Wednesday, August 31, 2011

राज में बहुत पोल है तो तुम भी किसी पोल में घुस जाओ

ल आंदोलन के बाद के पहले दिन का उल्लेख आधा ही कर पाया। राजस्थान में अदालतों में दोपहर का भोजनावकाश 1.30 से 2.00 बजे तक का होता है। लेकिन हाथ में काम को तुरंत तो छोड़ा नहीं जा सकता। इस लिए कभी कभी अदालत से मुक्त होने में 1.45 तक का समय हो जाता है। जब अदालत देर से उठती है तो फिर 2.00 बजे फिर से बैठ नहीं पाती। अक्सर जज को अदालत में आने में ढाई बज जाते हैं। हम लोग भी दोपहर की चाय पर पोने दो बैठते हैं तो फिर उठने तक सवा दो हो जाते  हैं और अदालत तक पहुँचने में हमें भी ढाई बज जाते हैं। अदालत में काम ढाई बजे ही आरंभ हो पाता है। कल भी यही हुआ मुझे एक अदालत से निकलते निकलते 1.40 बज गए। परिसर के मुख्य द्वार पर एक नेताजी उर्फ सेवानिवृत्त सरकार समर्थक कर्मचारी यूनियन के नेता मिल गए। सारे जीवन कर्मचारियों से पैसा खर्च कराते और उन के छोटे मोटे काम कराते रहे।
मुझे देखते ही नेताजी ने जोरदार नमस्ते किया। मैं ने भी उन्हें जवाब दिया। वे किसी के साथ भ्रष्टाचार की समस्या पर बात कर रहे थे। बिलकुल सरकारी पार्टी के सांसदों जैसी भाषा बोल रहे थे। कह रहे थे "साहब भ्रष्टाचार मिट सकता है क्या?  दो चार दिन गुब्बारा फूला रहेगा, फिर इस की हवा निकल जाएगी। गुब्बारे में फिर से हवा भरी जाएगी तो फिर निकल जाएगी। कब तक हवा भरते रहेंगे? एक दिन गुब्बारा बेकार हो जाएगा।" मैं ने उन्हें तसल्ली से सुना। फिर उन्हें एक किस्सा सुनाने लगा, जिसे मैं ने पैंतीस बरस पहले पढ़ा था। बताया जाता है कि यह सच्चा किस्सा है। होगा तो ग्वालियर से संबंधित कोई न कोई ब्लागर इस की ताईद भी कर देंगे। अब आप को भी वह किस्सा संक्षेप में बता ही देता हूँ।

हुआ यूँ कि ग्वालियर राज्य का एक ब्राह्मण युवक  राज दरबार में अच्छा पद प्राप्त करने की इच्छा लिए काशी से विद्या अध्ययन कर लौटा। राजा के दरबार में पहुँचना आसान न था। वहाँ हर किसी की पहुँच न थी। युवक ने किसी तरह जुगाड़ किया और राजा के सामने उपस्थित हो गया। राजा को उसने अपना परिचय दिया और कहा कि आप तो विद्वानों की पहचान रखते हैं इस लिए वह उपस्थित हुआ है कि उसे उस की योग्यता के अनुरूप दरबार में कोई काम मिल जाएगा। लेकिन राजा ने उस से पूछा कि वह दरबार तक कैसे पहुँचा? यहाँ तो हर कोई पहुँच नहीं सकता। युवक ने उसे बताया कि आप के राज में बड़ी पोल (छिद्र) है। राजा ने उसे कहा कि वह भी किसी पोल में घुस ले। युवक ने राजा को कहा कि आप के राज में वह आप की आज्ञा के बिना किसी पोल में कैसे घुस सकता है? उसे राजाज्ञा दे दी जाए। राजा ने आदेश लिखवाया "युवक कहता है कि ग्वालियर के राज में बड़ी पोल है, इस लिए उसे आज्ञा दी जाती है कि वह किसी पोल में घुस जाए।" राजाज्ञा पर राजा की मुहर अंकित कर दी गई, युवक उसे ले कर दरबार से चला आया। 

युवक ने ग्वालियर पहुँचने वाले मार्गों में से एक पर नगर के बाहर उस ने एक पेड़ पर रस्सी बांधी और सड़क के दूसरी ओर रस्सी का दूसरा सिरा पकड़ कर बैठ गया। कोई भी वाहन आता तो वह रोक लेता और राजाज्ञा होने की बात कह कर उस से महसूल वसूल करता। कुछ दिनों में उस के पास पैसा इकट्ठा हो गया। उस ने कुछ कर्मचारी रख लिए। उन से काम कराने लगा, खुद निगरानी रखता। कोई छह माह बाद उस ने कर्मचारियों से कहा कि अब राजा ग्वालियर से बाहर जाएँ और जब वापस आएँ तो उनका वाहन रोक दिया जाए। कर्मचारियों ने एक दिन राजा का वाहन रोक दिया। राजा को आश्चर्य हुआ कि उस का वाहन कौन रोक सकता है। उसने अपने अंगरक्षकों से पूछताछ करने को कहा। अंगरक्षकों ने पूछताछ करने पर बताया कि एक पंडित है जो कहता है कि यहाँ राजाज्ञा से हर वाहन पर महसूल लगता है राजा को भी देना होगा। राजा ने महसूल दे कर वाहन को नगर प्रवेश कराने का आदेश दिया और कहा कि पंडित को दरबार में हाजिर किया जाए।

गले दिन पंडित दरबार में हाजिर हुआ तो उस से पूछा गया कि वह महसूल किस हक से वसूल करता है। तो उस ने कहा कि वह राजाज्ञा से करता है। राजा ने राजाज्ञा बताने को कहा तो पंडित ने वही आदेश सामने कर दिया जिस में किसी भी पोल में घुसने का आदेश दिया गया था। राजा ने स्वीकार किया कि उस के राज में पोल है। राजा ने राजस्व विभाग में एक नगर प्रवेश राजस्व का विभाग स्थापित कर दिया और पंडित को उस का मुखिया नियुक्त किया। अब ग्वालियर प्रवेश के सभी मार्गों पर चुंगी नाके स्थापित कर दिए गए और नगर प्रवेश शुल्क वसूल किया जाने लगा। 

मैं ने उक्त किस्सा नेताजी को सुना कर कहा कि भ्रष्टाचार भी इसी तरह की पोल में घुस जाने की राजाज्ञाओं से चलता है। यदि उसे मिटाना है तो राजा पर चोट करनी होगी। नेता जी ने तुरंत हाँ भर दी। कहने लगे -वही तो मैं कह रहा हूँ कि भ्रष्टाचार ऐसे नहीं मिटेगा, उस के लिए तो पूरी व्यवस्था ही बदलनी होगी। मैं ने घड़ी देखी तो दो बजने को थे। यदि मैं दो बजने तक चाय पर नहीं पहुँचा तो साथी मुझ पर दंड कर सकते थे। मैं ने नेताजी को अलविदा कहा और तेजी से केंटीन की ओर कदम बढ़ा दिए।

Tuesday, August 30, 2011

आन्दोलन के पहले चरण के उपरान्त पहला दिन

न्ना अस्पताल में हैं। खबर है कि पहले उन का भार लगभग 500 ग्राम प्रतिदिन की दर से कम हो रहा था। अब जो कुछ तरल खाद्य वे ले रहे हैं उस से यह गिरावट 200 ग्राम प्रतिदिन रह गई है। दो दिन में वह स्थिति आ जाएगी कि उन का भार गिरना बंद हो जाएगा और उस के बाद उन्हें फिर से अपना वजन बढ़ाना होगा। आखिर अभी तो संघर्ष का आरंभ है। परिवर्तन की इस बयार को बहुत दूर तक जाना पड़ेगा। 

आंदोलन के बाद आज अदालत का पहला दिन था। अन्ना के अनशन के दौरान अदालतों में जरुरी काम ही हो पा रहे थे। लोगों को जिन में न्यायार्थियों से ले कर वकील, वकीलों के लिपिक, टंकणकर्ता, न्यायाधीश और न्यायालयों के कर्मचारी सभी सम्मिलित हैं, इस आंदोलन ने कमोबेश प्रभावित किया था। आज जब मैं अदालत पहुँचा तो कार को पार्क करने के लिए मुश्किल से स्थान मिला। वहीं मैं समझ चुका था कि आज अदालत में लोगों की संख्या बहुत होगी। होनी भी चाहिए थी। पिछले 12 दिनों से काम की गति मन्थर जो हो चली थी। इस सप्ताह में फिर ईद और गणेश चतुर्थी के अवकाश हैं। कुल तीन दिन काम के हैं। इस कारण से जिन लोगों के काम अटके हैं वे सभी आज अदालत अवश्य पहुँचे होंगे। मैं ने अपना काम निपटाना आरंभ किया तो 1.30 बजे भोजनावकाश तक केवल दो-तीन काम शेष रह गए थे। 

दालत में चर्चा का विषय था कि क्या भ्रष्टाचार कम या समाप्त हो सकता है? मेरा जवाब था कि कम तो हो ही सकता है, समाप्त भी हो सकता है। पिछले पाँच-छह वर्ष से वकालत कर रहे एक वकील का कहना था कि यह संभव ही नहीं है। यदि धन का लेन-देन बन्द हो जाएगा तो बहुत से काम रुक ही जाएंगे। मैं ने उस से पूछा कि तुम कौन से काम के लिए कह रहे हो? उस का उत्तर था, 'पेशी पर गैरहाजिर होने वाले मुलजिम की जमानत जब्त होने और उस का गिरफ्तारी वारंट निकल जाने पर वह जिस दिन जमानत कराने के लिए अदालत आता है तो हमें उस के मुकदमे की तुरंत पत्रावली देखने की आवश्यकता होती है। जिसे देखने का कोई नियम नहीं है। पत्रावली देखने के लिए निरीक्षण का आवेदन करना होता है और अगले दिन निरीक्षण कराया जाता है। जब कि कुछ रुपए देने पर बाबू तुरंत पत्रावली दिखा देता है। यह काम बाबू को पैसे दिए बिना क्यों करेगा? मैं ने कहा आवेदन प्रस्तुत करने पर पत्रावली निरीक्षण का नियम है। समस्या केवल इतनी है कि यह तुरंत नहीं हो सकता। यह प्रबंध करने का दायित्व न्यायाधीश का है। हम अदालत के न्यायाधीश से निवेदन कर सकते हैं। यदि वहाँ संभव न हो तो जिला न्यायाधीश से अधिवक्ता परिषद का प्रतिनिधि मंडल मिल कर अपनी यह परेशानी बता सकता है। यह निर्धारित किया जा सकता है कि किन कामों के लिए तुरंत पत्रावली देखा जाना आवश्यक है और उन कामों को सूचीबद्ध किया जा सकता है। सूचीबद्ध कामों के लिए पत्रावली निरीक्षण हेतु तुरंत उपलब्ध कराए जाने का सामान्य निर्देश जिला न्यायाधीश सभी न्यायालयों को भेज सकते हैं। वैसी स्थिति में फिर किसी पत्रावली को देखने के लिए बाबू को घूस देने की आवश्यकता नहीं होगी। 

स उदाहरण से समझा जा सकता है कि यदि हमें व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाना है तो हमें हर क्षेत्र में बहुत से ऐसे नियम बनाने होंगे और स्थाई आदेश जारी करने होंगे जिस से आवश्यक और उचित कामों के लिए घूस नहीं देनी पड़े। लेकिन इस काम के लिए हर क्षेत्र के लोगों को समस्याएँ प्रशासकों के सामने रखनी होंगी जिस से उन के लिए नियम बनाए जा सकें या स्थाई आदेश जारी किए जा सकें।

Sunday, August 28, 2011

ये कैसा देश है भला ये कैसा आशियाँ?

न्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को देश भर में जिस तरह का समर्थन प्राप्त हुआ वह अद्भुत था। लेकिन इस के पीछे उन हजारों कार्यकर्ताओं का श्रम भी था, जो गाँव गाँव, नगर नगर और गली गली में सक्रिय थे। ये वे कार्यकर्ता थे जो किसी न किसी रूप में अन्याय का लगातार विरोध करते रहे थे और जिन का एक न्याय संगत व्यवस्था की स्थापना में विश्वास था। महेन्द्र 'नेह' ऐसे ही एक कार्यकर्ता थे। जिन्हों ने न केवल इस आंदोलन में एक सक्रिय कार्यकर्ता की भूमिका अदा की अपितु आंदोलन की कोटा इकाई को नेतृत्व प्रदान करने में प्रमुख रहे। उन के इस सक्रिय योगदान के साथ साथ उन के गीतों ने भी इस आंदोलन के लिए चेतना की मशाल जगाने का काम किया। कल मैं ने उन का एक गीत यहाँ प्रस्तुत किया था जो इन दिनों आंदोलन के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ। आज मैं एक और गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह गीत चालीस-बयालीस वर्ष पहले रचा गया था। शायद तब जब लोकपाल बिल का विचार सब से पहले पैदा हुआ था। समय समय पर इसे लोकप्रियता मिली और आज इस आंदोलन के बीच फिर से लोकप्रिय हो उठा।


ये कैसा देश है भला ये कैसा आशियाँ? 
  • महेन्द्र 'नेह'
 
ये कैसा देश है भला ये कैसा आशियाँ 
भूखों को यहाँ गोलियाँ प्यासों को बर्छियाँ!

है पैसा बड़ा, आदमी छोटा बहुत यहाँ
इन्सान से दस्तूर है खोटा बहुत यहाँ 
मलबा समझती आदमी को ऊँची हस्तियाँ!

मेहनत यहाँ दौलत के शिकंजों में कसी है
जनता यहाँ महंगाई के जबड़ों में फँसी है
बालू के ढेर पर तड़पती जैसे मछलियाँ!

घर-घर से उभरती है  मुफलिसी की कहानी
सड़कों में भटकती है परेशान जवानी
कैंसर से सिसकती हैं यहाँ बीमार बस्तियाँ!

कर्जे के मकाँ में उम्मीदें क़ैद हैं यहाँ 
डण्डा लिए दरोगाजी मुस्तैद हैं यहाँ 
हैं आदमी पे हावी यहाँ खाकी वर्दियाँ!

जनतंत्र नाम का यहाँ गुण्डों का राज है
इन्सानी खूँ के प्यासे दरिन्दों का राज है 
ज़िन्दा चबा रहे हैं आदमी की बोटियाँ!

बदलेंगी उदास ये तारीक फ़िजाएँ
होंगी गरम ये धमनियाँ ये सर्द हवाएँ
लाएंगी रंग एक दिन ये सूखी अँतड़ियाँ!

उट्ठेंगे इस ज़मीन से जाँबाज जलजले
मिट जाएंगे जहान से नफरत के सिलसिले
जीतेगा आदमी जलेंगी मोटी कुर्सियाँ!
 


Saturday, August 27, 2011

सच के ठाठ निराले होंगे

धर अन्ना हजारे बारह दिनों से अनशन पर हैं। दिन में अनेक बार चिकित्सक उन की देह परीक्षा करते हैं। छठे सातवें दिन से ही सरकार इस प्रतीक्षा में थी कि चिकित्सक रिपोर्ट करें तो कुछ अन्ना के साथ लगे लोगों का मनोबल टूटे और सरकार अन्ना जी को अस्पताल पहुँचा दे। लेकिन जब जब भी चिकित्सकों ने उन की परीक्षा की तब तब सरकार को निराश होना पड़ा। वजन जरूर कम हो रहा था। लेकिन शरीर सामान्य था। रक्तचाप सामान्य, गुर्दे सामान्य, उन्हें काम करने में कोई परेशानी नहीं आ रही थी। ऊपर से वे बीच बीच में मंच पर आ कर जिस जोश से नारे लगाते थे। अन्ना इस्पात पुरुष साबित हुए। आज भी उन्हें यह कहते सुना गया कि अभी तीन-चार दिन उन्हें कुछ नहीं होगा। लालू यादव उन के 12 दिनों के अनशन पर रिसर्च कराना चाहते हैं कि उन में ऐसा क्या है जो भोजन का एक अंश भी ग्रहण किए बिना भी 12 दिनों तक सामान्य रह सकते हैं? संसद का प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद जब अन्ना ने घोषणा की कि यह आधी जीत है तो उस के साथ ही उन्हों ने लालू जी की शंका का समाधान भी कर दिया कि यह ब्रह्मचर्य का प्रताप है, इसे वे समझ सकते हैं जिन्हों ने हमेशा स्त्री को माँ, बहिन व बेटी समझा हो। वे तो कदापि नहीं समझ सकते जो अपनी शक्ति बारह संतानों को जन्म देने में व्यय कर देते हैं। 

धी जीत का जश्न देश भर में आरंभ हो चुका है। नगर में पटाखों की आवाजें गूंज रही हैं। 28 अगस्तजश्न का रविवार होगा। सोमवार को जब सब संस्थान खुलेंगे तो वह दिन एक नया दिन होगा। जिन लोगों ने इस आंदोलन को पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ जिया है उन के लिए आने वाले दिन आत्मविश्वास के होंगे। वे कोशिश करेंगे तो इस आत्मविश्वास का उपयोग वे अपने आसपास फैली भ्रष्टाचार की गंदगी को साफ करने में कर सकते हैं। जिन लोगों ने सदाचार को अपने जीवन में आरंभ से अपनाया और जमाने की लय में न चल कर अपने आप को अलग रखते हुए छुटका कद जीते रहे, उन का कद लोगों को बढ़ा हुआ दिखाई देने लगेगा। जो लोग गंदगी में सने हुए धन बल के मोटे तले के जूते पहन कर अपना कद बड़ा कर जीते रहे। कल से अपने जूते कहीं छुपाएंगे। धीमे स्वर में यह भी कहेंगे कि यह सब कुछ दिन की बात है राजनीति उन के रास्ते के बिना चल नहीं सकती, नई बिसात पर काले घोड़े फिर से ढाई घर कूदने लगेंगे। ऐसे लोगों से सावधान रहने और उन्हें किनारे लगाने के काम में लोगों को जुटना होगा। 

हाँ कोटा में इंडिया अगेन्स्ट करप्शन की कमान एक नौजवान के हाथों में थी जो कभी गणित का स्कॉलर रहा। एक धनिक परिवार से होते हुए भी अपने मूल्यों से समझौता करना स्वीकार नहीं कर के अपना पारिवारिक कारोबार त्याग कर नौकरी करने चल पड़ा था।  परिवार को उस के मूल्य अपनाने पड़े। अप्रेल से आज तक वही नौजवान अपने साथियों के साथ राजनीति की चालों को दरकिनार करते हुए दृढ़ता से आंदोलन का संचालन करता रहा। हमारे जनकवि-गीतकार महेन्द्र 'नेह' ने भी इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका अदा की उन के संघर्षों के लंबे अनुभवों का लाभ आंदोलन ने उठाया। एक चिकित्सक 16 अगस्त से ही अनशन पर थे। दो दिन पहले पुलिस मजिस्ट्रेट का आदेश ले कर उन्हें उठाने आई लेकिन उन्हें उन के निश्चय से नहीं डिगा सकी। लेकिन चिकित्सक समुदाय ने उन्हे अगले दिन समुदाय के हितों को ध्यान में रखते हुए अत्यावश्यक चिकित्सा लेने को बाध्य किया। लेकिन आज फिर वे क्रमिक अनशन पर पाण्डाल में उपस्थित थे। महेन्द्र भी आज अनशन पर थे। इस बीच उन के कुछ पुराने गीतों को कार्यकर्ता ले उड़े और उन की हजारों प्रतियाँ बना कर लोगों के बीच वितरित कीं। मैं आज महेन्द्र से मिलने अनशन स्थल पर पहुँचा तो मुझे भी वे गीत छपे पर्चे मिले। उन्हीं में से एक गीत से आप को रूबरू करवा रहा हूँ। यह गीत कोई बारह वर्ष पूर्व लिखा गया था। आज इसे पढ़ कर लगता है कि कवि केवल भूतकाल और वर्तमान की ही पुनर्रचना नहीं करता, वह भविष्यवाणियाँ भी करता है। 
सच के ठाठ निराले होंगे
  • महेन्द्र 'नेह'
सच के ठाठ निराले होंगे
झूठों के मुहँ काले होंगे!

जाने कब धनिया के घर में
सुचमुच ही उजियाले होंगे!

बूढ़ी अम्मा - दादाजी के 
खत्म आँख के जाले होंगे!

आग लगेगी काले धन में
तार-तार घोटाले होंगे!

आने वाले दिन बस्ती में
आफ़त के परकाले होंगे!

सत्ता की संगीनें होंगी
करतब देखे भाले होंगे!

दुबके होंगे कायर घर में
सड़कों पर दिलवाले होंगे!



Thursday, August 25, 2011

डाक्टर अमर को जीवन भर विस्मृत नहीं किया जा सकता

सुबह सुबह ही इंटरनेट पर जाते ही समाचार मिला कि डाक्टर अमर नहीं रहे। मेरे लिए यह अत्यन्त संघातिक समाचार था। उन के ब्लाग पर एक आलेख मुझे बहुत पसंद आया था और मैं ने उस आलेख और उन के ब्लाग का अनवरत पर उल्लेख किया था। उस के बाद उन से नेट संपर्क बना रहा। उन से रूबरू मिलने की तमन्ना पनपी। पर वह तभी संभव था जब वे मेरे घर आते या मैं उन के घर जाता या फिर किसी तीसरे स्थान पर हम मिलते। उन का इधर आना नहीं हो सका। मेरा जैसा व्यक्ति जो अपने काम के कारण भी और स्वभाव से भी गृहअनुरागी है, उन से मिलने नहीं जा सका। किसी तीसरे स्थान पर भी उन से भेंट नहीं हो सकी। उन से जीवन में नहीं मिल सकना मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति है। मैं ने उन्हें सदैव अपना बड़ा भाई समझा। उन्हों ने मुझे एक बराबर के मित्र जैसा व्यवहार और स्नेह प्रदान किया। वे  अभिव्यक्ति में बहुत खरे थे, शायद अपने जीवन में भी वैसे ही रहे होंगे। दुनिया में बहुत कम इस प्रकार के खरे व्यक्ति होते हैं। विशेष रूप से चिकित्सक और वकील का इतना खरा होना संभव नहीं होता। लेकिन वे थे। मैं चाहते हुए भी शायद उतना नहीं हूँ। 

न का नहीं रहना मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति है। मैं नहीं बता सकता कि मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ। लेकिन जीवन कभी नहीं रुकता है। इस विश्व के छोटे से छोटे कण और बड़े से बड़े पिण्ड की भाँति वह सतत गतिमय होता है। आज तीन दिनों के बाद अदालत खुली थी। मेरे पास आज काम भी बहुत अधिक था। मैं सुबह 11 बजे अदालत जाने के बाद शाम 5 बजे तक लगातार काम करता रहा। भागदौड़ भी बहुत अधिक हुई। शाम को भी अनायास ही मुझे अपने एक स्नेही की समस्या में शामिल होना पड़ा। वहाँ से अभी आधी रात को अपने घर पहुँचा हूँ। आज देश बहुत महत्वपूर्ण घटनाक्रम से गुजरा है। कल का दिन कैसा होगा? कोई अनुमान नहीं कर सकता। कल मेरा शहर कोटा बंद है। वकील भी कल काम बंद कर अन्ना के आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन करेंगे। कल के बाद क्या होगा। यह अनुमान नहीं किया जा सकता। आज बहुत कुछ कहना चाहता था। लेकिन डाक्टर अमर की क्षति के कारण कुछ लिखने का मन नहीं है।  

डाक्टर अमर को मेरी आत्मिक श्रद्धांजलि!!!

ह हिन्दी ब्लाग जगत की तो भारी क्षति है ही। निश्चित रूप से उन के परिवार के लिए यह क्षति बहुत अधिक है। विशेष रूप से भाभी के लिए तो यह भारी आघात है। मैं समझ सकता हूँ कि उन के नगर के लोगों और उन के निकट के लोगों के लिए भी यह बहुत आघातकारी है। मैं सब के दुःख में अपने दुःख के साथ सब के साथ हूँ। हम जीवन भर उन्हें विस्मृत नहीं कर सकेंगे।

Tuesday, August 23, 2011

सच बोले मनमोहन

खिर बुलावा आया, मंत्री जी से भेंट हुई। आखिर आठवें दिन मंत्री जी ने उन को समझने की कोशिश की। वे कितना समझे, कितना न समझे? मंत्री जी ने किसी को न बताया। थोड़ी देर बाद प्रधान मंत्री जी की अनशन तोड़ने की अपील आई। सब से प्रमुख मंत्री की बातचीत के लिए नियुक्ति हुई। आंदोलनकारियों के तीन प्रतिनिधि बातचीत के लिए निकल पड़े। इधर अन्ना का स्वास्थ्य खराब होने लगा डाक्टरों ने अस्पताल जाने की सलाह दी। अन्ना ने उसे ठुकरा दिया। स्वास्थ्य को स्थिर रखने की बात हुई तो अन्ना बोले मैं जनता के बीच रहूंगा। अब यहीँ उन की चिकित्सा की कोशिश हो रही है। उन्होंने ड्रिप लेने से मना कर दिया है। सरकार कहती है कि वह जनलोकपाल बिल को स्थायी समिति को भेज सकती है यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुमति प्रदान कर दें। स्थाई समिति को शीघ्र कार्यवाही के लिए भी निर्देश दे सकती है। लेकिन संसदीय परम्पराओं की पालना आवश्यक है।

रकार संसदीय परंपराओं की बहुत परवाह करती है। उसे करना भी चाहिए क्यों कि संसद से ही तो उस पहचान है। संसदीय परंपराओं की उस से अधिक किसे जानकारी हो सकती है? पर लगता है इस जानकारी का पुनर्विलोकन सरकार ने अभी हाल में ही किया है। चार माह पहले तक सरकार को इन परंपराओं को स्मरण नहीं हो रहा था। तब सरकार ने स्वीकार किया था कि वह 15 अगस्त तक लोकपाल बिल को पारित करा लेगी। स्पष्ट है कि सरकार की नीयत आरंभ से ही साफ नहीं थी। उस की निगाह में भ्रष्टाचार कोई अहम् मुद्दा कभी नहीं रहा। उस की निगाह में तो जनता को किसी भी प्रकार का न्याय प्रदान करना अहम् मुद्दा कभी नहीं रहा। सरकार के एजेंडे में सब से प्रमुख मुद्दा आर्थिक सुधार और केवल आर्थिक सुधार ही एक मात्र मुद्दा हैं। जीडीपी सरकार के लिए सब से बड़ा लक्ष्य है। आंदोलन के आठ दिनों में भ्रष्टाचार से त्रस्त देश की जनता जिस तरह से सड़कों पर निकल कर आ रही है उस से सरकार की नींद उड़ जानी चाहिए थी। पर दुर्भाग्य की बात यह है कि उन्हें अभी भी नींद आ रही है और वह सपने भी देख रही है तो आर्थिक सुधारों और जीडीपी के ही। सोमवार को प्रधान मंत्री ने जब आंदोलन के बारे में कुछ बोला तो उस में भी यही कहा कि “दो दशक पहले शुरू किए गए आर्थिक सुधारों ने भारत के बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। इसकी वजह से भारत सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक हो गया है। उन्होंने कहा कि अगर हम रफ्तार की यही गति बनाए रखते हैं तो हम देश को 2025 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा जीडीपी वाला देश बना सकते हैं”। यह जीडीपी देश का आंकड़ा दिखाती है देश की जनता का नहीं। देश की जनता उन से यही पूछ रही है कि यह जीड़ीपी किस के घर गिरवी है? जनता तो गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से त्रस्त है।

निश्चय ही प्रधानमंत्री को एक राजनैतिक व्यक्तित्व होना चाहिए। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री राजनैतिक व्यक्तित्व बाद में हैं पहले वे मनमोहक अर्थशास्त्री हैं। उन का मुहँ जब खुलता है तो केवल अर्थशास्त्रीय आँकड़े उगलता है। वे शायद मिडास हो जाना चाहते हैं। जिस चीज पर हाथ रखें वह सोना हो जाए। वे देश की जनता को उसी तरह विस्मृत कर चुके हैं जिस तरह राजा मिडास भोजन और बेटी को विस्मृत कर चुका था। जब वह भोजन करने बैठा तो भोजन स्पर्श से सोना हो गया। जिसे वह खा नहीं सकता था। दुःख से उसने बेटी को छुआ तो वह भी सोने की मूरत में तब्दील हो गई। प्रधानमंत्री का मुख भी अब कुछ सचाई उगलता दिखाई देता है जब वे देख रहे हैं कि लोग तिरंगा लिए सड़कों पर आ चुके हैं। सोमवार के बयान में उन्हों ने कहा कि “इसके लिए न्यायिक व्यवस्था में सुधार करना होगा। तेजी से मामलों के निपटान और समय से न्याय मिलने की प्रक्रिया से भ्रष्टाचार दूर करने में खासी मदद मिलेगी। इससे संदेश जाएगा कि जो लोग कानून तोड़ेंगे, वे खुले नहीं घूम सकते”।

तो अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को यह सच पता लग चुका है? हो सकता है यह सच उन्हें पहले से पता हो। लेकिन वे विस्मृत कर रहे हों। यह हो सकता है कि उन्हें यह सच अब जा कर पता लगा हो। मेरा अपना ब्लाग तीसरा खंबा की पहली पोस्ट में ही यह बात उठाई गई थी कि देश में न्यायालयों की संख्या कम है और इस का असर देश की पूरी व्यवस्था पर पड़ रहा है। यह बात देश के मुख्य न्यायाधीश ने बार बार सरकार से कही। पर सरकार ने हमेशा की तरह इस बात को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया। शायद वे सोचते थे क्या आवश्यकता है न्याय करने की? क्या आवश्यकता है नियमों को तोड़ने और मनमानी करने वाले लोगों को दंडित करने की? जब जीडीपी बढ़ जाएगी तो सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। इस जीडीपी के घोड़े पर बैठ कर उन्हें सच नजर ही नहीं आता था। अब जनता जब सड़कों पर निकल आई है औऱ प्रधानमंत्री का जीडीपी का घोड़ा ठिठक कर खड़ा हो गया है तो उन्हें न्याय व्यवस्था का स्मरण हो आया है। काश यह स्मरण सभी राजनीतिकों को हो जाए। न्याय व्यवस्था ऐसी हो कि न्याय जल्दी हो और सच्चा हो। सभी को उस पर विश्वास हो।

Monday, August 22, 2011

भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए लंबा और सतत संघर्ष जरूरी

ब ये सवाल उठाया जा रहा है कि क्या जन-लोकपाल विधेयक के ज्यों का त्यों पारित हो कर कानून बन जाने से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा? यह सवाल सामान्य लोग भी उठा रहे हैं और राजनैतिक लोग भी। जो लोग वोट की राजनीति को नजदीक से देखते हैं, उस से प्रभावित हैं  और हमारी सरकारों तथा उन के काम करने के तरीकों से भी नजदीकी से परिचित हैं उन के द्वारा यह प्रश्न उठाया जाना स्वाभाविक है। लेकिन आज यही प्रश्न कोटा में राजस्थान के गृहमंत्री शान्ति धारीवाल ने कुछ पत्रकारों द्वारा किए गए सवालों के जवाब में उठाया। मुझे इस बात का अत्यन्त क्षोभ है कि एक जिम्मेदार मंत्री इस तरह की बात कर सकता है। जनता ने जिसे चुन कर विधान सभा में जिस कर्तव्य के लिए भेजा है और जिस ने सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री पद की शपथ ले कर कर्तव्यों का निर्वहन करने की शपथ ली है वही यह कहने लगे कि इस कर्तव्य का निर्वहन असंभव है तो उस से किस तरह की आशा की जा सकती है। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि आज देश की बागडोर ऐसे ही लोगों के हाथों में है। मौजूदा जनतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था में यह जनता की विवशता है कि उस के पास अन्य किसी को चुन कर भेजे जाने का विकल्प तक नहीं है। ऐसी अवस्था में जब रामलीला मैदान पर यह प्रश्न पूछे जाने पर कि आप पार्टी क्यों नहीं बनाते, खुद सरकार में क्यों नहीं आते अरविंद केजरीवाल पूरी दृढ़ता के साथ कहते हैं कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे तो उन की बात तार्किक लगती है। 

स्थिति यह है कि विधान सभाओं और संसद के लिए नुमाइंदे चुने जाने की जो मौजूदा व्यवस्था है वह जनता के सही नुमाइंदे भेजने में पूरी तरह अक्षम सिद्ध हो चुकी है। उसे बदलने की आवश्यकता है। जब तक वह व्यवस्था बदली नहीं जाती तब तक चुनावों के माध्यम से जनता के सच्चे नुमाइंदे विधायिका और कार्यपालिका में भेजा जाना संभव ही नहीं है। वहाँ वे ही लोग पहुँच सकते हैं जिन्हें इस देश के बीस प्रतिशत संपन्न लोगों का वरदहस्त और मदद प्राप्त है। वे इस चुनावी व्यवस्था के माध्यम से चुने जा कर जनप्रतिनिधि कहलाते हैं। लेकिन वे वास्तव में उन्हीं 10-20 प्रतिशत लोगों के प्रतिनिधि हैं जो इस देश को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। देश में फैला भ्रष्टाचार उन की जीवनी शक्ति है। इसी के माध्यम से वे इन कथित जनप्रतिनिधियों को अपने इशारों पर नचाते हैं और जन प्रतिनिधि नाचते हैं। 

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो आंदोलन इस देश में अब खड़ा हो रहा है वह अभी नगरीय जनता में सिमटा है बावजूद इस के कि कल हुए प्रदर्शनों में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया। ये लोग जो घरों, दफ्तरों व काम की जगहों से निकल कर सड़क पर तिरंगा लिए आ गए हैं और वंदे मातरम्, भारत माता की जय तथा इंकलाब जिन्दाबाद के नारों से वातावरण को गुंजा रहे हैं। भारतीय जनता के बहुत थोड़ा हिस्सा हैं। लेकिन यह ज्वाला जो जली है उस की आँच निश्चय ही देश के कोने कोने तक पहुँच रही है। पूरे देश में विस्तार पा रही इस अग्नि को रोक पाने की शक्ति किसी में नहीं है। यह आग ही वह विश्वास पैदा कर रही है जो दिलासा देती है कि भ्रष्टाचार से मुक्ति पाई जा सकती है। लेकिन जन-लोकपाल विधेयक के कानून बन जाने मात्र से यह सब हो सकना मुमकिन नहीं है। यह बात तो इस आंदोलन का नेतृत्व करने रहे स्वयं अन्ना हजारे भी स्वीकार करते हैं कि जन-लोकपाल कानून 65 प्रतिशत तक भ्रष्टाचार को कम कर सकता है, अर्थात एक तिहाई से अधिक भ्रष्टाचार तो बना ही रहेगी उसे कैसे समाप्त किया जा सकेगा? 

लेकिन मेरा पूरा विश्वास है कि  जो जनता इस आंदोलन का हिस्सा बन रही है जो इस में तपने जा रही है उस में शामिल लोग अभी से यह तय करना शुरू कर दें कि वे भ्रष्टाचार का हिस्सा नहीं बनेंगे तो भ्रष्टाचार को इस देश से लगभग समाप्त किया जा सकता है। भ्रष्टाचारी सदैव जिस चीज से डरता है वह है उस का सार्वजनिक रूप से भ्रष्ट होने का उद्घोष। जहाँ भी हमें भ्रष्टाचार दिखे वहीं हम उस का मुकाबला करें, उसे तुरंत सार्वजनिक करें। एक बार भ्रष्ट होने का मूल्य समाज में सब से बड़ी बुराई के रूप में स्थापित होने लगेगा तो भ्रष्टाचार दुम दबा कर भागने लगेगा। अभी उस के लिए अच्छा वातावरण है, लोगों में उत्साह है। यदि इसी वातावरण में यह काम आरंभ हो जाए तो अच्छे परिणाम आ सकते हैं। जो लोग चाहते हैं कि वास्तव में भ्रष्टाचार समाप्त हो तो उन्हें एक लंबे और सतत संघर्ष के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

Sunday, August 21, 2011

भट्टी में जाने के पहले, ईंट ये गल-बह जाए

त्ताधीश का कारोबार बहुत जंजाली होता है। उसे सदैव भय लगा रहता है कि कहीं सत्ता उस के हाथ से छिन न जाए। इस लिए वह अपने जंजाल को लगातार विस्तार देता रहता है। ठीक मकड़ी की तरह, जो यह सोचती है कि उस ने जो जाल बनाया है वह उसे भोजन भी देगा और रक्षा भी। ऐसा होता भी है। उस के भोज्य जाल में फँस जाते हैं, निकल नहीं पाते और प्राण त्याग देते हैं। तब मकड़ी उन्हें आराम से चट करती रहती है। लेकिन मकड़ी के जाल की अपनी सीमा है। जिस दिन बारिश से सामना होता है, जाल भी बह जाता है और साथ ही मकड़ी भी। बारिश न भी हो तो भी एक दिन मकड़ी का बनाया जाल इतना विस्तृत हो जाता है कि वह खुद ही उस से बाहर नहीं निकल पाती, उस का बनाया जाल ही उस के प्राण ले लेता है। 


ब देश में सत्ता किस की है? यह बहुत ही विकट प्रश्न है। किताबों में बताती हैं कि सत्ता देश की जनता की है। आखिर इकसठ साल पहले लिखे गए संविधान के पहले पन्ने पर यही लिखा था "हम भारत के लोग ...." लेकिन जब जनता अपनी ओर देखती है तो खुद को निरीह पाती है। कोई है जो केरोसीन, पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ा देता है, फिर सारी चीजों के दाम बढ़ जाते हैं। जनता है कि टुकर-टुकुर देखती रहती है। समझ आने लगता है कि सत्ता की डोरी उन के आसपास भी नहीं है। सत्ता को सरकार चलाती है। हम समझते हैं कि सरकार की सत्ता है। जनता सरकार को कहती है कानून बनाने के लिए तो सरकार संसद का रास्ता दिखाती है। हम समझते हैं कि संसद की सत्ता है। सरकार कहती है संसद सर्वोच्च है तो संविधान का हवाला दे कोई कह देता है कि संसद नहीं जनता सर्वोच्च है। संसद को, सरकार को जनता चुनती है। जनता मालिक है और संसद और सरकार उस के नौकर हैं। 

जरीए संविधान, यह सच लगता है कि जनता देश की मालिक है। यह भी समझ आता है कि संसद और सरकार उस के नौकर हैं। लेकिन ये कैसे नौकर हैं। तनख्वाह तो जनता से लेते हैं और गाते-बजाते हैं पैसे रुपए (पैसा तो अब रहा ही कहाँ)  वालों के लिए, जमीन वालों के लिए। तब पता लगता है कि सत्ता तो रुपयों की है, जमीन की है। जिस का उस पर कब्जा है उस की है। बड़ा भ्रष्टाचार है जी, तनखा हम से और गीत रुपए-जमीन वालों के। इन गाने वालों को सजा मिलनी चाहिए। पर सजा तो कानून से ही दी जा सकती है, वह है ही नहीं। जनता कहती है -कानून बनाओ, वे कहते हैं -बनाएंगे। जनता कहती है -अभी बनाओ। तो वे हँसते है, हा! हा! हा! कानून कोई ऐसे बनता है? कानून  बनता है संसद में। पहले कच्चा बनता है, फिर संसद में दिखाया जाता है, फिर खड़ी पंचायत उसे जाँचती परखती है, लोगों को दिखाती है, राय लेती है। जब कच्चा, अच्छे से बन जाता तब  जा कर संसद के भट्टे में पकाती है। गोया कानून न हुआ, मिट्टी की ईंट हुई।  जनता कहती है अच्छे वाली कच्ची ईंट हमारे पास है, तुम इसे संसद की भट्टी में पका कर दे दो। वे कहते हैं -ऐसे कैसे पका दें? हम तो अपने कायदे से पकाएंगे। फिर आप की ईंट कैसे पका दें? हमें लोगों ने चुना है हम हमारी पकाएंगे और जब मरजी आएगी पकाएंगे। देखते नहीं भट्टे में ऐसी वैसी ईँट नहीं पक सकती। कायदे से बनी हुई पकती है। 42 साल हो गए हमें अच्छी-कच्ची बनाते। भट्टे में पक जाए ऐसी अब तक नहीं बनी। अब तुरत से कैसे बनेगी? कैसे पकेगी?


 सत्ता कैसी भी हो, किसी की भी हो। मुखौटा मनमोहक होता है, ऐसा कि जनता समझती रहे कि सत्ता उसी की है। उसे मनमोहन मिल भी जाते हैं। वे पाँच-सात बरस तक जनता का मन भी मोहते रहते हैं। जब सत्ता संकट में फँसती है तो संकट-हरन की भूमिका भी निभाते हैं। वे कहते हैं -हम ईंट पकाने के मामले पर बातचीत को तैयार हैं, उस के लिए दरवाजे हमेशा खुले हैं।  लेकिन हम सर्वसम्मति से बनाएंगे। सर्व में राजा भी शामिल हैं और कलमाड़ी भी। उन की बदकिस्मती कि वे तो जेल में बंद हैं। बहुत से वे भी हैं, जो खुशकिस्मत हैं और जेल से बाहर हैं। उन सब की सम्मति कैसे होगी? मनमोहन मन मोहना चाहते हैं। तब तक जब तक कि बारिश न आ जाए।  ये जनता जिस ईंट को पकवाना चाहती है वह बारिश के पानी में गल कर बह न जाए।  वे गा रहे हैं रेन डांस का गाना ....

इन्दर राजा पानी दो
इत्ता इत्ता पानी दो 

मोटी मोटी बूंदो वाली
तगड़ी सी बारिश आए
भट्टी में जाने के पहले 
ईंट ये गल-बह जाए



Friday, August 19, 2011

सर्वोच्च संसद, आंदोलन और संकल्प

संसद सर्वोच्च है। पर कौन सी संसद? जिसे जनता को चुन कर भेजे। मौजूदा संसद को क्या जनता ने चुना है? क्या जनता के पास अपनी पसंद का सांसद चुनने का अधिकार था? अब सांसद चुने जाने के लिए कम से कम दस करोड़ रूपया चाहिए। ये दस करोड़ कहाँ से आता है?  दस करोड़ की रस्सी का एक सिरा सांसद के गले में बंधा है ओर दूसरा दस करोड़ के स्रोत पर। चुने जाने के पहले सांसद की प्रतिबद्धता निश्चित हो जाती है। जिस संसद के सांसदों की प्रतिबद्धताएँ दस करोड़ की रस्सी से बंधी हों वह सर्वोच्च कैसे हो सकती है? सर्वोच्च तो वे हैं जिन के हाथों में ये रस्सियाँ बंधी हैं। चुने जाने के बाद कोई इस रस्सी को तुड़ाना चाहे तो करोड़ों वाली एक-दो रस्सियाँ और बांध दी जाती हैं। संसद का चुनाव होता है, तो लगता है जैसे 'पेट मंकी शो' हो रहा हो। बंदरों की सजावट और करतब देख कर चुनना हो कि किस के बंदर को चुनना है? अब बंदर संसद में बैठ कर तो यही बोलेगा कि संसद सर्वोच्च है। जोकर के लिए सर्कस सर्वोच्च है। वही उस का जीवन है। सर्वोच्च संसद का तर्क बहुत जोरों से दिया जा रहा है। कुछ लोगों को वह प्रभावित भी करता है। बंदरों को सिखाया-पढ़ाया याद रहता है। संसद का अस्तित्व संविधान से है। बंदरों ने संविधान की पहली पंक्ति को या तो कभी पढ़ा ही नहीं, पढ़ा होगा तो वे भूल गए  कि वहाँ लिखा है "हम भारत के लोग ....... आत्मार्पित करते हैं।"
खैर, आने वाले दिन तय करेंगे कि संसद सर्वोच्च है या संविधान के निर्माता। अन्ना के अनशन को तीन दिन हो चुके हैं। दिल्ली के बीच हो कर गुजर रही यमुना में कितना ही पानी बह कर जा चुका है। 16 अगस्त को कोटा की कलेक्ट्रेट पर धरना था। बहुत वकील भी वहाँ पहुँचे थे। उन्हों ने जोर शोर से नारे लगाए। उन्हें देख मुझे हँसी छूट रही थी। उन में अधिकांश ऐसे थे जिन्हें अपना काम कराने के लिए अदालतों के बाबुओँ और चपरासियों को धन देते देखा था। उन में से एक मुखर वकील से मैंने एक तरफ बुला कर कहा -आज संकल्प यहाँ आए वकीलों को संकल्प लेना चाहिए कि वे किसी को रिश्वत नहीं देंगे। उस का कहना था कि ये संभव नहीं है। हम तो काम ही न कर पाएंगे। मैं ने कहा -फिर तुम्हारा यहाँ आना बेकार है। कल कलेक्ट्री पर कोई धरना नहीं था। हाँ प्रदर्शन दिन भर होते रहे। वकीलों के बीच प्रस्ताव आया था कि जन लोकपाल के बिल व अन्ना के समर्थन में हड़ताल रखी जानी चाहिए। लेकिन कार्यकारिणी ने उसे ठुकरा दिया। तीन दिन का अवकाश आरंभ होने के एक दिन पहले किसी कारण से काम बंद रहा था। 16 अगस्त को उच्च न्यायालय  की भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश के देहांत के कारण काम बन्द रहा था।  पाँच दिनों से अदालतों में काम नहीं हो सका था। बहुत से आवश्यक काम रुके पड़े थे। कम से कम एक दिन में आवश्यक काम तो निपटा लिए जाएँ। लेकिन दोपहर भोजनावकाश के समय अचानक ढोल बजा, वकीलों को जलूस के लिए एकत्र किया जाने लगा। मुझे भी बुलाया गया। मैंने जाने से इन्कार कर दिया। आप लोग संकल्प लेने को तैयार हों तो ही साथ चल सकता हूँ।
अन्ना -आंदोलन के समर्थन में कोटा के वकीलों की रैली
धे घंटे में जलूस निपट लिया। मैं ने एकत्र वकीलों के बीच कहा कि कम से कम पाँच वकील तो संकल्प में मेरा साथ दे सकते हैं? कम से कम वे तो साथ दे ही सकते हैं जिन्हों ने कभी रिश्वत नहीं दी। मुझे पता था कि कोटा में कभी रिश्वत न देने वाले लोगों की संख्या इस से अधिक ही है। मैं ने उन्हें कोटा के ही श्रम न्यायालय का उदाहरण दे कर प्रश्न किया कि जब हम उस अदालत को 32 वर्षों तक रिश्वत विहीन बनाए रख सकते हैं तो बाकी अदालतों को क्यों नहीं ऐसा बना सकते? अभिभाषक परिषद कोटा के अध्यक्ष राजेश शर्मा और बार कौंसिल के सदस्य महेश गुप्ता ने मेरा साथ दिया। कम से कम हम तीन वहाँ थे जिन का अनुभव था कि बिना किसी तरह की रिश्वत दिए भी सफलता पूर्वक आजीवन वकालत का पेशा किया जा सकता है। आखिर तय हुआ कि कल काम बंद भी रखेंगे और संकल्प भी लेंगे। आज अदालत के चौक में सभा हुई और उपस्थित वकीलों, वकीलों के लिपिकों और टंकणकर्ताओं ने शपथ ली कि वे जीवन में कभी रिश्वत न देंगे, न किसी को रिश्वत देने के लिए प्रोत्साहित करेंग और अन्य लोगों को प्रोत्साहित करेंगे कि वे भी रिश्वत न दें।

हो सकता है संकल्प लेने वाले लोगों में से बहुत से इस संकल्प का पालन न करें। लेकिन कम से कम इतना तो हुआ कि लोग उन से पूछेंगे कि आप ने सार्वजनिक रूप से संकल्प लिया था, उस का क्या हुआ? मुझे तो बहुत दिनों से पक्का यक़ीन है कि हम तीन व्यक्ति भी मुखर हो जाएँ तो लोग हमारा अनुसरण करेंगे। कम से कम कोटा की अदालतों को भ्रष्टाचार मुक्त बना सकते हैं। बस इस आरंभ का अवसर नहीं मिल रहा था। धन्यवाद! अन्ना आप ने यह अवसर प्रदान किया।

Thursday, August 18, 2011

आने वाले दिन बताएंगे, बिगड़ैल बच्चा 'अ' अनार वाला लिखता है या नहीं?

खिर सूर्योदय से आरंभ होने वाला दिन ने अपने रंग दिखाने आरंभ किया। जिन की मति मारी गई थी उन के इशारों पर आंदोलन के नेताओं को हिरासत में लेना आरंभ कर दिया। सत्ता की यह वही प्रवृत्ति है जिस के चलते 1975 में आपातकाल लगा था। तब पूरे देश को एक जेल में तब्दील कर दिया गया था। तब भी जनता में विश्वास करने वालों को पूरा विश्वास था कि भारत में जनतंत्र की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि तानाशाही अधिक दिन नहीं चल सकती। इस बार तो अन्ना को हिरासत में लिए जाने के बाद ही जनता ने अपना रंग दिखाना आरंभ कर दिया। यह रंग ऐसा चढा़ कि शाम होते होते उन्हें नेताओं को छोड़ने का निर्णय करना पड़ा। 


न्ना ने कोई अपराध तो किया नहीं था। जब वे अपने फ्लेट से निकले तो इमारत से बाहर निकलने के पहले ही उन्हें उठा लिया गया था। पुलिस के पास इस के अलावा कोई चारा नहीं था कि यह कहा जाए कि उन्हें शान्ति भंग की आशंका से गिरफ्तार किया जा रहा है। फिर से अंग्रेजी राज से चले आ रहे एक जन विरोधी कानून का सहारा पुलिस और सरकार ने लिया। जिस का सीधा सीधा अर्थ था कि यदि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता तो वे कोई ऐसा संज्ञेय अपराध करते जिसे उन की गिरफ्तारी के बिना नहीं रोका जा सकता था। उन्हें फिर मजिस्ट्रेट के सामने लाया गया। ऐसा मजिस्ट्रेट जो सीधे सरकार का नौकर था, उस ने मान लिया कि यदि अन्ना को छोड़ दिया गया तो वे वे शांति भंग करेंगे या लोक प्रशान्ति को विक्षुब्ध करेंगे और अन्ना से शांति भंग न करने के लिए व्यक्तिगत बंध पत्र भरने पर रिहा किए जाने का हुक्म दिया। इस हुक्म को स्वीकार करने का कोई कारण नहीं था। लोक प्रशान्ति को तो सरकार खुद कब से पलीता लगा चुकी थी। कार्यपालक मजिस्ट्रेट यदि अपने विवेक और न्यायदृष्टि से काम लेता तो उसे पुलिस को आदेश देना चाहिए था कि अन्ना को गलत हिरासत में लिया गया है उन्हें तत्काल स्वतंत्र किया जाए। लेकिन कार्यपालक मजिस्ट्रेटों में इस दृष्टि का होना एक अवगुण माना जाने लगा है। अब तो यह स्थिति यह हो चली है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट तक इस स्तर पर अपनी न्यायदृष्टि का प्रयोग नहीं करते। 


लेकिन तब तक लोग सड़कों पर उमड़ने लगे थे। जिस डर से सरकार ने अन्ना और उन के साथियों को गिरफ्तार किया था। वही डर अब कई गुना हो कर सामने आ गया था। शाम तक सरकार को अहसास हो चला था कि वह गलतियों की अपनी श्रंखला में कुछ गलतियाँ और पिरो चुकी है। निवारक कार्रवाई (Preventive action) के जिस खोखले कानूनी तर्क को आधार बना कर ये गिरफ्तारियाँ दिल्ली पुलिस ने की थीं वह खोखला सिद्ध हुआ था। वह आग को रोकने के लिए जिस द्रव का उपयोग  उस ने पानी समझ कर किया था वह पेट्रोल निकला था। शाम को उन्हों ने अन्ना को बिना शर्त छोड़ने की घोषणा की। लेकिन तब तक बंदर की पूँछ अन्ना के हाथ आ चुकी थी और वे उसे छोड़ने को तैयार नहीं थे। अन्ना तो अनशन के लिए निकल चुके थे। सरकार ने इस के लिए उन्हें जेल में स्थान दिया। उन्हें स्थान मिले तो वे बाहर निकलें। उन्हें बाहर निकाला जाए तो कैसे बाहर मार्ग कहाँ था। वहाँ तो पहले ही कितने ही अन्ना ही जुट चुके थे। 


रात निकली, एक नया सूर्योदय हुआ, एक नया दिन आरंभ हो गया। जैसे जैसे सूरज चढ़ता गया लोग घरों से निकल कर सड़कों पर आते रहे। ऐसा लगने लगा जैसे सारी दिल्ली सड़कों पर उतर आई है। यह आलम केवल दिल्ली का नहीं था। सारा देश जाग उठा था। सरकार और संसद के व्यवसनी संसद के अधिकारों और गरिमा की दुहाई देते फिर रहे हैं। लेकिन अधिकार तो हमेशा कर्तव्यों के साथ जुड़े हैं। संसद के पास लोकपाल के लिए संसद अपना कर्तव्य निभाने से रोकने के लिए कोई सफाई नहीं है। सवाल खड़ा किया जा रहा है कि सिविल सोसायटी का नाम लेकर कुछ हजार लोगों को साथ लिए कोई आएगा और ससंद को कहेगा कि हम जैसा कहते हैं वैसा कानून बनाओ तो क्या संसद बना देगी? संसद को इस काम के लिए चार दशक जनता ने दिए। संसद स्लेट पर अक्षर तक नहीं बना सकी, वह सिर्फ आड़ी तिरछी लकीरें खींच कर मिटाती रही। अब बिगड़ैल बच्चे का हाथ पकड़ कर उस की माँ उसे सिखा रही है कि अनार वाला 'अ' ऐसे लिखा जाता है तो बिगड़ैल बच्चा कह रहा है। मैं 'अ' नहीं बनाता, मुझे तो लकीरें ही खींचनी हैं। आने वाले दिन बताएंगे कि बिगड़ैल बच्चा 'अ' अनार वाला लिखता है या नहीं? 


Monday, August 15, 2011

सूर्योदय से आरंभ होने वाला दिन बताएगा कि आगे क्या होने वाला है?

मैं सैडल डेम की पिकनिक के बारे में आप को बता रहा था। लेकिन वे बातें फिर कभी। आज मैं उन्हें रोक कर  कुछ अलग बात करना चाहता हूँ। आज भारत की अंग्रेजी राज से मुक्ति का दिवस था। हम इसे स्वतंत्रता दिवस कहते हैं। लेकिन स्वतंत्रता दिवस और आजादी शब्द बहुत अमूर्त हैं। इस जगत में कोई भी कभी भी परम स्वतंत्र या आजाद नहीं हो सकता। जगत का निर्माण करने वाले सूक्ष्म से सूक्ष्म कण से लेकर बड़े से बड़ा पिंड तक स्वतंत्र नहीं हो सकता। विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि भौतिक जगत में भी अनेक प्रकार के बल प्राकृतिक रूप से अस्तित्व में हैं कि परम स्वतंत्रता एक खामखयाली ही कही जा सकती है। इसलिए जब भी हम स्वतंत्रता और आजादी की बात करते हैं तो वह किसी न किसी विषय से संबंधित होती है। यहाँ हमारा आजादी का दिन या स्वतंत्रता दिवस जिसे भारत भर ने आज 15 अगस्त को मनाया उसे हमें सिर्फ ब्रिटिश राज्य की अधीनता से स्वतंत्र होने के सन्दर्भ में ही देखा जा सकता है। अन्य संदर्भों में उस का कोई अर्थ नहीं है। 

लेकिन जब भारत अंग्रेजी राज से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था तब संघर्षरत लोग केवल अंग्रेजी राज से ही मुक्ति की कामना से आपस में नहीं जुड़े थे। उन में सामन्ती शोषण से मुक्ति, पूंजीवाद के निर्मम शोषण से मुक्ति, जातिवाद के जंजाल से मुक्ति के साथ साथ अशिक्षा, गरीबी, बदहाली से मुक्ति की कामना करने वाले लोग भी शामिल थे। उस में वे लोग भी शामिल थे जो अपना सामन्ती ठाठ बचाए रखना चाहते थे और वे लोग भी शामिल थे जो पूंजी के बल पर देश में सर्वोच्च प्रभुत्व कायम करना चाहते थे। इन विभिन्न इरादों के बावजूद सब का तात्कालिक लक्ष्य अंग्रेजी राज से मुक्ति प्राप्त करना था। उन में अन्तर्विरोध होते हुए भी वे साथ चले। अलग अलग चले तब भी एक दूसरे को सहयोग करते हुए चले। अंततः देश ने अंग्रेजी राज से मुक्ति प्राप्त कर ली। अंग्रेजी राज से मिली इस आजादी के तुरंत बाद ही अलग अलग उद्देश्यों वाले लोग अलग होने लगे। इस आजादी का बड़ा हिस्सा फिर से देश की सामंती ताकतों और पूंजीपतियों ने हथिया लिया। शेष जनता को आजादी के बाद से अब तक मात्र उतना ही मिला जो उस ने आजाद देश की सरकार से लड़कर लिया।

किसानों को जमींदारी शोषण से मुक्ति के लिए लड़ना पड़ा। जमीन जोतने वाले की हो यह आज भी सपना ही है। मजदूरों ने जितने अधिकार हासिल किए सब लड़ कर हासिल किए। मजदूरों के हक में कानून बने लेकिन उन्हें लागू कराने के लिए आज तक मजदूरों को लड़ना पड़ रहा है। कोई पूंजीपति, यहाँ तक कि जनता की चुनी हुई संस्थाएँ और सरकारें तक उन कानूनों का पालन नहीं करती हैं। भारत की केन्द्र सरकार और प्रत्येक राज्य सरकार कानून के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी तय करती है लेकिन वह मजदूरों को केवल वहीं मिलती है जहाँ उस से कम मजदूरी पर मजदूर नहीं मिलता। शेष स्थानों पर मजदूर को न्यूनतम मजदूरी मांगने और सरकारी महकमे में शिकायत करने पर काम से हटा दिया जाता है। सरकारी महकमा उस मजदूर के हकों की रक्षा करने की न तो इच्छा रखता है और न ही उसे इतने अधिकार दिए गए हैं कि वह मजदूर को तुरंत या कुछ दिनों या महिनों में सुरक्षा प्रदान कर सके। कुल मिला कर कानून बने पड़े हैं। लेकिन उन्हीं कानूनों का पालना सरकार करवाती है जिन की पालना करने के लिए मजबूत लोग सामने आते हैं। आज भी इस देश में मजबूत लोग केवल भू-स्वामी, पूंजीपति, गुंडे, बाहुबली, संगठित अपराधी और उन की सेवा में नख से शिखा तक लिप्त राजनेता और अफसर ही हैं। सारे कानून उन्हीं के लिए बनते हैं। जो कानून मजदूरों और किसानों के नाम से बनते हैं उन की धार भी इन मजबूत लोगों के ही हक में ही चलती है। 
 
दाहरण के बतौर हम ठेकेदार मजदूरी उन्मूलन अधिनियम 1970 को देखें तो नाम से लगेगा कि यह ठेकेदार मजदूरी का उन्मूलन करने के लिए बनाया गया कानून है। लेकिन व्यवहार में देखें तो पता लगेगा कि यह कानून ठेकेदार मजदूरी की प्रथा को बचाने और उसे मजबूत बनाने का काम कर रहा है। अब तो इस की आड़ ले कर नियमित सरकारी कर्मचारियों से लिए जाने वाले काम इसी प्रथा के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी की दर पर ठेकेदार को दे कर करवाए जा रहे हैं। सरकारी काम पर लगे इन ठेकेदार मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी कभी नहीं मिलती। जितने मजदूर लगाने के लिए ठेका दिया जाता है उतने मजदूर काम पर लगाए भी नहीं जाते। यह सब चल रहा है। इसे चलाने वाली शक्ति का नाम भ्रष्टाचार है। इस भ्रष्टाचार में लिप्त वही मजबूत लोग हैं जिन का उल्लेख मैं ऊपर कर आया हूँ।

भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कानून बनाने की बात चल रही है। जनता की ओर से सिविल सोसायटी सामने आ कर खड़ी हुई तो जनता ने उस का समर्थन किया। बवाल बढ़ा तो सरकार समझ गई कि अब कानून बनाना पड़ेगा। सरकार ने हाँ कर दी। सिविल सोसायटी ने अपना विधेयक बताया तो सरकार अड़ गई कि ये नहीं हो सकता विधेयक बनाने का काम सरकार का है उसे कानून में तब्दील करने का काम संसद का है। आप सिर्फ सलाह दे सकते हैं। सिविल सोसायटी ने सरकारी विधेयक को देखा और कहा कि यह भ्रष्टाचार मिटाने का नहीं उसे और मजबूत करने और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले का मुहँ बन्द करने का काम करेगा। सिविल सोसायटी आंदोलन पर अड़ गई और सरकार उसे रोकने पर अड़ गई। आज का आजादी का दिवस इसी माहौल में मनाया गया। पहले राष्ट्रपति ने भ्रष्टाचार को कैंसर घोषित कर दिया, उन का आशय था कि वह ठीक न होने वाली बीमारी है। फिर सुबह प्रधानमंत्री बोले कि सरकार इस कैंसर से लड़ने को कटिबद्ध है। सिविल सोसायटी के नेता अन्ना हजारे अनशन पर अड़े हैं। सरकार उन की ताकत को तौलना चाह रही है। तरह तरह के भय दिखा रही है। ठीक वैसे ही जैसे रामकथा का रावण अशोक वाटिका में कैद कर के सीता को दिखाया करता था। लेकिन सीता तिनके की सहायता लेकर उस भय का मुकाबला करती रही जब तक कि राम ने रावण को परास्त नहीं कर दिया। 

रकार के दिखाए सभी भय आज शाम उस वक्त ढह गए जब अन्ना अपने दो साथियों के सामने अचानक राजघाट पर बापू की समाधि के सामने जा कर बैठ गए। तब सामन्य रुप से राजघाट पहुँचने वाले लगभग सौ लोग वहाँ थे। जब खबर मीडिया के माध्यम से फैली तो लोग वहाँ पहुँचने लगे। ढाई घंटे बाद जब अन्ना वहाँ से उठे तो दस हजार से अधिक लोग वहाँ जमा थे। तिनका इतना मजबूत और भय नाशक हो सकता है इस का अनुमान शायद सरकार को नहीं रहा होगा। अन्ना घोषणा कर चुके है कि सुबह अनशन होगा। वैसे भी अनशन को स्थान की कहाँ दरकार है? वह तो मन से होता है, और कहीं भी हो सकता है। अन्ना जानते हैं कि भ्रष्टाचार तभी समाप्त हो सकता है जब वह सारी व्यवस्था बदले,  जिस के लिए भ्रष्टाचार का जीवित रहना आवश्यक है। उन्हों ने आज शाम के संबोधन में उस का फिर उल्लेख किया है और पहले भी करते रहे हैं। व्यवस्था परिवर्तन क्रांति के माध्यम से होता है और क्रान्तियाँ जनता करती है,  नेता, संगठन या फिर राजनैतिक दल नहीं करते। वे सिर्फ क्रान्तियों की बातें करते हैं। जब जनता क्रान्ति पर उतारू होती है तो वह अपना नेता भी चुन लेती है, संगठन भी बना लेती है और अपना राजनैतिक दल भी। जनता क्रान्ति तब करेगी जब उसे करनी होगी। लेकिन क्या तब तक सुधि लोग चुप बैठे रहें। वे जनता की तात्कालिक मांगों के लिए लड़ते हैं। तात्कालिक मांगों के लिए जनता की ये लड़ाइयाँ ही जनता को क्रान्ति के पथ पर आगे बढ़ाती है। 
 
रकार समझती है कि उन का बनाया लोकपाल कानून तात्कालिक जरूरतों को पूरा कर सकता है। सिविल सोसायटी की समझ है कि भ्रष्टाचार इस से रुकने के स्थान पर और बढ़ेगा और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठती आवाजों के गले में पट्टा बांध दिया जाएगा। सरकार कानून बनाने के मार्ग पर बढ़ रही है। लेकिन सिविल सोसायटी अपनी समझ जनता के सामने रख रही है कि केवल वैसा कानून भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाब हो सकता है जैसा उस ने प्रस्तावित किया है। सिविल सोसायटी के पास जनता के सामने अपना विचार रखने का जो तरीका हो सकता है वही वह अपना रही है, सरकार अपना तरीका अपना रही है। ये जनता को तय करना है कि वह किस के साथ जाती है। अभी तो लग रहा है कि जनता सिविल सोसायटी के साथ खड़ी हो रही है। अन्ना के अनशन को आरंभ होने में अभी देरी है। लेकिन जनता पहले ही उस जगह पहुँच गई है जहाँ अनशन होना था और दिल्ली सरकार ने गिरफ्तारियाँ आरंभ कर दी हैं। इस रात के बाद होने वाले सूर्योदय से आरंभ होने वाला दिन बताएगा कि आगे क्या होने वाला है?
 

Sunday, August 14, 2011

सैडल डेम और पाड़ाझर झरना

कोटा से रावतभाटा जाते समय आधी दूरी तक चढ़ाई है जो बोराबास पहुँच कर चढ़ाई समाप्त हो जाती है। यह गूजरों का गाँव है। चारों और निगाह दौड़ाएंगे तो गायों और भैंसों के बाड़े दिखाई देंगे और बीच बीच में घर दिखाई देंगे। कोटा को मिलने वाले दूध में से लगभग एक चौथाई बोराबास और आस पास के गाँवों से ही जाता है।  यहीं से पश्चिम की ओर एक मार्ग जाता है जो लगभग पाँच किलोमीटर चलने पर कोटा डेम अर्थात् जवाहर सागर बांध पहुँचा देता है। बोराबास से निकलते ही  लंबी घाटी आरंभ हो जाती है जो कोलीपुरा गाँव में जा कर समाप्त होती है। यह सुरम्य घाटी 'दरा वन्यजीव अभयारण्य का एक भाग है।'  पूरी घाटी में हरियाली छाई हुई थी। स्थान स्थान पर जलधाराएँ बह रही थीं। पिछले वर्षों में इतनी हरियाली पहली बार दिखाई दे रही थी। देती भी क्यों न, कई वर्षों बाद इस क्षेत्र में होने वाली औसत बरसात तो जुलाई के तीसरे सप्ताह तक हो चुकी थी। अब जो भी बरसात हो रही थी वह सब बोनस थी। बरसात भी इस कायदे से हुई कि उस से नुकसान कम हुआ। बाढ़ें नहीं आई थीं। घाटी से निकलने के बाद ही बायीं ओर चम्बल दिखाई देने लगी। जवाहर सागर बांध के कारण यहाँ चम्बल विस्तार पा गई है। विशाल जलराशि और उस के दोनों ओर जंगल अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रहे थे। मनोरम दृश्यों को निहारते हुए बस रावतभाटा के नजदीक पहुँच रही थी। सड़क के किनारे ही बायीं और बाडोली के प्राचीन शिव मंदिर दिखाई दिए।  मन किया यहीं उतर पड़ूँ। यदि मैं अपने वाहन में होता तो मुझे कम से कम आधा घंटा यहाँ अवश्य लगता। जिन हाथों ने इन मंदिरों के निर्माण के लिए पत्थरों को आकार दिया होगा वे अपनी कला में कितने निपुण होंगे, यह अनुमान करके ही आनन्द की अनुभूति होती है। 

बाडोली के शिव मंदिर
रावतभाटा कस्बे से गुजरते हुए चंबल पुल पार कर के बस ने भैंसरोड़गढ़ वन्यजीव अभयारण्य में प्रवेश किया। इस क्षेत्र को राज्य सरकार ने इसी वर्ष अभयारण्य घोषित किया है। जिस के कारण प्रवेश शुल्क के बिना यहाँ प्रवेश संभव नहीं रह गया है। वन-चौकी पर बसें कुछ देर रुकीं। फिर चढ़ाई आरंभ हो गई। कोई दस मिनट में ही हम सेडल डेम के गेस्ट हाउस के बाहर थे। बरसात जारी थी। हम बसों से उतर कर तेजी से गेस्ट हाउस की तरफ दौड़े, जिस से कम से कम भीगे। मैं बरांडे की ओर से गेस्ट हाउस में घुसा। टीन शेड के नीचे हलवाई खाद्य सामग्री निर्माण में जुटे थे। बहुत सी जलेबियाँ निकाली जा चुकी थीं, पकौड़ियाँ तली जा रही थीं और आलू के मसाले के गोले बेसन के घोल में डूब कर गर्म तेल की कढ़ाई में जाने को तैयार थे। हमें पहुँचते देख। हलवाई ने कोफ्ते बनाने का काम आरंभ कर दिया। बारह बज चुके थे। सभी को भूख लगी थी। भोजन सामग्री बनते देख और खिल गई थी। दस मिनट में तीनों खाद्य पदार्थ चटनियों  और सॉस की बोतलों के साथ हॉल की मेज पर थे। इस के बाद क्या हुआ होगा? यह आप कल्पना कर सकते हैं। मैं प्लेट में नाश्ता ले कर बाहर आ गया। गेस्ट हाउस के बाहर के गार्डन के कोने पर तख्ती लगी थी, जिस पर लिखा था "फूल तोड़ना मना है"। लेकिन वहाँ फूल एक भी नहीं था। पूरे गार्डन में एक भी फूल खिला नहीं था। पहले सोचा मौसम ही फूल खिलने का नहीं है। लेकिन फिर ठीक से देखा तो पता लगा कि गेस्ट हाउस का रख रखाव भी कमजोर हुआ है। मैं समझ गया कि यह सब पिछले कई वर्षों से राजस्थान सरकारों में विभागों द्वारा मस्टर रोल पर कर्मचारी न रखने की जो नीति बनाई गई है यह उस का परिणाम है। अब विभागों के पास इन के रख रखाव के लिए कर्मचारी ही नहीं हैं तो फूल कहाँ से खिलेंगे? मैं ने फिर से तख्ती को देखा तो तख्ती के ठीक आस-पास बहुत ही छोटे आकार के तीन-चार जंगली फूल खिले थे। जैसे कह रहे हों कि हम तख्ती के ठीक पास इसलिए खिले हैं कि कम से कम यहाँ तो सुरक्षित रहेंगे।

 नाश्ते के दौरान ही दिनेश रावल ने नयी उम्र के वकीलों को उकसाना आरंभ कर दिया था। यार! पाड़ाझर नहीं चलेंगे क्या? कोटा तो कह रहे थे कि बसें पाड़ाझर जाएंगी, अब कोई बात ही नहीं कर रहा है। बरसात बंद हो चुकी थी और मैं सैड़ल डेम के ऊपर बनी सड़क से बांध के पानी, आस पास की पहाडियों पर बिखरे प्रकृति के सौंदर्य का नजारा देखने के लिए निकल पड़ा था। आधे घंटे बाद वापस लौटा तो बरामदे में ही रावल मिल गए। कहने लगे -तुम कहाँ चले गए थे उस्ताद? बसें पाड़ाझर जाने वाली हैं, चलो बैठो। मैं ने उन्हें बताया कि मैं जरा डेम पर चला गया था। वे कहने लगे -इस बीच बसें चल देतीं तो तुम यहीं रह जाते। हम गेस्ट हाउस के बाहर निकले तो वहाँ सेक्रेट्री सब से कह रहे थे -पाड़ाझर जाने वाले बसों में बैठ जाएँ। लोग तेजी से बसों की ओर जाने लगे। बसों तक जाने का दूसरा मार्ग भी था जो खाली था। मैं उस ओर से गया और सब से पीछे खड़ी बस में बैठ गया। मुझे कुछ लोगों ने कहा -बस तो आगे वाली जा रही है, सब तो उस में बैठ रहे हैं। मैं ने मना किया कि जाएगी तो सब से पहले यही बस जाएगी। मैं अकेला बस में चढ़ गया। कुछ देर बाद ही शेष लोग भी उसी बस में चढ़ने लगे। जब बस भर गई तो एक नया वकील कहने लगा कि -आप ने सही कहा था यही बस पहले जा रही है। दूसरा कहने लगा ये तो अनुभव की बात है।  मैं ने कहा यह अनुभव की नहीं अक्ल की बात है। तुम बसों की स्थिति ठीक से देखते तो तुम्हें भी पता लग जाता कि जब तक यह बस अपने स्थान से हटेगी नहीं दूसरी बस निकलेगी नहीं। ऐसी स्थिति में इसी बस को सब से पहले जाना था। ड्राइवर ने बस को आगे पीछे कर के बस का मुहँ घुमाया और बस पाड़ाझर के लिए चल दी।
प सभी यह सोच रहे होंगे कि यह पाड़ाझर क्या है? सैडल डेम से कोई छह किलोमीटर दूर जंगल के बीच एक झरना है, जो लगभग वर्ष भर बहता है लेकिन बरसात में तो उस का नजारा कुछ और ही होता है। कोई सौ मीटर ऊपर से झरना गिरता है, नीचे झरने के गिरने से कुंड बन गया है। झरने के ऊपर पहुँच कर नीचे कुंड तक जाने के लिए सीढ़ियाँ हैं। बीच में एक गुफा भी है जहाँ शंकर का मंदिर बना हुआ है। तैरने वाले लोग नीचे कुंड में उतर जाते हैं और तैरते हुए झरने के नीचे जा कर झरने से गिरते पानी के नीचे स्नान का आनन्द लेते हैं। सैडल डेम से पाड़ाझर तक की सड़क की हालत बहुत बुरी थी। कहा जा सकता था कि कभी वहाँ डामर भी रहा होगा। अब तो डामर के अलावा वहाँ सब कुछ था जिस में गड्ढे भी थे। बस को छह किलोमीटर की दूरी पार करने में आधा घंटा लगा। आप समझ सकते हैं कि सड़क की हालत क्या रही होगी? बस झरने से आधा किलोमीटर दूर ही रुक गई। आगे बस के जाने का मार्ग नहीं था। वहाँ से हमें पैदल चल पड़े। ठीक झरने के ऊपर पहुँचे तो देखा वहाँ दो बसें और खड़ी थीं। वे किसी दूसरे मार्ग से आई थीं। पहली बार पता लगा कि झरने पर पहुँचने का दूसरा मार्ग भी है।
(जारी)

जीन ऊँट की सवारी में सहायक है
पिछली चिट्ठी पर चंदन कुमार मिश्र की टिप्पणी थी कि सैडल के लिंक से संबंध समझ नहीं आया। मैं समझता था कि कुछ लोगों को यह जिज्ञासा अवश्य होगी कि ये सैडल डेम क्या है और उसे समझने के लिए मैं ने वह लिंक दिया था। वास्तव में सैडल घोड़े, ऊँट आदि पर सवारी करने के लिए उस पर कसी जाने वाली जीन को कहते हैं। इस जीन के अभाव में इन पर ठीक से सवारी की जा सकती है, विशेष रूप से ऊँट पर। उसी तरह यदि किसी बांध की भराव क्षमता अधिक रखने पर किसी स्थान से पानी के निकल जाने की संभावना हो तो वहाँ जो बांध बनाया जाता है उस के बिना मुख्य बांध की क्षमता को बढ़ाया नहीं जा सकता। इस सहायक बांध से मूल बांध की भराव क्षमता बढ़ जाती है। क्षमता में सहायक होने के इस गुण की समानता के कारण ऐसे सहायक बांधों को सैडल डेम कहा जाता है।

पिकनिक पर

र्षा ऋतु में अभिभाषक परिषद, कोटा अपने सदस्यों के लिए एक पिकनिक का आयोजन करती है। अपने सहकर्मी अभिभाषकों के साथ अदालत परिसर के अलावा किसी मनोरम स्थान पर एक दिन बिताना अपने आप में अच्छा सुअवसर है। विगत चार-पाँच वर्षों से मैं इस अवसर से वंचित रहा। इस बार जुलाई के अंतिम सप्ताह में जब यह घोषणा की गई कि 7 अगस्त को अभिभाषक परिषद सैडल डेम पर पिकनिक आयोजित कर रही है तो मैं ने उसी समय तय कर लिया कि कितनी भी बाधाएँ क्यों न हों इस पिकनिक को मैं नहीं छोड़ूंगा। मेरा प्रयास यह भी था कि मेरे सभी सहयोगी भी इस में भाग लें। लेकिन यह संभव नहीं हो सका। उन में से कोई भी विभिन्न कारणों से जाने की स्थिति में नहीं था।

राणाप्रताप सागर बांध
सैडल डेम चित्तौड़ जिले में रावतभाटा में चम्बल नदी पर निर्मित राणाप्रताप सागर बांध का सहयोगी बांध है। राणाप्रताप सागर बांध के निर्माण से चम्बल का जल जिस ऊँचाई तक संग्रहीत किया जाना था उस ऊँचाई तक जल संग्रहण असंभव था। क्यों कि मूल बांध से कोई एक किलोमीटर दूर पहाड़ों के बीच एक दर्रा मौजूद था जिस से जल निकल कर दूसरा रास्ता पकड़ कर वापस चंबल में जा मिलता। इस दर्रे पर भी जल को रोकने के लिए एक बांध बनाया जाना आवश्यक था। दर्रा अधिक चौड़ा न था, इसलिए उस पर भी बांध बनाया गया जिस का एक मात्र उद्देश्य राणाप्रताप सागर बांध की ऊँचाई बढ़ाना था। आम तौर पर जहाँ मूल बांध बनाया जाता है वह कोई मनोरम स्थान नहीं होता और जिस तरह का भारी निर्माण कार्य वहाँ होता है उस से उस की मनोरम छवि और समाप्त हो जाती है। बांध के ऊपर के बहुत से मनोरम स्थान तो रोके गए पानी में हमेशा के लिए डूब जाते हैं। लेकिन यह सैडल डेम जहाँ बना है वहाँ दोनों ओर हरी भरी पहाड़ियाँ मौजूद हैं तो  नीचे घाटी है। बीच में बांध की झील  में भरा हुआ जल। इसी बांध के निकट राजस्थान सरकार के सिंचाई विभाग ने एक गेस्टहाउस बनाया हुआ है। पिकनिक के लिए यह एक आदर्श स्थल है। यदि वर्षा होती रहे तब भी चार-पाँच सौ व्यक्तियों का भोजन बनाया जा सकता है और खिलाया जा सकता है। 

सैडल डेम
भिभाषक परिषद के सदस्यों की संख्या 1700 से अधिक है, लेकिन नियमित रूप से न्यायालय में अभ्यासरत वकीलों की संख्या इस की आधी ही है। लेकिन पिकनिक पर जाने वालों की संख्या दो सौ से कुछ ही ऊपर थी। इस के लिए तीन बसों की व्यवस्था की गई थी। तीनों बसों को जिला न्यायालय परिसर से रवाना हो कर नगर में चार-पाँच स्थानों पर रुक कर अभिभाषकों को लेते हुए जाना था। सुबह दस बजे तक बसों को कोटा नगर छोड़ देना था। शेष लोग वे थे जो अपने अपने साधनों से पिकनिक स्थल पहुँचना था। जहाँ से मुझे बैठना था वहाँ से बस को दस बजे रवाना होना था। लेकिन सुबह सुबह ही बरसात आरंभ हो गई। इस कारण बसें रवाना होने में देरी हुई। रावतभाटा के नाम से मुझे दो नाम ध्यान आए, उन में एक रविकुमार हैं। मैं ने बस की प्रतीक्षा करते हुए उन्हें फोन किया कि मैं आज उन के क्षेत्र में रहूँगा। यदि मिलना संभव हुआ तो उन्हें फिर फोन करूंगा।

दिनेश रावल
सुबह ग्यारह बजे बसें कोटा से छूट गई थीं। कोटा नगरीय क्षेत्र से निकलते ही जंगल आरंभ हो गया। दोनों ओर देखने पर हरियाली ही हरियाली दिखाई पड़ती थी। जिस के बीच बीच में वर्षा के कारण जंगल से निकल कर आती हुई जल धाराएँ दिखाई पडती थी। ऐसा लगता था जैसे जंगल ने नवयौवना का रूप धारण कर वर्षा के जल में स्नान कर रहा हो। वर्षा स्नान के समय बूंद बूंद मिल कर जलधाराओं का निर्माण कर रही हों। बस की खिड़की से बाहर एक बार जो देख लेता,  उस की निगाहें वहीं ठहरी रह जातीं, बस की गति के साथ ही वन प्रान्तर का दृश्य लगातार परिवर्तित होता हुआ नए नए रूप दिखा रहा था। मेरे पास खिड़की के समीप बैठे सहयात्री अभिभाषक दिनेश रावल इन दृश्यों में इतने डूब गए कि मैं ने  उन की तस्वीर ले कर उन्हें दिखाई तो कहने लगे, इस में तो मैं कोई विचारक जैसा लग रहा हूँ। 

Saturday, August 13, 2011

रक्षा संकल्प का त्यौहार

सूर्योदय के साथ ही श्रावण मास की पूर्णमासी का दिन आरंभ हो लेगा। यही वह माह है जिस में भारत के लगभग सभी प्रांतों में मानसून की वर्षा का जोर रहता है। इस मास में धरा जल से परिपूर्ण हो जाती है। सारे जलाशयों से जल छलक कर बहने लगता है, नदियाँ वेगवती हो जाती हैं, झरने पूरे यौवन पर होते हैं, संपूर्ण वन प्रान्तर हरियाली से ढक जाता है। यह मास भारतवर्ष के लोगों के मन इतनी प्रसन्नताओं से भर देता है कि वे भी जल से परिपूर्ण तालाबों की तरह छलकने लगते हैं। श्रावण मास के अंतिम दिन भारत रक्षा बंधन मना रहा होता है। बहनें अपने अपने भाइयों को रक्षासूत्र बांधने के लिए चल पड़ती हैं। वहीं गुरू-शिष्य एक दूसरे को रक्षासूत्र बांध कर परस्पर एक दूसरे की रक्षा का भार अपने ऊपर लेते हैं। पुरोहित अपने यजमानों को रक्षासूत्र बांधते हैं। मित्र आपस में रक्षा सूत्र बांधते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि इस त्यौहार की कोई सीमा नहीं है। 

भारतीय जीवन पद्धति (कुछ लोग इसे हिन्दू जीवन पद्धति कहना चाहेंगे, लेकिन यह शब्द भारतवासियों के लिए परदेसियों ने ईजाद किया था, इसलिए,  मैं भारतीय कहना अधिक उचित समझता हूँ) में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिन का वस्तुतः धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन हर धर्मावलम्बी अपनी आदत के अनुसार अपनी हर चीज को धर्म से जोड़ कर देखना चाहता है और इसी प्रवृत्ति के चलते बहुत सी चीजों को धर्म से जोड़ देता है। इसी संकीर्णता के चलते वे चीजों की सीमाएँ बन जाती हैं।  ऐसा ही कुछ रक्षाबंधन के साथ भी हुआ है। मनुष्य जाति का यह अनुपम त्यौहार हिन्दुओँ का घोषित किया जा कर उस की सीमाएँ बांध दी गई हैं।  और उन्हें सीमित कर देता है।

म अपने मिथक और इतिहास में जाएँ तो रक्षाबंधन के बारे में हमें बहुत कथाएँ मिलती हैं। सब से प्राचीन कथा भविष्य पुराण में मिलती है जिस के अनुसार देवासुर संग्राम में जब असुरों का पक्ष भारी पड़ने लगा तो इंद्र बृहस्पति के पास गए। वहाँ बैठी इंद्र की पत्नी ने एक धागा इंद्र की कलाई पर बांधा। उस धागे ने इंद्र और देवों में वह आत्मविश्वास उत्पन्न किया कि वे असुरों पर विजय प्राप्त कर सके। इस कथा में एक पत्नी द्वारा अपने पति को रक्षा सूत्र बांधने का विवरण मिलता है। दूसरा विवरण अधिकांश पुराणों में वामनावतार के रूप में मिलता है जिस में बलि से तीन पग भूमि दान में प्राप्त कर वामन रूपी विष्णु तीनों लोक नाप डालते हैं और बलि को रसातल में भेज देते हैं। लेकिन बलि विष्णु से सदैव अपने सामने रहने का वचन ले लेता है। विष्णु जब देवलोक वापस नहीं लौटते तो विष्णु पत्नी लक्ष्मी बलि को रक्षा सूत्र बांधती है और बदले में विष्णु को मुक्त करवा कर वापस देवलोक ले आती है। इन दोनों ही कथा प्रसंगों का किसी विशिष्ठ धर्म से कोई संबंध नहीं है। अपितु दोनों ही प्रसंगों में रक्षा सूत्र बांधा जाना मनुष्यों के बीच एक दूसरे की रक्षा करने के संकल्प के रूप में सामने आता है। 

गे हम इतिहास में पाते हैं कि संकल्प के इस मानवीय रिश्ते को बहुत लोगों ने निभाया। राजपूत जब युद्ध में जाते थे तो महिलाएँ उन के माथे पर तिलक कर के हाथ में रक्षा सूत्र बांधती थीं जो उन्हें याद दिलाता था कि वे युद्ध भूमि से पीछे छूट गई स्त्री, बालक, वृद्धों की रक्षा के लिए युद्ध के मैदान में हैं। यह भाव ही राजपूत योद्धाओं में अद्भुत वीरता उत्पन्न कर देता था। बहादुरशाह द्वारा आक्रमण कर देने पर अपनी रक्षा करने में असमर्थ मेवाड़ की रानी कर्मावती ने रक्षा के लिए मुगल बादशाह हुमायूँ को रक्षासूत्र भेजा। इस रक्षा सूत्र का मान रखने के लिए हुमायूँ ने आ कर बहादुरशाह के साथ युद्ध कर के मेवाड़ की रक्षा की। सिकंदर महान की पत्नी ने राजा पुरुवास को रक्षा सूत्र बांध कर अपना भाई बनाया और युद्ध में अपने पति की जीवन रक्षा की मांग की। पुरुवास ने अवसर आने पर सिकंदर की जान बख्श दी। लेकिन बाद में युद्ध बंदी बना लिए जाने पर जब सिकंदर ने पुरुवास से पूछा कि उस के साथ अब कैसा व्यवहार किया जाए तो पुरुवास ने कहा कि वैसा ही जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है। सिकन्दर ने पुरुवास के साथ वैसा ही व्यवहार किया। इसी तरह महाभारत युद्ध के पूर्व कृष्ण द्वारा पाण्डवों को रक्षाबंधन का पर्व मनाने की सलाह देना, कृष्ण की उंगली घायल होने पर द्रोपदी द्वारा उन्हें अपनी ओढ़नी फाड़ कर उस से घाव को बांधना, बदले में कृष्ण द्वारा द्रोपदी की लज्जा बचाने के प्रसंग भी हैं। इन में से कोई भी प्रसंग किसी धार्मिक परंपरा को नहीं दर्शाता अपितु मानवीय संबंधों में संकल्प के महत्व को प्रदर्शित करता है। इसलिए हमें इस त्यौहार को धर्म की परिधि से बाहर निकाल कर परस्पर रक्षा-संकल्प के त्यौहार के रूप में ही मनाना चाहिए। 

ज समीक्षा ब्लाग पर अनामिका जी ने यह प्रश्न उठाया था कि क्या ये त्यौहार केवल हिन्दू भाई बहन के लिए ही है?  मेरा उन्हें उत्तर यह है कि यह संपूर्ण मानव जाति का त्यौहार है। हर कोई इस त्यौहार को मना सकता है, बशर्ते कि इसे मनाने वाले परस्पर रक्षा के संकल्प को आजीवन निभाने को तैयार हों। इस त्यौहार में कोई धार्मिक कर्मकांड भी नहीं है। बस एक धागा ही तो संकल्प के बतौर अपने प्रिय की कलाई पर बांधना है। इस संकल्प को यादगार बनाने के लिए कुछ करना चाहता है तो जो भी इसे मनाए अपनी रीति से यादगार बना सकता है। मेरी तो इच्छा है कि इस त्यौहार को विश्वव्यापी हो जाना चाहिए।

Wednesday, August 10, 2011

शव उठाना भारी पड़ रहा है

र महिने कम से कम एक दर्जन निमंत्रण पत्र मिल जाते हैं। इन में कुछ ऐसे समारोहों के अवश्य होते हैं जिस में किसी न किसी का सम्मान किया जा रहा होता है। जब ऐसे निमंत्रण पढ़ता हूँ तो दिल बहुत उदास हो जाता है। कहीं कोई कविताबाजी के लिए सम्मानित हो रहा होता है तो कोई साहित्य में बहुमूल्य योगदान कर रहा होता है। किसी को इसीलिए सम्मान मिलता है कि उस ने बहुत से सामाजिक काम किए होते हैं।  किसी के बारे में तो सम्मान समारोह से ही पता लगता है कि वह कविताबाजी भी करता है या उस ने साहित्य में कोई योगदान भी किया है या फिर वह सामाजिक कार्यकर्ता है। किसी किसी के तो नाम की जानकारी ही पहली बार निमंत्रण पत्र से मिलती है।  तब मैं निमंत्रण पत्र देने वाले से कहता हूँ कि भाई जिस का सम्मान होना है उस के बारे में तो बताते जाओ, मैं तो उसे जानता ही नहीं हूँ। जब सम्मानित होने वाले का नाम और उस के किए कामों की जानकारी मिलती है तो मन बहुत उदास हो जाता है।

विता के लिए किए जा रहे एक व्यक्ति के सम्मान समारोह में पहुँचा तो देखा कि जिस व्यक्ति का सम्मान किया जा रहा है उसे तो मैं बहुत पहले से जानता हूँ। वह कलेक्ट्री में बाबू है और किसी का काम बिना कुछ लिए दिए नहीं करता। एक दो बार उस से पाला भी पड़ा तो अपनी लेने-देने की आदत के कारण उस की उस के अफसर से शिकायत करनी पड़ी। अफसर ने उसे मेरे सामने बुला कर झाड़ भी पिलाई कि तुम आदमी को देखते तक नहीं। आइंदा किसी से ऐसी शिकायत मिली तो तुम्हारी नौकरी सुरक्षित नहीं रहेगी। उस झाड़ के बाद  बाबू के व्यवहार में मेरे प्रति तो बदलाव आ गया, लेकिन बाकी सब के साथ पहले जैसा ही व्यवहार करता रहा। शायद वह मुझे पहचानने लगा था। उस का कभी कुछ नहीं बिगड़ा। अफसर आते और चले जाते, लेकिन बाबू वहीं प्रमोशन पा कर उसी तरह काम करता रहा। आज अ...ज्ञ साहित्य समिति उस का सम्मान कर रही है। यह जान कर मुझे आश्चर्य हुआ कि वह बाबू कविता भी करता है वह भी ऐसी करता है कि उस का सम्मान किया जाए। 

खैर, बाबू ने मुझे देखा तो सकुचाया, फिर नमस्ते किया। औपचारिकतावश मैं ने भी नमस्ते किया। पर मेरे न चाहते हुए भी और रोकते रोकते भी बरबस ही मेरे होठों पर मुस्कुराहट नाच उठी। उस के चेहरा अचानक पीला हो गया। शायद उसे लगा हो कि मैं उस पर व्यंग्य कर रहा हूँ। मैं ने उस के नजदीक जा कर पूछा -तुम कविता भी करते हो, यह आज पता लगा। उसने और पीला होते हुए जवाब दिया -कविता कहाँ? साहब, कुछ यूँ ही तुकबाजी कर लेता हूँ। मैं हॉल में पीछे की कुर्सी पर जा कर बैठा। समारोह आरंभ हुआ। सरस्वती की तस्वीर को माला पहनाई गई, दीप जलाया गया। फिर सरस्वती वंदना हुई। स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियाँ थीं, साथ में तबला और हारमोनियम वाला भी था। शायद किसी स्कूल से बुलाया गया हो। मैं ने एक से पूछा तो पता लगा कि यह हारमोनियम वाले का आयोजन था। वह पाँच सौ में इस का इंतजाम किसी भी समारोह के लिए कर देता है। समारोह आगे बढ़ा। बाबू जी की तारीफ में कसीदे पढ़े जाने लगे। उन के दो प्रकाशित संग्रहों की चर्चा हुई। फिर बाबूजी बोलने लगे, उन की स्वरों में बहुत विनम्रता थी, वैसी जैसी लज्जा की अनुभूति होने पर किसी नववधु को होती है। उन्हों ने चार कथित काव्य रचनाएँ भी पढ़ीं। मुझे उन्हें कविता समझने में बहुत लज्जा का अनुभव हुआ।  समारोह समाप्त हुआ तो सभी को कहा गया कि बिना जलपान के न जाएँ। पास के हॉल में जलपान की व्यवस्था थी। जलपान क्या? पूरा भोजन ही था। छोले-भटूरे, गुलाब जामुन, समौसे और कचौड़ियाँ। मैं पिछले पाँच सालों में जितने सम्मान समारोहों में गया था, उन सब में जलपान के लिहाज से यह समारोह सब से जबर्दस्त था।

मेरे जैसे ही एक और मित्र थे वहाँ। मैं उन से चर्चा करने लगा। यार! सम्मान समारोह खूब जबर्दस्त हुआ। कहने लगे पूरे पच्चीस हजार खर्च किए हैं अगले ने जबर्दस्त क्यों न होता। मैं ने पूछा -अगला कौन? तो उस ने बताया कि अगला तो बाबू ही है। फिर भी मुझे पच्चीस हजार अधिक लग रहे थे। मैं ने मित्र से जिक्र किया तो कहने लगा ... खर्च तो बीस भी न हुए होंगे। आखिर पाँच तो सम्मान करने वाली संस्था भी बचाएगी, वर्ना कैसे चल पाएगी। ... तो पैसे पा कर यह संस्था किसी का भी सम्मान कर देती है क्या? .... और नहीं तो क्या?  ... आप अपना करवाना चाहो तो दस हजार में इस से बढ़िया कर देगी। मुझे उस की बात जँची नहीं। मैं ने पूछ ही लिया -वह कैसे? ... यार! संस्था साल में पाँच बाबुओं का सम्मान करेगी, तो दो आप जैसों का कम खर्चे में भी करना पड़ेगा, आखिर संस्था को अपनी साख और इज्जत भी तो बचानी पड़ती है। मेरे पास मित्र की इस बात का कोई उत्तर नहीं था। मैं ने अगला प्रश्न किया -यार! इस की किताब किसने छापी? उत्तर था - कौन छापेगा? चित्रा प्रकाशन ने छापी है। मेरे लिए स्तंभित होने का फिर अवसर था। मैं हुआ भी और हो कर पूछा भी -ये चित्रा प्रकाशन कहाँ का है? कौन मालिक है इस का? ... यार! तुम बिलकुल बुद्धू हो। चित्रा बाबू की बीबी का नाम है और इस प्रकाशन ने अब तक दो ही किताबें छापी हैं और दोनों बाबू की हैं। 

स समारोह के पहले मैं सोचता था कि कभी तो किसी को सुध आएगी, अपना भी सम्मान होगा। इस समारोह के बाद से मैं सम्मान समारोहों में बहुत सोच समझ कर जाने लगा हूँ। अपनी खुद की तो सम्मान की इच्छा ही मर गई है। इच्छा का शव उठाना भारी पड़ रहा है। सोचता हूँ कि कल सुबह जल्दी जा कर बच्चों के शमशान में दफना आऊँ।