का कोई असर न हुआ था। अगले दिन सुबह नस की फड़फड़ाहट बरकरार ही नहीं थी, अपितु तीव्र हो गयी थी। मुझे कुछ अजीब सा लगा। मैं सोचने लगा कहीं यह किसी धमनी में रक्त की रुकावट तो नहीं है। शाम तक तो मैं परेशान हो गया। मैं ने अपना रक्त चाप नापा तो वह भी सामान्य से अधिक था। मैं ने सोचा अवश्य ही यह धमनी में रक्त की रुकावट है। कभी जुकाम होने से श्लेष्मा के धमनी में प्रवेश कर जाने से ऐसा हो सकता है। मेरे इस अनुमान की ताईद अन्तर्जाल की सूचनाओं ने भी की। मैं ने अगले दिन सुबह अपने एक एमआर मित्र को दी तो उस ने बताया कि यह सब रक्तचाप बढ़ने के कारण है। मैं ने रक्तचाप सामान्य करने के लिए दवा ले ली। लेकिन नस की फड़कन दूर होने का नाम न ले रही थी। ऐसा लगने लगा था कि सिर पकने लगा है। आखिर एमआर मित्र ने दो बजे अदालत पहुँचने की सूचना दी। हम दोनों एक तंत्रिका विशेषज्ञ के पास पहुँचे। उस ने देख कर तुरंत दवा लिख दी। वह रक्तचाप के लिए भी दवा लिखने वाला था लेकिन उसे बताने पर कि मैं उस के लिए होमियोपैथिक दवा प्रयोग करता हूँ जो कारगर है। उस ने उसी का प्रयोग करने की हिदायत दी और पाँच दिनों की दवा लिख दी।

डाक्टर की दवा से दर्द में कोई बड़ा आराम न हुआ। फिर भी उसे एक दिन और झेला गया। यूँ पाँच दिसम्बर आ गया। पाँच दिसम्बर की रात को दर्द के कारण सो न सका। सारी रात छटपटाता रहा। आखिर छह दिसम्बर को सुबह देखा तो पता लगा कि सिर में छाले हो रहे हैं। मैं तुरंत समझ गया कि यह हर्पीज जोस्टर है। मैं इस बीमारी को पहले देख चुका था और जानता था कि इस का कोई इलाज नहीं है। बस इस को घातक होने से रोका जा सकता है। होमियोपैथी में इसे लाक्षणिक तरीके से ट्रीट किया जा सकता है। मैं ने तुरंत होमियोपैथिक चिकित्सा करना आरंभ कर दिया। एक तंत्रिका विशेषज्ञ की दवा चल रही थी इस लिए उसे पुनः दिखाना उचित समझा। अदालत से आधे से अधिक काम निपटा कर दो बजे डाक्टर के पास पहुँचा तो वह किसी काम से गया हुआ था। मैं वापस अदालत लौट आया। शेष काम निपटा कर साढ़े तीन बजे फिर से डाक्टर के पास पहुँचा तो वह मिल गया। मेरा माथा देखते ही उस के मुहँ से सहसा निकला 'हर्पीज जोस्टर'। उस ने पुरानी सारी दवाइयाँ कैंसल कर दीं। एक दवा तंत्रिका संरक्षण के लिए, एक दर्द निवारक और एक लोशन लिख दिया। मैं ने केमिस्ट के यहाँ से तीनों दवाएँ लीं और घर चला आया। 
र्पीज जोस्टर एक वायरल रोग है। यह उसी वायरस के वजूद के कारण होती है जिस के वजूद से यानी चिकन पोक्स या छोटी चेचक (जिसे खसरा या छोटी माता भी कहते हैं) नाम की बीमारी होती है।  होता यह है कि छोटी चेचक का वायरस वेरीसेला जोस्टर शरीर की किसी तत्रिका (नर्व) में अक्रिय हो कर खुद को बचा लेता है। उम्र के ढलान पर 50 वर्ष की आयु के बाद या फिर कभी भी किसी रोग के कारण शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली के कमजोर होने पर अचानक सक्रिय हो कर पुनरुत्पादन करने लगता है। बस यहीं से उस तंत्रिका में न्युरेल्जिक दर्द आरंभ हो जाता है जो धीरे-धीरे असह्य होने लगता है। वायरस बढ़ने लगते हैं और तंत्रिका को क्षति पहुँचाने लगते हैं। फिर रोग त्वचा पर फफोलों की शक्ल में दिखाई देने लगते हैं। इन फफोलों में बेहद जलन और पीड़ा होती है। तंत्रिका शरीर में जिस दिशा की ओर बढ़ती है उसी दिशा की ओर फफोले एक कतार में निकलने लगते हैं। इसी बीच शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय होने लगता है और इस स्थिति में आ जाता है कि वह इन वायरसों को समाप्त कर सके। लेकिन इस में कम से कम दस दिन का समय लग जाता है। आखिर लगभग तीन सप्ताह में फफोले सूख जाते हैं। बीमारी का अंत हो जाता है। लेकिन इस बीच वायरस तंत्रिका और त्वचा को बहुत क्षति पहुँचाते हैं। अनेक बार बीमारी के क्षेत्र में वर्ष भर तक और उस के बाद भी जलन होती रहती है। इस कारण से तंत्रिका तंत्र को दुरुस्त करने के लिए वर्ष भर तक दवा लेनी पड़ सकती है। यह रोग सिर से लेकर आँख की पलक और नाक तक चेहरे के आधे भाग में, हाथ में, पैर में, पीठ पर शरीर के किसी भी अंग में यहाँ तक कि यौनांग में भी हो सकता है।
मुझे जो फफोले हुए थे धीरे धीरे आँख की भौंह तक पहुँच गए। दर्द निवारक के कारण दर्द से निजात मिली। होमियोपैथिक दवाओं ने लक्षण भेद से मुझे राहत प्रदान की और उस तंत्रिका संरक्षण वाली दवा ने तंत्रिका की क्षति को कम किया। 8 दिसंबर की शाम मुझे विश्वास था कि अब यहाँ आ कर रोग रुक जाएगा। लेकिन शुक्रवार की सुबह जब नीन्द खुली तो पाया कि बायीं आँख की पलक खुल नहीं रही है।  कोशिश करने पर वह कुछ उठती पर फिर से गिर पड़ती। भौंह के नीचे नाक की जड़ के पास आलपिन के माथे जितना एक छोटा सा फफोला निकल आया था, यह उसी की कारस्तानी थी। साढ़े नौ बजे मुंशी आया तो उसी ने मना कर दिया कि मैं अदालत न जाऊँ, वह काम देख लेगा। इस स्थिति में  मेरा जाना संभव भी नहीं था। मैं ने दिन भर विश्राम किया। अगले दो दिन अवकाश के थे, इन दिनों भी यही स्थिति बनी रही।

खिर मुवक्किल आ गया। उस के साथ मैं अदालत पहुँचा। आज अदालत में अवकाश की स्थिति थी। अधिवक्ता संघ के चुनाव के पूर्व सिम्पोजियम था। एक मुकदमे में आदेश होने वाला था। उस के मुताबिक मुकदमे की आगे की कार्यवाही तय होनी थी। दो बजे तक आदेश न हुआ था। मध्यान्ह अवकाश के बाद जज के पीए ने हमें आदेश बताया जो हमारे मुताबिक था। मुवक्किल का तनाव दूर हुआ। वह आगे की कार्यवाही की तैयारी करने लगा। उसी के साथ मैं चिकित्सक के पास पहुँचा। उस ने मुझे देख संतोष व्यक्त किया। तंत्रिका संरक्षक और पन्द्रह दिन लेते रहने को कहा। दर्द निवारक दिन में तीन से दो कर दी गईं। मेरे मस्तिष्क में एक प्रश्न कुलबुला रहा था कि उस ने मुझे कोई वायरसरोधी दवा क्यों न लिखी थी जब कि अंतर्जाल पर उस का हर स्थान पर उल्लेख था। मैं ने वह प्रश्न चिकित्सक से पूछ ही लिया। उस ने बताया कि आठ सौ मिली ग्राम की कम से काम पाँच खुराक देनी पड़तीं जिन का पार्श्व प्रभाव कुछ भी हो सकता था और उस का अनुभव था कि इस वायरसरोधी दवा का बीमारी पर कोई प्रभाव पड़ता नहीं था। चिकित्सक ने बीमारी को केवल तंत्रिका संरक्षक के सहारे ठीक किया था। परिणाम से न केवल चिकित्सक, उस का रोगी और रोगी के परिजन तक संतुष्ट थे। चिकित्सक के खुल जाने पर मैं ने यह भी बताया कि। मैं ने उसी चिकित्सक के पास आने का निर्णय इस आधार पर किया था कि वह बारह वर्ष तक ग्रामीण क्षेत्र में काम कर चुका था। वहाँ प्रयोगशाला की सुविधा नहीं होती इस कारण से उस की रोग को परखने की अपनी क्षमता विकसित हो चुकी थी और वह प्रयोगशाला की जाँचों पर कम से कम निर्भर था। चिकित्सक ने मुझे बताया कि ग्रामीण क्षेत्र के बारह वर्ष के अनुभव के पूर्व वह पाँच वर्ष विदेश में भी चिकित्सा सेवाएँ दे चुका था।

शाम को मैं घर लौटा तब तक मेरी आँख की पलक पूरी उठ चुकी थी और बिना ऐच्छिक बल के आँख को पूरा खुला रखने में सक्षम थी। मैं भी प्रसन्न था कि मैं अब अपना काम कुछ तो कर सकूंगा। हालांकि जब तक बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती शायद पूरी क्षमता से न कर सकूँ और उसे हासिल करने में अभी दो सप्ताह और लगें।

Tuesday, December 6, 2011

राज्य, उत्पीड़ित वर्ग के दमन का औजार : बेहतर जीवन की ओर -16

स श्रंखला की छठी कड़ी में ही हम ने यह देखा था कि मानव गोत्र समाज वर्गों की उत्पत्ति के उपरान्त वर्गों के बीच ऐसे संघर्ष को रोकने के लिए एक नई चीज सामने आती है। यह नई चीज आती समाज के भीतर से ही है लेकिन वह समाज के ऊपर स्थापित हो जाती है और स्वयं को समाज से अलग चीज प्रदर्शित करती है। यह नई चीज राज्य था। राज्य की उत्पत्ति इस बात की स्वीकारोक्ति थी कि समाज ऐसे अन्तर्विरोधों में फँस गया है जिन्हें हल नहीं किया जा सकता, जिन का समाधान असंभव है। विरोधी आर्थिक हितों वाले वर्गों व्यर्थ के संघर्ष में पूरे समाज को नष्ट न कर डालें इस लिए इस संघर्ष को व्यवस्था की सीमा में रखे जाने का कार्यभार यह राज्य उठाता है, यही राज्य की ऐतिहासिक भूमिका है। इस तरह हम देखते हैं कि राज्य असाध्य वर्गविरोधों की उपज और अभिव्यक्ति है। राज्य उसी स्थान, समय और सीमा तक उत्पन्न होता है जहाँ, जिस समय, जिस सीमा तक वर्गविरोधों का  समाधान असम्भव हो जाता है। 

हाँ यह भ्रम उत्पन्न किए जाने की पूरी संभावना है कि यह कहना आरंभ कर दिया जाए कि वस्तुतः राज्य वर्गीय समन्वय के लिए एक औजार है। इस संभावना का इतिहास में अनेक राजनीतिकों ने भरपूर उपयोग किया और लगातार किया भी जा रहा है। लेकिन यह केवल भ्रम मात्र ही है कि राज्य वर्गीय समन्वय का औजार है। यदि उसे औजार मान भी लिया जाए तो यह बिलकुल इस्पात की उस आरी की तरह है जिस से हीरे को तराशने का काम लिया जा रहा हो। अव्वल बात तो यह है कि वर्गीय समन्वय बिलकुल असंभव है, यदि यह संभव होता तो राज्य के उत्पन्न होने और कायम रहने की आवश्यकता ही नहीं थी। वस्तुतः राज्य वर्ग प्रभुत्व का औजार है और एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के उत्पी़ड़न का अस्त्र है।  वह ऐसी व्यवस्था का सृजन है जो वर्गीय टकरावों को मंद कर के इस उत्पीड़न को कानूनी रूप प्रदान कर मजबूत बनाती है। कानूनी उत्पीड़न को बनाए रखने के लिए उसे सशस्त्र संगठनों की आवश्यकता होती है। 

गोत्र समाज में आबादी के स्वतः कार्यकारी सशस्त्र संगठन बनते थे। ये संगठन बाहरी लोगों से झगड़ों को सुलझाने के अंतिम उपकरण के रूप में उत्पन्न हो कर कार्य संपादन करते थे और जैसे ही कार्य संपादित हो चुका होता था .ये संगठन आम लोगों में परिवर्तित हो जाते थे। लेकिन जैसे ही वर्ग उत्पन्न हो गए इस तरह के स्वतः कार्यकारी संगठन असंभव हो गए। वैसी स्थिति में एक सार्वजनिक सत्ता की स्थापनी की गई जिस में न केवल सशस्त्र दल ही नहीं, जेलखाने, पुलिस, विभिन्न प्रकार की दमनकारी संस्थाएँ और भौतिक साधन भी सम्मिलित किए गए जिन का गोत्र समाज में कोई स्थान नहीं था। स्थाई फौज और पुलिस राज्य सत्ता के मुख्य उपकरण हो गए। 

लेकिन अपनी पहल पर काम करने वाली आबादी का सशस्त्र संगठन क्या संभव रह गया था? समाज के वर्गों में बँट जाने से जिस सभ्य समाज की स्थापना हुई थी वह शत्रुतापूर्ण बल्कि असाध्य रूप से शत्रुतापूर्ण वर्गों में बँटा हुआ था जिस में अपनी पहल पर काम करने वाली आबादी की हथियार बंदी से वर्गों के बीच सशस्त्र संघर्ष छिड़ जाता। इसी चीज को रोकने के लिए तो समाज के भीतर से राज्य की उत्पत्ति हुई थी। इस कारण राज्य को ऐसा संगठन चाहिए था जो अपनी पहल पर काम करने के स्थान पर उस के इशारे पर काम करे। लेकिन बावजूद इस के कि राज्य के पास फौज, पुलिस, जेलें और अन्यान्य दमनकारी संस्थाएँ थी, वह कभी भी वर्ग समन्वय में कामयाब नहीं हो सका। समय समय पर समाज में क्रांतियाँ हुईं जिन्हों ने समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग के इशारे पर काम करने वाले राज्य के उस ढाँचे को तोड़ डाला। लेकिन जो भी नया वर्ग प्रभुत्व में आया उसी ने फिर से अपनी सेवा करने वाले हथियारबंद लोगों के संगठनों को फिर से कायम करने के प्रयत्न किए और उन्हें कायम किया। केवल यह अकेली बात ही यह साबित करती है कि राज्य वस्तुतः उत्पीड़क वर्ग/वर्गों का उत्पी़ड़ित वर्गों पर प्रभुत्व बनाए रखने का औजार मात्र है।