Wednesday, September 30, 2009

कौन सी काँग्रेस और कौन सी भाजपा?


कल जब अदालत पहुँचने को ही था तो सरकिट हाउस के कोर्नर पर ही पुलिस वाला वाहनों को डायवर्ट करता नजर आया।  आगे भीड़ जमा थी। मैं भीड़ तक पहुँचा तो वहाँ अदालत परिसर में प्रवेश करने वाला गेट बंद था। बाहर वकीलों और जनता का जमाव था। मैं अपनी कार को वहीं घुमा कर, एक चक्कर लगा कर दूसरे गेट तक पहुँचा। वहाँ भी वही आलम था। गेट बंद था, उस पर संघर्ष समिति का बैनर टंगा था और फिर शामियाने के नीचे दरियाँ बिछा कर वकील और हाईकोर्ट बैंच खोले जाने वाले आंदोलन के समर्थक बैठे थे। दोनों गेटों के बीच सड़क पर लोग फैले हुए थे। एक चकरी वाला गेट चालू था उस के सामने नौजवान वकीलों का जमावड़ा था वे किसी वकील, मुंशी और टाइपिस्ट को अंदर परिसर में न जाने दे रहे थे। हाँ न्यायार्थी जरूर अंदर आ जा रहे थे। मैं ने अंदर झाँक कर देखा तो वहाँ सन्नाटा पसरा था। जो लोग अंदर जा रहे थे मिनटों में वापस आ रहे थे। कोई कहता अदालत में न जज है और न रीडर, कोई कहता रीडर ने कार्यसूची पर सब मुकदमों की तारीखें दे रखी हैं। आज अखबारों ने भी खबरें छापी है और चित्र भी।

वकील, मुंशी, टाइपिस्ट सभी सड़कों पर डोल रहे थे या फिर धऱने पर बैठे थे। धरने पर लगातार वकीलों में से कोई या फिर राजनैतिक दलों, या संस्थाओं के प्रतिनिधि लाउडस्पीकर पर आंदोलन के समर्थन में बोले जा रहे थे। तभी काँग्रेस के प्रान्तीय प्रवक्ता माइक पर आए और कोटा में हाईकोर्ट की बैंच स्थापित किए जाने के समर्थन में जोरदार भाषण दिया। कहा कि मांग जायज है, काँग्रेस इस आंदोलन के साथ है।  मेरा सिर चकरा गया कौन सी काँग्रेस इस आंदोलन के साथ है वह जिस के वे प्रवक्ता हैं? या फिर वह जिस की राज्य सरकार है,? या फिर वह जो केन्द्र सरकार का नेतृत्व करती है?

कुछ दिन पहले यहीँ, इसी आंदोलन के धरने पर भाजपा के प्रतिनिधि बैठे नारे लगा रहे थे और भाषण देते हुए आंदोलन का पुरजोर समर्थन कर रहे थे और हाईकोर्ट बैंच न खोले जाने के लिए काँग्रेस सरकार की आलोचना भी। यह आंदोलन सात वर्ष पुराना है और तब आरंभ हुआ था जब काँग्रेस की सरकार का आखिरी साल बचा था। फिर चुनाव हुआ और सरकार बदल गई। भाजपा सत्ता में आई और पाँच साल बहुत कुछ कर के और न करके चली गई। अब यहाँ बैठी भाजपा न जाने कौन सी थी? वह जिस की पिछले पाँच साल से सरकार थी, या जो चुनाव हार चुकी है? साल भर से फिर काँग्रेस सरकार में बैठी है। पता नहीं क्या परेशानी है जो हाईकोर्ट का विकेन्द्रीकरण करने में उन्हें परेशानी आ रही है। परेशानी बताई भी नहीं जा रही है।

इधर डेढ़ बजा और धरना समाप्त, गेट खोल दिए गए। आधे घंटे बाद अदालत परिसर के अंदर गए। सब कुछ सामान्य होने लगा। पर तब तक मुकदमों की तारीखें बदली जा चुकी थीं। मुवक्किल गायब हो चुके थे और अधिकांश वकील भी। मैं ने अपने मुंशी को तारीखें लाने को कहा जो वह कुछ ही देर में ले आया। दिन का काम हो चुका था। मैं घर की ओर चल दिया। हड़ताल को एक माह हो चुका है। यही आलम पूरे संभाग में फैला पडा़ है। मैं कल्पना कर सकता हूँ कि यही स्थिति बीकानेर और उदयपुर संभागों की होगी वे भी अपने-अपने यहाँ हाईकोर्ट बैंचे खोलने के लिए आंदोलनरत हैं।

Monday, September 28, 2009

कल को खु़र्शीद भी निकलेगा, सहर भी होगी

वकीलों की हड़ताल का असर महसूस होने लगा है। काम पर मन जम नहीं रहा है। उस का असर अपने ब्लाग लेखन पर भी आया। अनवरत पर पिछले आठ दिनों में मात्र तीन पोस्टें ही हो सकीं। आज ब्लागवाणी ने खुद को समेट लिया। मन दुःखी है। जब कोई अनजान और बिना संपर्क का व्यक्ति भी असमय चल बसे तो दुःख होता है, यह मानवीय स्वभाव है। जब भी नेट चालू होता ब्लागवाणी एक टैब पर खुली ही रहती थी।  ब्लागवाणी ने हिन्दी ब्लागरी के विकास में जो भूमिका अदा की वह ऐतिहासिक है, उसे इतिहास के पृष्ठों से नहीं मिटाया जा सकता।  अभी उस के लिए भूमिका शेष थी, जिसे निभाने से उस के कर्ताओं ने इन्कार कर दिया, या कहें वे पीछे हट गए।  पीछे हटने की जो वजह बताई गई, वह तार्किक और पर्याप्त नहीं लगती। लेकिन यह उस के कर्ताओं का व्यक्तिगत निर्णय है।  उसे कोई चुनौती भी नहीं दे सकता।  खुद कर्ता पहले ही ब्लागवाणी को निजि प्रयास कह चुके हों, तब कोई क्या कह सकता है?  सिवाय इस के कि इस घड़ी का दुख और पीड़ा चुपचाप सहन करे या उसे अभिव्यक्त करे।  मुझे मेरे पिता जी के दिवंगत होने का वक्त स्मरण हो रहा है। जब वे गए तो गृहस्थी कच्ची थी। चार भाइयों में मैं अकेला वकालत में आकर संघर्ष कर रहा था। जब तक मैं कोटा से बाराँ पहुँचा तो मेरे आँसू सूख चुके थे। पिता जी के जाने के ख़याल से अधिक, बचे हुए परिवार को जोड़े रखने और उसे संजोने की चिंता बड़ी हो गई थी। मेरी हालत देख लोग कहने लगे थे कि उसे रुलाओ वर्ना शरीर घुल जाएगा। मुझे आज कुछ वैसा ही महसूस हो रहा है।



हालांकि ब्लागवाणी निजत्व की सीमा से परे जा चुकी थी। कोई अकेला व्यक्ति भी जब समाज या उस के एक भाग से जुड़ता है तो उस का कुछ भी निजि नहीं रह जाता है।  ब्लागवाणी हिन्दी ब्लाग जगत के ब्लागरों और पाठकों से जुड़ी थी। ब्लागवाणी को बंद कर के उस के कर्ताओं ने हिन्दी ब्लाग जगत को दुःख पहुँचाया है और उन्हें रिक्तता के बीच छोड़ दिया है।  आज जब हिन्दी ब्लाग जगत को और बहुत से विविध प्रकार के ऐग्रीगेटरों और साधनों की जरूरत है, उस समय यह रिक्तता सभी को अखरेगी। लेकिन ऐसा भी नहीं कि इस की पूर्ति नहीं की जा सकेगी। सभी महान कही जाने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों के जाने के बाद ऐसा ही महसूस होता है। लेकिन जल्दी ही वह रिक्तता भरने लगती है। कम सक्षम ही सही, लोग आते हैं, काम करते हैं और अपनी भूमिका अदा करते हैं। कभी-कभी अधिक सक्षम लोग भी आते हैं और ऐसा काम कर दिखाते हैं जो पहले कभी न हुआ हो। तब लोग ऐतिहासिक भूमिका अदा करने वालों को भी विस्मृत कर देते हैं। लोगों को स्मरण कराना पड़ता है कि कभी किसी ने ऐतिहासिक भूमिका अदा की थी। ब्लागवाणी के मामले में क्या होगा? यह अभी नहीं कहा जा सकता।  इतना जरूर है कि ब्लागवाणी को बंद हुए अभी बारह घंटे भी न गुजरे थे, कि लोगों ने नए ऐग्रीगेटरों की तलाश आरंभ कर दी। एक एग्रीगेटर तो 'महाशक्ति समूह' तलाश भी कर लाया है। हो सकता है शीघ्र ही ब्लागवाणी के स्थान पर अनेक ऐग्रीगेटर दिखाई देने लगें और उस की छोड़ी हुई भूमिका को अदा करें।

सब से अफसोस-जनक बात जो है, वह यह कि ब्लागवाणी के बंद होने के लिए कुछ लोगों को जबरन जिम्मेदार ठहराया जा रहा है,  जिन में मैं भी एक हूँ।  यहाँ तक कि गालियाँ तक परोस दी गई हैं।  लेकिन मेरी दृढ़ मान्यता है कि जब भी, कुछ भी पुष्ट होता है तो वह अपने अंदर की मजबूती (अंतर्वस्तु)  के कारण और जब वह नष्ट होता है तब भी उस की अंदरूनी कमजोरी (अंतर्वस्तु) ही उस का मुख्य कारण होती है।  बाहरी तत्व उस में प्रधान भूमिका अदा नहीं कर सकते। रोज कपड़े सुखाने वाले से एक दिन डोरी टूट जाती है तो भी सुखाने वाले पर इल्जाम आता है, हालांकि वह टूटती अपनी जर्जरता के कारण है।

मेरे मित्र पुरुषोत्तम 'यक़ीन' के भंडार में इतनी रचनाएँ हैं कि  हर वक्त के लिए कुछ न कुछ मिल जाता है। इस रिक्तता के बीच मुझे उन की रचनाओं में से यह ग़ज़ल मिली है। आप भी पढ़िए। शायद इस ग़मज़दा माहौल में हिम्मत अफ़जाई कर सके।




कल को खु़र्शीद भी निकलेगा, सहर भी होगी
  •   पुरुषोत्तम 'यक़ीन'

हम अंधेरे में चराग़ों को जला देते हैं
हम पे इल्ज़ाम है हम आग लगा देते हैं


कल को खु़र्शीद* भी निकलेगा, सहर भी होगी
शब के सौदागरों! हम इतना जता देते हैं


क्या ये कम है कि वो गुलशन पे गिरा कर बिजली 
देख कर ख़ाके-चमन आँसू बहा देते हैं


बीहड़ों में से गुज़रते हैं मुसलसल** जो क़दम 
चलते-चलते वो वहाँ राह बना देते हैं


जड़ हुए मील के पत्थर ये बजा*** है लेकिन
चलने वालों को ये मंजिल का पता देते हैं


अधखिले फूलों को रस्ते पे बिछा कर वो यूँ 
जाने किस जुर्म की कलियों को सज़ा देते हैं


अब गुनहगार वो ठहराएँ तो ठहराएँ मुझे 
मेरे अश्आर शरारों को हवा देते हैं


एक-इक जुगनू इकट्ठा किया करते हैं 'यक़ीन'
रोशनी कर के रहेंगे ये बता देते हैं





ख़ुर्शीद*= सूरज,  
मुसलसल**=निरंतर,  
बजा***=उचित, सही




Saturday, September 26, 2009

बुरे फँसे, वकील साहब!

वकीलों की हड़ताल की खबर से पब्लिक को पता लगा कि वकील साहब फुरसत में हैं, तो हर कोई उस पर डकैती डालने को तैयार था। जिन मुवक्किलों को अब तक वकील साहब से टाइम नहीं मिल रहा था। उन में से कुछ के फोन आ रहे थे, तो कुछ बिना बताए ही आ धमक रहे थे। पत्नी सफाई अभियान में हाथ बंटवा चुकी थीं। उधर शिवराम जी की नाटक की किताबों के लोकार्पण समारोह में वकील साहब को देख महेन्द्र 'नेह' की बांछें खिल गईँ। कहने लगे आप को पत्रकारिता का पुराना अनुभव है, अखबारों के लिए समारोह की रिपोर्टिंग की प्रेस विज्ञप्ति आप ही बना दें।  वकील साहब पढ़ने को गए थे नमाज़, रोजे गले पड़ गए। एक बार टल्ली मारने की कोशिश की।  लेकिन महेन्द्र भाई कब मानने वाले थे। कहने लगे -हमारी कविताएँ ब्लाग पर हमसे पूछे बिना दे मारते हो और हमारा इतना काम भी नहीं कर सकते? अब बचने का कोई रास्ता न था। इरादा तो था कि समारोह में पीछे की लाइन में बैठते, बगल में बिठाते यक़ीन साहब को, गप्पें मारते समारोह का मजा लेते।   पर हाय! हमारे मजे को तो नजर लग चुकी थी। तो पहला डाका डाला महेन्द्र भाई ने। सुन रहे हैं ना, फुरसतिया जी ,उर्फ अनूप शुक्ला जी! अपने थाने में पहली रपट महेन्द्र भाई के खिलाफ दर्ज कीजिएगा।

 बुरे फँसे, वकील साहब!

दूसरे दिन अखबार में समारोह की खबर देखी।  फोटो तो था, लेकिन खबर में विज्ञप्ति का एक भी शब्द न था। खबर एक दम बकवास। वकील साहब खुश, कि अच्छा हुआ भेजी विज्ञप्ति नहीं छपी, वर्ना महेन्द्र भाई तारीफ के इतने पुल बांधते कि अगले डाके का स्कोप बन जाता और बेचारा वकील फोकट में फँस जाता। लेकिन महेन्द्र भाई कम उस्ताद थोड़े ही हैं। अगले ही दिन आ टपके।  वही तारीफों के पुल! हम इतनी मेहनत करते हैं, मजा ही नहीं आता, खबर में। अब देखो आपने बनाई और कमाल हो गया। वकील साहब अवाक! कहने लगे -विज्ञप्ति तो छपी नहीं, जो खबर अखबार में छपी है वह बहुत रद्दी है। अरे आप ने दूसरा अखबार देख लिया। इन को देखो। बगल में से तीन-चार अखबार निकाले और पटक दिए मेज पर। वकील साहब क्या देखते? सब अखबारों में विज्ञप्ति छपी थी, फिर फँस गए। महेन्द्र भाई ने देखा मछली चारा देख ऊपर आगई है, तो झटपट कांटा फेंक दिया। यार! कई पत्रिकाओं को रिपोर्ट भेजनी है, वह भी बना दो।

वकील साहब ने देखा कि महेन्द्र भाई ने काँटा मौके पर डाला है और कोट का कॉलर उलझ चुका है। छुड़ाने की कोशिश की -मैं ने समारोह के नोट्स लिए थे, वह कागज वहीं रह गया है, अब कैसे बनाउंगा? मुझे वैसे भी कुछ याद रहता नहीं है। महेन्द्र भाई पूरी तैयारी के साथ आए थे। अपने फोल्डर से कागज निकाला और थमा दिया। तीन दिन बाद भी वकील साहब के नोट्स का कागज संभाल कर रखा हुआ था। वकील साहब ने फिर बहाना बनाया -आप लोगों के पास बढ़िया-बढ़िया कैमरे हैं और फोटो तक ले नहीं सकते। अभी समारोह के फोटो होते तो ब्लाग पर रिपोर्ट चली गई होती।

वो भी लाया हूँ, इस बार महेन्द्र भाई ने फोल्डर से समारोह के फोटो निकाले और कहा इन्हें स्केन कर लो और मुझे वापस दो।  अब बचने की सारी गुंजाइश खत्म हो चुकी थी। वकील साहब की फुरसत पर डाका पड़ चुका था। फोटो स्केन कर के वापस लौटाए गए। शाम तक रिपोर्ट ब्लाग पर छापने का वायदा किया, तब जान छूटी। जान तो छूटी पर लाखों नहीं पाए।  ताजीराते हिंद का खयाल आया कि यह डाका नहीं है, बल्कि चीटिंग है।  दफा 415 से 420 तक  के घेरे में जुर्म बनता है।  नोट करना फुरसतिया जी। चीटिंग की एफआईआर दर्ज करना महेन्द्र भाई के खिलाफ। यह भी दर्ज करना कि उन्हों ने इतना हो जाने पर भी कोई नई कविता अनवरत के लिए नहीं दी है। हाँ, वकील साहब राजीनामा करने को तैयार हैं बशर्ते कि महेन्द्र भाई कम से कम पाँच कविताएँ अनवरत को दे दें जिस से पाठकों को भी पढ़ने को मिल सकें।

अब फुरसत तो महेन्द्र भाई छीन ले गए।  समारोह की  रिपोर्ट बनाने का काम छोड़ गए।  वकील साहब उस में लगते कि फोन की घंटी बजी, ट्रिन...ट्रिन...! उठाया तो बड़े भाई महेश गुप्ता जी थे।  बार कौंसिल के मेंबर और पूर्व चेयरमेन, बोले क्या कर रहे हो पंडत! कुछ नहीं नहा धो कर अदालत जाने की सोच रहा हूँ। चलो बाराँ हो आएँ। वकील साहब समझ गए, एक से पीछा न छूटा पहले ही दूसरे डकैत हाजिर ..... अब चुनाव प्रचार भी करना पड़ेगा।

Thursday, September 24, 2009

फुरसत पर डाका


पिछले महीने की इकत्तीस तारीख से कोटा के वकील हड़ताल पर चल रहे हैं। हम भी साथ साथ हैं। रोज अदालत जाते हैं। वहाँ कोई काम नहीं, बस धरने पर बैठो, या अपने पटरे पर, या फिर दोस्तों के साथ चाय-कॉफी की चुस्कियाँ मारो। क्या फर्क पड़ता है? पर दिनचर्या बिगड़ गई है। जब काम ही नहीं होना है तो रोज फाइलें कौन निकाले और देखे। फाइलें अलमारी में पड़े पड़े आराम फरमा रही हैं। मुवक्किल भी फोन से पूछ रहे हैं कि हम आएँ या बिना आए काम चल जाएगा? अभी अदालतें सख्ती नहीं कर रही, शायद दुगने-चौगुने काम के बोझ से मारी अदालतें भी हड़ताल से मिले आराम का लाभ उठा रही हैं। मुवक्किलों की भीड़ अदालत में कुछ कम है।  मुंशी जाते हैं, तारीख ले आते हैं। किसी मुवक्किल को जल्दी होती है तो उस की दरख्वास्त पेश कर देते हैं। किसी की जमानत करानी होती है तो मुंशी अर्जी पेश कर देता है, वही फार्म भर देता है। अदालतें हैं कि बिना वकीलों का तनाव झेले बने बनाए ढर्रे पर जमानत ले लेती है, मुलजिम बाहर आ जाता है। जिस ने थोड़ा भी संगीन अपराध किया हो वह मुश्किल में हैं, उस की जमानत अटकी है। पुराना खुर्राट मुंशी एक जूनियर वकील को सलाह देता हुआ हमने सुन लिया "वकील साहब! मुवक्किलों को तो जरूर बुलाया करो। आएंगे तो कुछ तो नामा-पानी कर जाएंगे। वरना हड़ताल में सब्जी कहाँ से आएगी। दीवानी और गैरफौजदारी मुकदमों में कोई कार्यवाही नहीं हो रही है।

भले ही हड़ताल हो पर पेट हड़ताल नहीं करता। बिजली, पानी टेलीफोन वाले भी उन के बिल नहीं रोकते। पर भला हो उन मुवक्किलों का जो हड़ताल के वक्त अपने वकीलों का खयाल रखते हैं, फीस दे जाते हैं, कुछ तो इतने उदार हैं कि इस वक्त में ज्यादा भी दे जाते हैं। शायद वकील साहब बुरे वक्त में पाए पैसे की लाज रख लें। कुछ ज्यादा तवज्जो उस के मुकदमे पर दें।

हड़ताल तो कोटा के वकील छह साल से करते आए हैं, महीने के आखिरी शनिवार को। चाहते हैं, कोटा में हाईकोर्ट की बैंच खुल जाए।  छह साल से एक हड़ताल चल रही है। किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। वह स्वैच्छिक अवकाश जैसी चीज बन गई है। लेकिन हड़ताल बदस्तूर जारी है। कभी तो बिल्ली के भाग से छींका टूटेगा। कभी तो हाईकोर्ट और उस की एक बैंच की कमर फाइलों के बोझ से दोहरी होने लगेगी। कभी तो सरकार सोचेगी ही कि और भी बैंचें बनाई जाएँ। वैसे भी बीस बीस जजों को दो जगह बिठाने से क्या फायदा? इस की जगह दस दस जजों को चार जगह बिठा दिया जाए तो जनता को तो सुविधा होगी ही। यह सीधे-सीधे डेमोक्रेसी के डीसेंट्रलाइजेशन का मामला बनता है। पर अभी हड़तालियों का ध्यान अपनी मांग के इस लोजीकल प्रेजेंटेशन की तरफ नहीं गया है।


काम के दिनों में फुरसत निकलती थी। सब समझते थे कि वकील साहब काम में व्यस्त हैं। इधर जब से हड़ताल का पता लगा है। पत्नी से ले कर दोस्तों तक को वकील साहब फुरसत में नजर आ  रहे हैं।  हर कोई हमारी फुरसत पर पिले पड़ा है। पत्नी को दिवाली की सफाई के काम में हाथ बंटवाना है. दोस्तों को कुछ खास काम निकलवाने हैं।  कुछ मुवक्किल भी इसी इंतजार में बैठे थे, वे भी चक्कर लगाने लगे हैं। शायद बहुत दिनों से क्यू में इंतजार कर रहे उन के काम की बारी आ जाए।  सब हमारी फुरसत पर निगाह जमाए बैठे हैं।  कब मौका मिले और हमारी फुरसत हथिया लें। मुश्किल से अब जा कर उन का मौका जो लगा  है। फुरसत पर डाका पड़ रहा है। इस डाके के लिए किसी थाने में रिपोर्ट, तफ्तीश और चालान का कायदा भी नहीं है।

Monday, September 21, 2009

कुछ संवाद 'गटक चूरमा' नाटक से .....

- अपने वो वकील साहब हैं न?
- कौन?
- अरे ! वो ही, जो 'तीसरा खंबा' पे कानूनी बात बतावत हैं, और 'अनवरत' पर भी न जाने क्या क्या लिक्खे हैं।
- हाँ, हाँ वही न, जो सिर से गंजे हो कर भी 'शब्दों का सफर' में सरदार बने बैठे हैं?
- हाँ, वो ही।
- वो दो दिन से कुच्छ भी ना लिख रहे, अनवरत खाली पड्यो है।
- क्या? दो दिन में लिखने को कुच्छ ई ना मिल्यो उन को? आज तो बड़्डे-बड्डे मौके थे जी। एक तो पाबला जी को जनम दिन थो, दूजो करीना कपूर को, तीजो ईद को। कच्छु नाहीं तो मुबारक बाद ही लिक्ख मारते!
-एक दिन तो निकल गयो, शिबराम जी की नाटकाँ की किताबाँ का लोकार्पण में।
-आज दफ्तर में काम करने बैठ गए जी, फेर साम को कोई से मिलने-जुलने निकल गए जी। अब खा पी के लोकार्पण हुई किताब बाँच रहे हैं।
- कौन सी किताब बाँच रिये हैं जी?
- वो, ही जी, का कहत हैं उसे ..... "गटक चूरमा"।
- अब ये गटक चूरमा  का होवे जी?
- य्हाँ तो किताब और नाटक को नाम है जी। पर जे एक चूरन होवे, जो मुहँ में फाँके तो खुद बे खुद पानी आवे और गले से निच्चे उतर जावे।
- वो तो ठीक, पर ई किताब में का लिक्खो होगो?
- चल्ल वा वकील साब से ही पूच्छ लेवें।
- चल!
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- वकील साब! गटक चूरमा पढ़ो हो। कच्छु हमें ही सुना देब, दो-च्चार लाइन।
- तो सुनो.....


भोपा और भोपी, वे ही जो राजस्थान में फड़ बांच सुनावें। रामचंदर के गांव बड़ौद पहुंच गए हैं। जबरन रामचंदर के बेटी जमाई भी बन लिए। अब रामचंदर ले जा रहा है उन्हें अपने घर। रास्ते में कुत्ता भोंकता है।
रामचंदर-  तो ..... तो....... (कहते हुए पत्थर मार कर कुत्ते को भगाता है और कहता है) मेहमान हैं, नालायक कोटा से आए हैं ... (फिर भोपा-भोपी से मुखातिब हो कर) कुत्ते हैं, नया आदमी देखते हैं तो भोंकते हैं। कुत्ते तो कोटा में भी भोंकते होंगे।
भोपी- ना, हमारे यहाँ तो काटते हैं, फफेड़ देते हैं, पेट में चौदह इंजेक्शन लगें। नहीं तो कुत्ते के साथ ही जै श्री राम!
भोपा- नही, ये तो झूठ बोलती है। हमारे यहाँ तो कुत्ते दुम हिलाते हैं और पैर चाटते हैं।
भोपी- चाटते हैं, पर बड़े लोगों के। छोटे लोगों को देख कर तो ऐसे झपटते हैं जैसे पुलिस।
भोपा- ऐ भोपी, तू पालतू कुत्तों की बात कर रही है और यहाँ बात चल रही है गली मोहल्ले के कुत्तों की। समझती नहीं है क्या।
रामचंदर- सच कहते हो भाई। उन कुत्तों की तो किस्मत ही निराली है, जो कोठी-बंगलों में रहते हैं। किसन बता रहा था कि बड़े ठाट हैं भाई उन के। हम से तो वे कुत्ते ही बढ़िया।
भोपा- बढ़िया? पाँचों अंगुली घी में...।
भोपी- अरे! मेरे राजा, पाँचों नहीं दसों अंगुलियाँ घी में। साहब और मेम साहब अपने हाथों मालिस करें, नहलावें-धुलावें, बाथरूम, टॉयलट करावें...।
भोपी- (रामचंदर से) मतलब टट्टी पेशाब करावें।
(रामचंदर हँसता है)
भोपी- फस्सकिलास खाना खिलाएँ और गद्दों पर सुलाएँ।
भोपा- और झक्क सैर कराने ले जाएँ।
भोपी- आगे आगे कुत्ता और पीछे-पीछे साब।
भोपी- वाह! क्या दृश्य बनता है।
पता नहीं चल पाता कि इनमें कुत्ता कौन है और साहब कौन...।
(भोपा और रामचंदर ठठा कर हँस पड़ते हैं)
-बस भाई इत्ता ही। वकील साब बोले। आगे या तो किताब खुद बाँचो या फिर कहीं नाटक खेला जाए तो देखो। नहीं तो किताब मंगाओ और खुद खेलो।


भोपा-भोपी
और अंत में-
सब से पहले टिप्पणीकारों, फिर गैरटिप्पणीकार पाठकों और फिर ब्लागर भाइयों को ईद-उल-फित्र की बधाई और शुभकामनाएँ। 
राम! राम!
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Saturday, September 19, 2009

अपना मुख जन-गण की ओर -शिवराम


 आज  शिवराम के नाटकों की दो पुस्तकों 'गटक चूरमा' (मूल्य 35 रुपए) और 'पुनर्नव' (मूल्य 50 रुपए) का लोकार्पण है। इन में सम्मिलित सभी नाटक खेले जा चुके हैं और उन का नाटकीय आवश्यकताओं के अनुसार पुनर्लेखन भी हुआ है।  सभी नाटक किसी भी नाटक रूप में खेलने के लिए आदर्श हैं। मैं चाहता था कि इस अवसर पर इन नाटकों के बारे में कुछ लिखूँ। जब मैं उन्हें इस हेतु फिर से पढ़ने बैठा तो लगा कि उन पर कुछ लिखने से बेहतर होगा कि 'गटक चूरमा' की भूमिका में लिखा गया शिवराम का आलेख यहाँ प्रस्तुत करना अधिक प्रासंगिक होगा।  उसे ही बिना किसी टिप्पणी के यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ......

हिन्दी जगत की सक्रिय नाट्य संस्थाओं की सब से बड़ी समस्या कोई है तो वर्तमान  संदर्भों में प्रासंगिक नाटकों की।  नाटक कम लिखे जा रहे हैं। पुराने नाटकों की प्रासंगिकता कम दिखाई देती है। दूसरी भाषाओं से अनुवाद अपनी जगह पर है, पर अपनी भाषा में रचे गए नाटकों का दर्शकों के साथ जो सांस्कृतिक तादात्म्य बनता है वह अनुदित नाटकों का नहीं बनता इसलिए यह भी हो रहा है कि नाट्य दल इम्प्रोवाइजेशन पद्धति से किसी एक थीम या आईडिया पर सामूहिक रूप से आलेख तैयार करते हैं और इस तरह नाटकों के अभाव की पूर्ति करते हैं। लेकिन समर्थ लेखक द्वारा नाट्य रचना का सृजन भिन्न प्रकार की रचना प्रक्रिया है, जीवनानुभव, जीवन दर्शन और मानवीय संवेदनाओं के क्रिया व्यापार के बेहतर समुच्चय की संभावना वहाँ अधिक बनती है। प्रस्तुति के लिए तैयारियों के दौरान निर्देशक और कलाकारों का व्यवहार मंच की आवश्यकतानुसार  उस समृद्ध करता ही है, लेकिन यदि उन के पास 'थीम' या 'आईडिया' के बजाय नाटक-रचना उपलब्ध हो और वे उस पर काम शुरू करें तो यह उन के लिए भी अधिक सुविधाप्रद रहता है और बेहतर नाट्य प्रस्तुति के लिए भी अधिक उपयुक्त रहता है। जाहिर है हिन्दी में वर्तमान सामाजिक यथार्थ पर आधारित नाटकों की जरूरत है।

जो लोग सामाजिक दायित्वबोध से संचालित हैं और जनता के बीच सास्कृतिक-सामाजिक आंदोलन निर्मित किए जाने के पक्षधर हैं, उन्हें कलाओं और साहित्य की जनोन्मुखी विधाओं और प्रवृत्तियों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।  अभिजनोन्मुखी साहित्यिक सांस्कृतिक मठाधीशों की दुनिया जनोन्मुखी कला कर्म का उपहास और तिरस्कार करेगी ही, उन्हें अपने काम में लगे रहने दें। भविष्य उसी कला कर्म का है, सार्थकता उसी कलाकर्म की है जो अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप करता है। अपना मुख जनगण की ओर रखता है।

नाटक एक ऐसी विधा है जो काव्य भी है और कहानी भी।  मंच पर प्रस्तुति के समय तो सभी कला विधाएँ उस के साथ समुच्चित होने लगती हैं। अतः यह कविता या कहानी से कम महत्वपूर्ण विधा नहीं है। बल्कि अधिक महत्वपूर्ण है। नाट्य रचना कठिन काम है, कविता या कहानी से अधिक कठिन है। वर्तमान हिन्दी साहित्य जगत में उस का कम मान है तो यह अभिजनोन्मुखता की प्रवृत्तियों के वर्चस्व के कारण है। जिन्हें अभिजन समाज की सेवा चाकरी में अपने कला कर्म को परोसना है और उन से प्राप्त इनामों-इकरामों से जीवन यापन करना है वे अपने इस चारण-विदूषक-चाटुकार कर्म में लगे रहें और कुंठित हो हो कर भूलुंठित होते रहे, उन के दिए ताजों-भूषणों से अलंकृत हो हो कर दुमें ऊँची कर-कर के ऐंठते-गुर्राते रहें। ऐसे लोगों को ठेंगा दिखाओ और हो सके तो इन बेचारों पर दया करो, लेकिन जो साहित्य और कलाओं को मनुष्य के सांस्कृतिक उन्नयन की साधना मानता है और इस हेतु जन-गण को समर्पित है उन की दुनिया अलग है, उन का मार्ग अलग है। कठिनाई तब होती है जब दोनों दुनियाओं में स्थान बनाने की आकांक्षा उछल-कूद करती है। इस दुविधा से मुक्त होना चाहिए। या तो इस और या उस ओर। तिकड़मों, हुक्मरानों की कृपाओं, संसाधनों के बल पर पाए प्रचारों से कुछ समय के लिए अपनी श्रेष्ठता का भ्रम पैदा किया जा सकता है। साहित्य और कलाओं की दुनिया अंततः वही बचता है, जिसे लोक सहेजता है।

नाटक, गीत, पोस्टर, चित्रकला, आदि जन सांस्कृतिक अभियान के प्रमुख अंग हैं।  हमें इन्हें पुष्ट और समृद्ध करना चाहिए।

ये नाटक ऐसी ही जरूरतों के अंतर्गत लिखे गए हैं। इस संग्रह में चार नाटक हैं; 'गटक चूरमा', 'हम लड़कियाँ', 'बोलो-हल्ला बोलो' और 'ढम ढमा ढम ढम'। 'दुलारी की माँ', एक गाँव की कहानी' और 'रधिया की कहानी' नाटकों को भी मैं इस में शामिल करना चाहता था लेकिन ये तीनों नाटक अलग अलग पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं और अभी उपलब्ध भी हैं, इस लिए फिर इन्हें इस संग्रह में शामिल करने का इरादा छोड़ दिया।

ये नाटक मेहनतकश अवाम की जिंदगी, उन की समस्याओं और साम्राज्यवादी भू-मंडलीकरण के यथार्थ से रूबरू होते हैं और दर्शकों को रूबरू कराते हैं। इन्हें नुक्कड़ों, चौपालों, खुले मंचों और रंगमंच पर सभी रूपों में खेला जा सकता है।

'अभिव्यक्ति' नाट्य एवं कला मंच कोटा ने इस पुस्तक के प्रकाशन में दायित्वपूर्ण सहयोग किया है।  सच तो यह है कि मेरे नाटकों को इस संस्था से सम्बद्ध रंगकर्मियों ने मुझ से अधिक जिया है। मैं उन के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ।  मैं उन सभी मित्रों और निर्देशकों का आभारी हूँ, जिन्हों ने  इस हेतु प्रेरणा दी और सहयोग किया। उनि सभी रंग संस्थाओं और रंग कर्मियों का भी मैं आभारी हूँ। जिन्हो ने इन नाटकों की प्रस्तुतियाँ दी और इन्हें जन-नाटक बनाया।

मुझे विश्वास है कि जनता के बीच सक्रिय जनोन्मुखी रंगकर्मी इन नाटकों को उपयोगी पाएँगे।

इन नाटकों के गैर व्यावसायिक मंचन के लिए पूर्व स्वीकृति की आवश्यक नहीं है। मंचन की सूचना् देंगे तो अच्छा लगेगा।
-शिवराम



दोनों नाटक पुस्तकों की प्रतियाँ स्वयं शिवराम से या प्रकाशक से मंगाई जा सकती हैं। उन के पते सुविधा के लिए यहाँ दिए जा रहे हैं।

  • शिवराम, 4-पी-46, तलवंडी, कोटा (राजस्थान) 
  • बोधि प्रकाशन, ऐंचारा बिल्डिंग, सांगासेतु रोड़, सांगानेर, जयपुर (राजस्थान)

Friday, September 18, 2009

शिवराम की दो और नाट्य पुस्तकें पुनर्नव और गटक चूरमा


हिन्दी नाटक के क्षेत्र में शिवराम जाने माने नाटककार हैं। उन्हों ने नाटक केवल लिखे नहीं है, उन्हें खेला है और जनता के बीच जा कर खेला है।  यह कहा  जा सकता है कि उन्हों ने नाटकों को खेलने  के लिए ही लिखा है। उन  के नाटक केवल रंगमंच के नाटक नहीं हैं। वे जनता के नाटक हैं। जनता उन के नाटकों को देखती है और उन पर प्रतिक्रिया भी करती है। उन के नाटकों की चेतना जनता को अन्याय और शोषण के विरुद्ध संगठित होने और संघर्ष करने की प्रेऱणा देती है। जब उन्हों ने पहले पहल नाटक खेले और खान मजदूर उन के पास आ गए कि नाटक बता कर संगठित होने का संदेशा तो दे दिया लेकिन अब हमें संगठित होने का तरीका भी बताइए। खैर उस वक्त तो उन्हों ने मजदूरों को पास के नगर के ट्रेड यूनियन नेताओं के हवाले कर दिया। लेकिन जल्दी ही उन के अपने विभाग के कर्मचारियों ने उन्हें पकड़ा तो विभाग से  सेवा निवृत्ति के बाद भी उन से पीछा नहीं छूटा है।

शिवराम की छह पुस्तकें पहले आ चुकी हैं। जिन में जनता पागल हो गई है, घुसपैठिए, दुलारी की माँ, एक गाँव की कहानी, राधेया की कहानी नाटकों की पुस्तकें हैं तथा सूली ऊपर सेज सेज पर विवेचनात्मक पुस्तक है। पिछले ही महीने उन के नाटक जनता पागल हो गई है के हाड़ौती अनुवाद जनता बावळी होगी का लोकार्पण हुआ है।  जनता पागल हो गई है उन का वह नाटक है जिस ने उन्हें न केवल हिन्दी प्रदेशों में अपितु संपूर्ण भारत और विदेशों तक में पहुँचाया। इस नाटक को लगभग सभी भारतीय भाषाओं में खेला जा चुका है। राज की बात यह कि इस बन्दे ने भी उस नाटक में एक खासमखास भूमिका  अनेक बार अदा की है।



अब इस बार उन के नाटकों की दो पुस्तकें पुनर्नव और गटक चूरमा बोधि प्रकाशन ने एक साथ प्रकाशित की हैं। 20 सितम्बर को अभिव्यक्ति नाट्य़ मंच और 'विकल्प' जन सांस्कृतिक मंच कोटा ने इन दोनों पुस्तकों का लोकार्पण समारोह आयोजित किया है। पुनर्नव में तीन जनप्रिय कहानियों के नाट्य रूपांतरण हैं। जिन में मुंशी प्रेमचंद की ठाकुर का कुआँ, सत्याग्रह और ऐसा क्यूँ हुआ हैं,  तो रिज़वान जहीर उस्मान की खोजा नसरूद्दीन बनारस में और नीरज सिंह की क्यो? उर्फ वक्त की पुकार शामिल हैं। दूसरी पुस्तक में उन के चार मौलिक नाटक गटक चूरमा, बोलो- हल्ला बोलो!,  ढम, ढमा-ढम-ढम और हम लड़कियाँ शामिल हैं।



लोकार्पण समारोह में 'विकल्प' के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बी.आर.ए. विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर बिहार के विभागाध्यक्ष डॉ. रविन्द्र कुमार 'रवि' मुख्य अतिथि हैं एल.एस. कॉलेज मुजफ्फरपुर बिहार की डॉ. मंजरी वर्मा विशिष्ट अतिथि हैं, अतुल चतुर्वेदी मुख्य वक्तव्य देंगे. समारोह की अध्यक्षता डॉ. नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी और संचालन महेंन्द्र नेह करेंगें। इस समारोह में समकालीन परिस्थितियों और नाटकों पर अच्छा विमर्श होने की संभावना है।
लोकार्पण समारोह की रिपोर्ट और दोनो पुस्तकों का परिचय अनवरत आप को पहुँचाएगा। 

Thursday, September 17, 2009

अश्यी काँई ख्हे दी ब्हापड़ा नें

घणो बवाल मचायो! अश्यी काँईं ख्ह दी।  य्हा ई तो बोल्यो थरूर के कैटल क्लास म्हँ जातरा कर ल्यूंगो।  अब थें ई सोचो;  ब्हापड़ा नें घणी घणी म्हेनत करी। पैदा होबा के फ्हेली ई हिन्दुस्तान आज़ाद होग्यो जी सूँ बिदेस म्हँ पैदा होणी पड्यो। फेर बम्बई कलकत्ता म्हँ पढणी पड़्यो। इत्य्हास मँ डिगरी पास करी व्हा बी अंग्रेजी म्हँ प्हडर। फेर अमरीका ज्यार एम्में अर पीएचडयाँ करणी पड़ी। नरी सारी कित्याबाँ मांडी। जद ज्यार ज्यूएन म्हँ सर्णार्थ्याँ का हाई कमीस्नर बण्यो। फेर परमोसन लेताँ लेताँ कणा काँई सूँ कणा काँईं बण बैठ्यो।  फेर बडी मुसकिल सूँ जुगाड़ भड़ायो अर ज्यू एन का सेकरेटरी जर्नल को चुणाव ज्या लड्यो। ऊँम्हँ भी हारबा को अंदसो होयो तो नाम ई पाछो जा ल्यो।
अब यो अतनो ऊँचो कश्याँ बण्यो? थाँ ईँ याद होव तो बताओ! न्हँ तो म्हूँ बताऊँ छूँ। अतनो बडो आदमी अश्याँ  ई थोड़ी बण ज्याव छे। घणा पापड़ बेलणी पड़ छे, ज्यूएन म्हँ घुसबा कारणे। जमारा भर का मोटा मोटा सेठ पटाणी पड़े छे।  कान काईँ बण ज्याबा प व्हाँ की सेवा करणी पड़े छे। जद परमोसन मले छे। अब अश्याँ परमोसन लेताँ लेताँ दोन्यूँ को गठजोड़ो अतनो गाढ़ो हो ज्यावे छे जश्याँ फेवीकोल को जोड़। दोन्यूँ आडी हाथी अड़ा र खींचे  जद  भी न छूटे। 
अब थाँ ई बोलो! जमारा भर का सेठाँ सूं गठजोड़ो बांधे अर फेर भी व्हाई ज्हाज की थर्ड किलास म्हाइनें जातरा करे। य्हा कोई जमबा हाळी बात छे कईँ। अब य्हा ई तो गलती होगी, के उँठी ज्यूएन छोडर अठी आ मर् यो। पण काँई करतो ब्हापड़ो, उँठी मंदी की मार पड़ री छी। गठजोड़ा हाळा सन्दा सेठा के ही व्हा गळा में आ री छी तो यो व्हाँ काई करतो। अठी इटली हाळी माता जी नें देखी के यो ज्यूएन को बंदो फोकट म्हँ पल्ले पड़ रियो छे तो ईं ने छोडो मती, पकड़ ल्यो।  व्हाँ ने पकड़्यो अर किसमत नें जोर मारि्यो, अर चुणाव में जीतग्यो। अठी जीत्यो अर उठीं उँ की पौ बारा।  झट्ट सूं सेकिण्ड बिदेस मंतरी जा बणायो। आखर कार ऊँ ने गठजोड़ा को धरम भी तो निभाणो छो। 
अब थें ई बताओ! अतनो बडो आदमी ज्ये जमारा भर का सेठाँ सूँ गठजोड़ो बणावे अर व्हाँ के कारणे सैकिंड बिदेस मंतरी बण के दिखावे। ऊँ से था खेवो के भाया खरचा माथे व्हाई ज्हाज का थर्ड किलास में बैठणी पड़सी। अब माता जी को खेबो भलाईँ न्ह माने पण गठजोड़ा को धरम तो निभाणी पडे। अर माताजी न्हें भी थोड़ी आँख्याँ दखाणी पड़े; के थें यूँ मती सोच जो के म्हूँ थाँ के न्हाईं छूँ। थानें हिन्दूस्तानी व्हाई ज्हाज का डिरेवर सूँ गठजोड़ो बणायो, पण म्हंने तो जमारा भर का सेठाँ सू बणायो छे, आज ताईँ निभायो छे। अर आगे भी निभाबा को पक्को इरादो कर मेल्यो छे। 
थें ई बताओ, के ससी थरूर न्हें काँई झूट बोल्यो? हिन्दुस्तान का व्हाई ज्हाज की थर्ड किलास गायाँ भैस्याँ के बरोबर छे क कोई न्हँ? थाईं तो याद छे के व्ह परदेसी गायाँ जे पच्चीस-पच्चीस सेर दूध देव व्हाँ के ताँई कूलर एसी म्हँ रखाणणी पड़े छे। अब ससी थरूर साइब के ताईं जमारा भर का सेठाँ सूँ गठजोड़ा को सरूर न्हँ होवेगो तो काँईँ थारे ताँई होवेगो के ?

स्वादिष्ट भोजन बना कर मित्रों को खिलाने और साथ खाने का आनंद

पिताजी को भोजन बनाने, खिलाने और खाने का शौक था। वे अक्सर नौकरी पर रहते और केवल रविवार या किसी त्यौहार के अवकाश के दिन घर आते।  अक्सर मौसम के हिसाब से भोजन बनाते। हर त्यौहार का भोजन भिन्न  होता। गोगा नवमी को कृष्ण जन्मोत्सव पर मालपुए बनते, कभी लड्डू-बाटी कभी कुछ और। हर भोजन में उन के चार-छह मित्र आमंत्रित होते। उन्हें भोजन कराते साथ ही खुद करते।

 श्राद्ध पक्ष में ब्राह्मण को भोजन कराने का नियम है। लेकिन उस से अधिक महत्व इस बात का है कि उस के उपरांत आप को परिजनों और मित्रों के साथ भोजन करना चाहिए। इस से हम अपने पूर्वजों के मूल्यों व परंपराओं को दोहराते हुए उन का का स्मरण करते है। श्राद्ध के कर्मकांड को एक तरफ रख दें, जिसे वैसे भी अब लोग विस्मृत करते जा रहे है, तो मुझे यह बहुत पसंद है।  मामा जी अमावस के दिन नाना जी का श्राद्ध करते थे। दिन में ब्राह्मण को भोजन करा दिया और सांयकाल परिजन और मित्र एकत्र होते थे तो उस में ब्राह्मणों की अपेक्षा बनिए और जैन अधिक हुआ करते थे। मुझे उन का इस तरह नाना जी को स्मरण करना बहुत अच्छा लगता था। नाना जी को या उन के चित्र को मैं ने कभी नहीं देखा, लेकिन मैं उन्हें इन्हीं आयोजनों की चर्चा के माध्यम से जान सका। लेकिन मेरे मस्तिष्क में उन का चित्र बहुत स्पष्ट है। 

यही एक बात है जो मुझे श्राद्ध को इस तरह करने के लिए बाध्य करती है। आज पिताजी का श्राद्ध था। सुबह हमारे एक ब्राह्मण मित्र भोजन पर थे। शाम को मेरे कनिष्ट, मुंशी और मित्र भोजन पर थे। नाटककार शिवराम भी हमारे साथ थे। उन की याद तो मुझे प्रातः बहुत आ रही थी। यहाँ तक कि कल सुबह की पोस्ट का शीर्षक और उस की अंतिम पंक्ति उन्हीं के नाटक 'जनता पागल हो गई है' के एक गीत से ली गई थी। रविकुमार ने उस गीत के कुछ अंश इस पोस्ट पर उद्धृत भी किए हैं। उन्हों ने न केवल इस पोस्ट को पढ़ा लेकिन यह  भी बताया कि अब नाटक में मूल गीत में एक पैरा और बढ़ा दिया गया है। मेरा मन उसे पूरा यहाँ प्रस्तुत करने का था। लेकिन फिर इस विचार को त्याग दिया क्यों कि अब बढ़ाए गए पैरा के साथ ही उसे प्रस्तुत करना उचित होगा। वह भी उस नाटक की मेरी अपनी स्मृतियों के साथ।  उन्हों ने बताया कि उन के दो नाटक संग्रहों का विमोचन 20 सितंबर को होने जा रहा है। उन पुस्तकों को मैं देख नहीं पाया हूँ। शिवराम ने आज कल में उन के आमुख के चित्र भेजने को कहा है। उन के प्राप्त होने पर उस की जानकारी आप को दूंगा।
फिलहाल यहाँ विराम देने के पूर्व बता देना चाहता हूँ कि शोभा ने पूरी श्रद्धा और कौशल के साथ हमें गर्मागर्म मालपुए, खीर, कचौड़ियाँ, पूरियाँ खिलाईं। शिवराम अंत में कहने लगे आलू की सब्जी इन दिनों बढ़िया नहीं बन रही है लेकिन आज बहुत अच्छी लगी। केवल आलू की सब्जी खा कर भोजन को विश्राम दिया गया। स्वादिष्ट भोजन बना कर मित्रों को खिलाना और साथ खाने के आनंद का कोई सानी नहीं। नगरीय जीवन में यह आनंद बहुत सीमित रह गया है।

Wednesday, September 16, 2009

भूख लगे तो गाना गाsssss..आ.sssss.......

मानसून रूठ गया। बरसात नहीं हुई है। सूखा मुहँ बाए खड़ा है। महंगाई रोंद रही है। बहुत लोग हैं जो इस में कमाई का सतूना देख रहे हैं और कर रहे हैं। सरकार स्तब्ध है। कुछ कर नहीं पा रही है। कहती है .... हम इंतजाम कर रहे हैं पर कुछ तो बढ़ेगी। भुगतना होगा। सरकार को भी लगता है भुगतना होगा। सरकार परेशान है। सरकार में बैठी पार्टी परेशान है।

वह रास्ता निकालती है, कम खर्च करो बिजनेस की बजाय इकॉनॉमी में सफर करो। हवाई जहाज को छोड़ो ट्रेन में सफर करो। जनता के लिए यह संदेश है, तुम सफर करना बंद करो, पैसा बचाओ और उस से खाना खरीदो। सरकार मुश्किल में है। और बातें तो ठीक थीं पर मानसून यह न जाने क्यों गले पर आ कर बैठ गया। अब संकट है। वह संकट के उपाय तलाश रही है। 
मीडिया संकट का बड़ा साथी है। वह संकट पैदा करता है, वह संकट नष्ट करता है। उसे दुकान चलानी है। गड्ढा खोदो और फिर उसे भरो। तमाशा देखें उन को विज्ञापन दिखा कर पैसा वसूल करो। कुछ न हो तो पुराने पेड़ की खोह में आग लगा दो। जब तक पेड़ जल न जाए। ढोल पीट पीट कर लाइव दिखाते रहो। लोगों को बिजी कर दो और बिजनेस करो। रोटी कमाओ। 
पाकिस्तान परमानेंट इलाज है। जब कुछ काम न आए तो उधर से गोली चलने और गोला फेंकने की खबर दो। जब लोग पत्थर ले कर उधर फैंकने लगें तो कह दो ये तो उग्रवादियों की गतिविधि है। वह बेचारा खुदे ई उन से परेसान है। फिर औसामा को गाली दो। काम न चले तो डॉलर से उस की रिश्तेदारी का बखान करो। दो दिन निकल जाएंगे।
फिर चीन की तरफ झाँको। वह घुसा और लाल स्याही से पत्थरों पर चीन लिख गया। फिर चीन से तस्करी से आने वाले माल का उल्लेख करो, तस्करी को लाइव दिखाओ। कब से हो रही है? मीडिया जी अब तक कहाँ थे? यहीं थे। बस रिजर्व में रखा था इस माल को। अब जरूरत पड़ी तो दिखा रहे हैं। जब लोग बोर होने लगें तो दिखा दो कोई नहीं घुसा। वह तो अपने ही लोग पत्थरों पर चीन-चीन लिखना सीख रहे थे। 
लोग तमाशा देखेंगे, और रोटी को भूल जाएँगे, महंगाई को भूल जाएंगे, बेरोजगारी को भूल जाएंगे।  सीधे सतर खड़े हो कर जन, गण, मन गाएंगे। सीधे सतर न रहें तो भी तमाशा है उसे दिखाओ। हर ओर से चांदी है।  जब लोगों को भूख लगे, वे चिल्लाने लगें तो किसी अच्छे कंडक्टर को बुलाओ जो मंच पर खड़ा हो कर डंडी हिलाए और गाना गवाए - भूख लगे तो गाना गा, भूख लगे तो गाना गा...ssss...sssss....

Monday, September 14, 2009

हिन्दी इनस्क्रिप्ट टाइपिंग सीखें, हिन्दी में काम की गति और शुद्धता बढ़ाएँ और अधिक काम करें

मनुष्य  प्रजाति को अपने संरक्षण और विकास के लिए यह आवश्यक था कि वह जाने कि  जिस दुनिया में वह रहता है उस में क्या है जो उस के श्रेष्ठ जीवन और उस की निरंतरता के लिए सहायक है, और क्या घातक है। कौन सी वनस्पतियाँ हैं जो जीवन के लिए पोषक हैं और कौन सी हैं जो घातक हैं? शिकार, भोजन संग्रह और मौसम से संबंधित वे क्या जानकारियाँ हैं जो उस के जीवन को सुरक्षित बनाती हैं। इन  जानकारियों के प्राप्तकर्ता के लिए यह भी आवश्यक था कि उन्हें वह अपने समूह को संप्रेषित करे। जिस से समूह को इन्हें  जुटाने में अपना समय जाया न करना पड़े।  जानकारियों और सूचनाओं के संप्रेषण की आवश्यकता ने बोली के विकास का मार्ग प्रशस्त किया और जब मनुष्य ने इन्हें संकेतों के माध्यम से संप्रेषित करने का आविष्कार कर लिया तो भाषा ने आकार ग्रहण किया।
अलग अलग समूहों ने अपनी अपनी भाषाएँ और लिपियाँ विकसित कीं।  जैसे जैसे समूहों में आपसी संपर्क हुए भाषाओं का विकास हुआ और आज की आधुनिक भाषाएँ अस्तित्व में आईं। भाषाएँ कभी जड़ नहीं होतीं। वे लगातार विकासशील होती है। जिस भाषा में विकासशीलता का गुण नष्ट हो जाता है, जड़ता  आ जाती है वह शनैः शनैःअस्तित्व खोने लगती है। भाषा की आवश्यकता के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है कि उस की मनुष्य को कितनी और क्यों आवश्यकता थी और है? जो भाषा मनुष्य की  वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करती रहेगी, और भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिएविकसित होती रहेगी। उसे अधिकाधिक लोग अपनाते रहेंगे। किसी भी भाषा की उन्नति इस बात पर निर्भर करती है कि वह मनुष्य समाज की कितनी आवश्यकता की पूर्ति करती है। यदि कोई ऐसी भाषा विकसित हो सके जो  पूरी मनुष्य जाति की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर दे और नई उत्पन्न हो रही आवश्यकताओं की पूर्ति करती रहे तो लगातार विकसित होती रहेगी और उस का अस्तित्व बना रहेगा।  इस तरह हम कह सकते हैं कि भाषा मनुष्य द्वारा आविष्कृत वह उपकरण है जिस की उसे संप्रेषण के लिए आवश्यकता थी। इस उपकरण का मनुष्य की नवीनतम आवश्यकताओं के लिए विकसित होते रहना आवश्यक है। 

हिन्दी हमारी मातृभाषा है। वह हमारे लिए सर्वाधिक संप्रेषणीय है और संज्ञेय भी।  हम अधिकांशतः उसी का उपयोग करते हैं। हमारी आवश्यकता की पूर्ति उस से न होने पर हम अन्य भाषाओं को सीखने की ओर आगे बढ़ते हैं। यदि हिन्दी हमारी तमाम आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगे तो क्यों कर हम अन्य भाषाओं को सीखने की जहमत क्यों उठाएँगे। लेकिन हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरी दूसरी भाषाओं को सीखना पड़ता है। जिस का सीधा सीधा अर्थ है कि हिन्दी को अभी मनुष्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकसित होना है।  यदि किसी दिन हिन्दी इतनी विकसित हो जाए कि वह मनुष्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगे तो अधिकाधिक लोग हिन्दी सीखने लगेंगे और एक दिन वह हो सकता है जब कि वह मनुष्य जाति द्वारा सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली भाषा बन जाए। 
हम मन से चाहते हैं कि हिन्दी एक विश्व भाषा हो जाए। सारी दुनिया हिन्दी बोलने लगे। उस का दुनिया में एक छत्र साम्राज्य हो। दूसरी भाषाएँ संग्रहालय की वस्तु बन कर रह जाएँ। लेकिन ऐसा तभी हो सकता है कि हम हिन्दी को इस योग्य बनाएँ। दुनिया में जितना भी ज्ञान है वह हिन्दी में संग्रहीत हो। हम अपना नवअर्जित ज्ञान हिन्दी में सहेजना आरंभ करें। हिन्दी का भविष्य इस पर निर्भर है कि हम हिन्दी वाले  नए ज्ञान को अर्जित करने मे कितना आगे बढ़ पाते हैं? अभी तो हालात यह हैं कि जो भी नया ज्ञान  हम हिन्दी वाले अर्जित करते हैं उसे सब से पहले अंग्रेजी में अभिव्यक्त  करते हैं। हम अंग्रेजी में सोचते हैं और फिर हिन्दी में अनुवाद करते हैं। कुछ लोग हिन्दी को भी उस दिशा में डाल रहे हैं कि एक हिन्दी भाषी को भी उसे समझने के लिए पहले अंग्रेजी में समझना पड़े।

 देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कुंजीपट
आज हम हिन्दी दिवस मना रहे हैं क्यों कि 14 सितम्बर को इसे भारत की राजभाषा घोषित किया गया।  लेकिन वस्तुतः यह हिन्दी दिवस नहीं है अपितु हमारा राजभाषा दिवस है। हम हमेशा रोना रोते हैं कि सरकार इस के लिए कुछ नहीं करती, या करती है तो बहुत कम करती है और दिखावे भर के लिए करती है।  लेकिन हम खुद उस के लिए क्या कर रहे हैं। सरकार ने कंप्यूटर पर देवनागरी और तमाम भारतीय भाषाएं लिखने के लिए इन्स्क्रिप्ट कुंजीपट विकसित करने के काम को कराया, उस के लिए  टंकण शिक्षक बनवाया जिस से केवल एक सप्ताह में  ही हिन्दी टाइपिंग सीखी जा सकती है। लेकिन हम  हिन्दी वाले जो कंप्यूटर पर काम करते हैं वे ही नहीं सीख पा रहे हैं।  उस के लिए हम हजारों लाखों हिन्दी शब्दों की रोमन वर्तनी सीखने को तैयार हैं लेकिन एक सप्ताह उंगलियों को कसरत कराने को तैयार नहीं हैं।

 आसान हिन्दी कम्प्यूटर-टंकण शिक्षक
यदि हिन्दी को विश्वभाषा बनना है तो वह हिन्दी की अंदरूनी ताकत से बनेगी। उस की अंदरूनी ताकत हम हिन्दी वाले हैं। हम कितना ज्ञान हिन्दी में सहेज पाते हैं? हम कितना नया ज्ञान हिन्दी में, सिर्फ और सिर्फ हिन्दी में अभिव्यक्त करते हैं। इसी पर हिन्दी का विकास निर्भर करेगा। इस बात को हिन्दी के शुभेच्छु जितना शीघ्र हृदयंगम कर लें और अपने पथ पर चलने लगें उतना ही इस का विकास तीव्र हो सकेगा। फिलहाल तो मेरा एक निवेदन है कि हम जो कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिन्दी का काम कर रहे हैं, कम से कम अपना इनस्क्रिप्ट कुंजीपट का प्रयोग सीख लें। यह सीखने पर ही पता लग सकता है कि यह कितना आसान है और कितना उपयोगी और कितनी ही परेशानियों से एक बार में छुटकारा दिला देता है।  इस से हिन्दी में काम करने की गति और शुद्धता बढ़ेगी और हम हिन्दी का अधिकाधिक काम कर सकेंगे।   मैं आशा कर सकता हूँ कि अगले साल जब हम राजभाषा दिवस मनाएँ तो इन्स्क्रिप्ट कुंजीपट से टंकण कर रहे हों।

Sunday, September 13, 2009

पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’ की दो बाल कविताएँ


नवरत के पुराने पाठक ‘यक़ीन’ साहब की उर्दू शायरी से परिचित हैं। उन्हों ने हिन्दी, ब्रज, अंग्रेजी में भी खूब हाथ आजमाया है और बच्चों के लिए भी कविताएँ लिखी हैं। एक का रसास्वादन आप पहले कर चुके हैं। यहाँ पेश हैं उन की दो बाल रचनाएँ..........





(1) 

पापा
  •   पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’
सुब्ह काम पर जाते पापा
देर रात घर आते पापा

फिर भी मम्मी क्यूँ कहती हैं
ज़्यादा नहीं कमाते पापा
*******





(2) 
भोर का तारा

  •   पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’

उठो सवेरे ने ललकारा
कहने लगा भोर का तारा
सूरज चला काम पर अपने
तुम निपटाओ काम तुम्हारा
उठो सवेरे ने ललकारा ...


डाल-डाल पर चिड़ियाँ गातीं
चीं चीं चूँ चूँ तुम्हें जगातीं
जागो बच्चो बिस्तर छोड़ो
भोर हुई भागा अँधियारा

उठो सवेरे ने ललकारा ...


श्रम से कभी न आँख चुराओ
पढ़ो लिखो ज्ञानी कहलाओ
मानवता से प्यार करो तुम
जग में चमके नाम तुम्हारा

उठो सवेरे ने ललकारा ...


कहना मेरा इतना मानो
मूल्य समय का तुम पहचानो
जीवन थोड़ा काम बहुत है
व्यर्थ न पल भी जाए तुम्हारा

उठो सवेरे ने ललकारा ...



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Friday, September 11, 2009

भाया ! बैल बगाग्यो

पंडित श्याम शंकर जी व्यास अपने जमाने के जाने माने अध्यापक थे। उन के इकलौते पुत्र थे कमल किशोर व्यास।  उन्हें खूब मार पीट कर पढ़ाया गया।  पढ़े तो कमल जी व्यास खूब, विद्वान भी हो गए। पर परीक्षा में सफल होना नहीं लिखा था। हुए भी तो कभी डिविजन नहीं आया, किस्मत में तृतीय श्रेणी लिखी थी।  जैसे-तैसे संस्कृत में बी.ए, हुए। कुछ न हो तो मास्टर हो जाएँ यही सोच उन्हें बी.एस.टी.सी. करा दी गई। वे पंचायत समिति में तृतीय श्रेणी शिक्षक हो गए।  पंचायत समिति के अधीन सब प्राइमरी के स्कूल थे। वहाँ विद्वता की कोई कद्र न थी। गाँव में पोस्टिंग होती। हर दो साल बाद तबादला हो जाता। व्यास जी गाँव-गाँव घूम-घूम कर थक गए। 

व्यास जी के बीस बीघा जमीन थी बिलकुल कौरवान। पानी का नाम न था। खेती बरसात पर आधारित थी। व्यास जी उसे गाँव के किसान को मुनाफे पर दे देते और साल के शुरु में ही मुनाफे की रकम ले शहर आ जाते। बाँध बना और नहर निकली तो जमीन नहर की हो गई।  मुनाफा बढ़ गया।  गाँव-गाँव घूम कर थके कमल किशोर जी व्यास ने सोचा, इस गाँव-गाँव की मास्टरी से तो अच्छा है अपने गाँव स्थाई रूप से टिक कर खेती की जाए।

खेती का ताम-झाम बसाया गया। बढ़िया नागौरी बैल खरीदे गए। खेत हाँकने का वक्त आ गया। कमल किशोर व्यास जी खुद ही खेत हाँकने चल दिए। दो दिन हँकाई की, तीसरे दिन हँकाई कर रहे थे कि एक बैल नीचे गिरा और तड़पने लगा। अब व्यास जी परेशान।  अच्छे खासे बैल को न जाने क्या हुआ? बड़ी मुश्किल से महंगा बैल खरीदा था, इसे कुछ हो गया तो खेती का क्या होगा? दूर दूर तक जानवरों का अस्पताल नहीं ,बैल को कस्बे तक कैसे ले जाएँ? और डाक्टर को कहाँ ढूंढें और कैसे लाएँ?  बैल को वहीं तड़पता छोड़ पास के खेत में भागे, जहाँ दूसरा किसान खेत हाँक रहा था। उसे हाल सुनाया तो वह अपने खेत की हँकाई छोड़ इन के साथ भागा आया। किसान ने बैल को देखा और उस की बीमारी का निदान कर दिया। भाया यो तो बैल 'बगाग्यो' ।   व्यास जी की डिक्शनरी में तो ये शब्द था ही नहीं। वे सोच में पड़ गए ये कौन सी बीमारी आ गई? बैल जाने बचेगा, जाने मर जाएगा? 

किसान ने उन से कहा मास्साब शीशी भर मीठा तेल ल्याओ।  मास्टर जी भागे और अलसी के तेल की शीशी ले कर आए।  किसान ने शीशी का ढक्कन खोला और उसे बैल की गुदा में लगा दिया, ऐसे  कि जिस से उस का तेल गुदा में प्रवेश कर जाए। कुछ देर बाद शीशी को हटा लिया। व्यास जी महाराज का सारा ध्यान बैल की गुदा की तरफ था। तेल गुदा से वापस बाहर आने लगा मिनटों में बैल की गुदा में से तेल के साथ एक उड़ने वाला कीड़ा (जिसे हाड़ौती भाषा में बग्गी कहते हैं) निकला और उड़ गया। व्यास जी को तुरंत समझ आ गया कि 'बगाग्यो' शब्द का अर्थ क्या है। उन का संस्कृत और हिन्दी का अध्ययन बेकार गया। 

पंडित कमल किशोर व्यास हाड़ौती का शब्दकोश तलाशने बैठे तो पता लगा कि ऐसा कोई शब्दकोश बना और छपा ही नहीं है । बस बैल की गुदा में बग्गी घुसी थी, इस कारण से बीमारी का नाम पड़ा 'बगाग्यो'।  यह तो वही हुआ "तड़ से देखा, भड़ से सोचा और खड़ से बाहर आ गये"। 

Thursday, September 10, 2009

राजनैतिक स्वार्थों को साधने का घृणित अवसरवाद

मुझे पिछले दिनों दो बार जोधपुर यात्रा करनी पड़ी।  दोनों यात्राओं का सिलसिला एक ही था। एक उद्योग में नियोजित श्रमिकों ने अपनी ट्रेड यूनियन बना कर पंजीकृत कराई थी। जब उद्योग के दो तिहाई से भी अधिक श्रमिक इस यूनियन के सदस्य हो गए और उन्हों ने कानून के द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं को लागू करने की मांग की तो उद्योग के मालिकों के माथे पर बल पड़ने आरंभ हो गए। उन्हों ने यूनियन का पंजीयन प्रमाणपत्र रद्द कर ने के लिए ट्रेड यूनियन पंजीयक के सामने एक आवेदन प्रस्तुत किया। इसी आवेदन में यूनियन का पक्ष रखने के लिए यह यात्रा हुई थी। उस का कानूनी पक्ष क्या था। यह यहाँ इस आलेख का विषय नहीं है। उसे फिर कभी 'तीसरा खंबा' पर प्रस्तुत किया जाएगा। पहली सुनवाई के दिन जोधपुर बंद था। मांग यह थी कि उदयपुर और बीकानेर के वकीलों की मांग पर राजस्थान हाईकोर्ट की बैंचे न खोली जाएँ और एक बार विभाजित हो चुके हाईकोर्ट को विभाजित न किया जाए। हाईकोर्ट की अधिक बैंचें स्थापित किए जाने का विषय भी विस्तृत है और यह आलेख उस के बारे में भी नहीं है। इन विषयों पर आलेख फिर कभी 'तीसरा खंबा' पर प्रस्तुत किए जाएँगे।

उस दिन सुनवाई के समय कोई डेढ़ सौ किलोमीटर दूर से उद्योग के कोई सौ से अधिक मजदूर आए थे। वे अपने झंडे लिए जब ट्रेड यूनियन पंजीयक के कार्यालय की और जा रहे थे तो बंद कराने वालों का एक समूह वहाँ से गुजरा और उन्हों ने झंडे लिए मजदूरों को देखते ही नारे लगाने आरंभ कर दिए 'वकील-मजदूर एकता जिन्दाबाद !' मजदूरों ने भी उन के स्वर में स्वर मिलाया। कुछ देर नारेबाजी चलती रही फिर दोनों अपनी राह चल दिए। जब मजदूर पंजीयक कार्यालय पहुँचे तो वहाँ वे बाहर कुछ देर नारे लगाते रहे वहाँ बंद समर्थकों का एक और समूह आ निकला। फिर से नारे लगने लगे। मजदूरों ने भी वकील-मजदूर एकता के नारों में साथ दिया और साथ में अपने नारे भी लगाए जिस में उस समूह के लोगों ने भी साथ दिया। बंद समर्थक समूह में शिवसेना के कुछ कार्यकर्ता भी थे। जिन की पहचान गले में डाले हुए केसरिया रंग के पटके जिस पर लाल रंग से शिव सेना छपा था से स्पष्ट थी। उन्हों ने मारवाड़ के गौरव के संबंध में कुछ नारे लगाए। फिर यह भी कहा कि  उन्हें पृथक मारवाड़ राज्य  दे दिया जाए तो उन का अपना अविभाजित हाईकोर्ट वापस मिल जाएगा। फिर शेष राजस्थान का हाईकोर्ट वे कहीं भी ले जाएँ। इस तरह हाईकोर्ट को विभाजित नहीं किए जाने की मांग के बीच प्रदेश को ही विभाजित कर डालने की मांग पसरी दिखाई दी। 

कोटा वालों की यह पुरानी मांग है कि राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बैंच के पास लम्बित मुकदमों मे चालीस प्रतिशत सिर्फ हाड़ौती से हैं, इस कारण से कोटा में भी एक बैंच स्थापित की जानी चाहिए। अपनी इस मांग के समर्थन में वे विगत छह वर्षों से माह के अंतिम शनिवार को हड़ताल रखते हैं। जब देखा कि हाईकोर्ट बैंच के लिए उदयपुर वाले पिछले दो माह से और बीकानेर वाले एक माह से अधिक से संघर्ष कर रहे हैं। यदि इस अवसर पर कोटा वाले चुप रहे तो कोटा में बैंच खोलने की उन की मांग कमजोर पड़ जाएगी। तो वे भी 31 अगस्त से हड़ताल पर आ गए हैं। वकीलों के काम न करने के कारण उदयपुर, बीकानेर और कोटा संभागों में अदालती काम पूरी तरह से ठप्प हो चुका है। 


आज सुबह जब मैं कोटा पहुँचा तो यहाँ हाईकोर्ट की बैंच कोटा में स्थापित करने के समर्थन में शिवसेना ने कलेक्ट्री के बाहर धरना दिया हुआ था। सुबह से ले कर शाम तक जोरों से भाषण होते रहे और नारे लगते रहे। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि जोधपुर में शिवसेना हाईकोर्ट को विभाजित न करने के आंदोलन के साथ थी तो कोटा में उसे विभाजित करने के आंदोलन के साथ। एक ही दल के दो संभागों की शाखाएं आमने सामने खड़ी थीं। गनीमत यह थी कि जोधपुर की शिवसेना जो दबे स्वरों में मारवाड़ प्रांत अलग स्थापित करने की मांग कर रही थी। कोटा की शिवसेना ने पृथक हाड़ौती प्रांत जैसी कोई मांग नहीं उठा रही थी। मैं सोच रहा था कि राजनैतिक स्वार्थों को साधने का  इस से घृणित भी कोई अवसरवादी रूप हो सकता है क्या?

Tuesday, September 8, 2009

आत्म केंद्रीयता और स्वार्थ

शनिवार को  अत्यावश्यक कार्य करते हुए रविवार के दो बज गए, सोए थे कि बेटे को स्टेशन छोड़ने जाने के लिए पाँच बजे ही उठना पडा़। अब ढाई घंटे की नींद भी कोई नींद है। सात बजे वापस लौटे तो नींद नहीं आई। नेट पर कुछ पढ़ते रहे। आठ बजे सुबह सोने गए तो दस बजे टेलीफोन ने जगा लिया। महेन्द्र नेह का फोन था। पाण्डे जी का एक्सीडेंट हो गया है हम पुलिस स्टेशन में हैं रिपोर्ट लिखा दी है, पुलिस वाले धाराएँ सही नहीं लगा रहे हैं, आप आ जाओ। जाना पड़ा। पुलिस स्टेशन पर उपस्थित अधिकारी परिचित था। मैं ने कहा 336 कैसे लगा रहे हैं भाई 338 लगाओ। रस्सा गले में फाँसी बन गया होता तो पाण्डे जी का कल्याण ही हो गया था। अधिकारी ने कहा 337 लगा दिया है। अब अन्वेषण में प्रकट हुआ तो 338 भी लगा देंगे। मैं बाहर आया तो वहाँ एक परिचित कहने लगा -राजीनामा करवा दो। मैं ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया पुलिस अधिकारी ने रपट पर पाण्डे जी के हस्ताक्षर करवा कर उन्हें चोट परीक्षण के लिए अस्पताल भिजवा दिया। थाने के बाहर ही मोटर का वहाँ परिचित फिर मिला और कहने लगा ड्राइवर मेरा भाई है राजीनामा करवा दो, भाई और मालिक दोनों को ले आया हूँ। इन लोगों में से एक ने भी अब तक यह नहीं पूछा था कि दुर्घटना में घायल को कितनी चोट लगी है। मालिक के पास कार थी। लेकिन पाण्डे जी को पुलिसमेन उन की मोटर सायकिल पर ही बिठा कर अस्पताल ले गया। बस मालिक ने यह भी नहीं कहा कि मेरी कार में ले चलता हूँ। 

मुझे गुस्सा आ गया। मैं ने तीनों को आड़े हाथों लिया। "तुम्हें शर्म नहीं आती, तुम राजीनामे की बातें करते हो, तुमने पाण्डे जी से पूछा कि उन को कितनी लगी है? तुमने तो उन्हें अस्पताल तक ले जाने की भी न पूछी, किस मुहँ से राजीनामे की बात करते हो?

घटना वास्तव में अजीब थी। पाण्डे जी मोटर सायकिल से जा रहे थे। पास से बस ने ओवर टेक किया और उस में से एक रस्सा जिस का सिरा बस की छत पर बंधा था गिरा और उस ने पांडे जी की गर्दन और मोटर सायकिल को लपेट लिया। पांडे जी घिसटते हुए दूर तक चले गए। कुछ संयोग से और कुछ पांडे जी के प्रयत्नों से रस्सा गर्दन से खुल गया। वरना फाँसी लगने में कोई कसर न थी। पांडे जी के छूटने के बाद भी रस्सा करीब सौ मीटर तक मोटर सायकिल को घसीटते ले गया। पांडे जी का शरीर सर से पैर तक घायल हो गया। 

मैं जानता हूँ। उन्हें कोई गंभीर चोट नहीं है। पैर में फ्रेक्चर हो सकता है लेकिन उस की रिपोर्ट तो डाक्टर के  एक्स-रे पढ़ने पर आएगी। आईपीसी की धारा 279 और 337 का मामला बनेगा, जो पुलिस बना ही चुकी है। एक में अधिकतम छह माह की सजा और एक हजार रुपए का जुर्माना और दूसरी धारा में छह माह की सजा और पाँच सौ रुपया जुर्माना है। दोनों अपराध राज्य के विरुद्ध अपराध हैं।  राजीनामा संभव नहीं है। यह ड्राइवर जानता था  और इसीलिए ड्राइवर मुकदमा दर्ज होने के पहले ही राजीनामा करने पर अड़ा था। उसे अपने मुकदमे की तो चिंता थी, लेकिन यह फिक्र न थी कि घायल को कितनी चोट लगी है। 

दूसरी ओर बस का मालिक निश्चिंत खड़ा था उस पर कोई असर नहीं था। वह जानता था कि उसे सिर्फ पुलिस द्वारा जब्त बस को छुड़वाना है जिसे उस का स्थाई वकील किसी तरह छुड़वा ही लेगा। ड्राइवर पेशी करे या उसे सजा हो जाए तो इस से उसे क्या? वह तब तक ही उसे मुकदमा लड़ने का खर्च देगा जब तक ड्राइवर उस की नौकरी में है। बाद में उस की वह जाने। आज के युग ने व्यक्ति को कितना आत्मकेन्द्रित और स्वार्थी बना दिया है।

Saturday, September 5, 2009

अध्यापक जी का न्याय, शिक्षक दिवस पर एक नमन !

प्राइमरी स्कूल था। सुबह प्रार्थना होती थी। सभी विद्यार्थी स्कूल के बीच के मैदान में एकत्र होते। हर कक्षा की एक पंक्ति थी। पंक्ति का मुख मंच की ओर होता। प्रार्थना के बाद दिन भर के लिए हिदायतें मिलती थीं। उस दिन स्कूल के एक अध्यापक जी ने प्रार्थना के बाद सब विद्यार्थियों को अपने अपने स्थान पर बैठने को कहा। सब बैठ गए।
ध्यापक जी ने अपनी बुलंद आवाज में कहा। मैं आप सब से एक प्रश्न पूछता हूँ, सब विद्यार्थियों को जोर से जवाब देना है।
ध्यापक जी ने पूछा -क्या चोरी करना अच्छी बात है?
ब विद्यार्थी बोले -नहीं ईईईईई.......।
ध्यापक जी -चोरी करने वाले को सजा मिलनी चाहिए या नहीं? 
विद्यार्थी  -मिलनी चाहिए एएएएएए....।
ध्यापक जी  -और यदि चोर खुद ही पश्चाताप करे और अपनी गलती स्वीकार करते हुए आगे गलती न करने को कहे तो क्या उसे माफ कर देना चाहिए?
ब विद्यार्थी बोले -नहीं ईईईई ........।
ध्यापक जी  -तो उसे सजा तो कम मिलनी चाहिए?
ब विद्यार्थी बोले -हाँ आँआँआँआँ .......।
ध्यापक जी फिर बोले -तो सुनिए यहाँ बैठे विद्यार्थियों में से एकने कल अपने पिताजी की जेब में से रुपए चुराए हैं। यदि वह विद्यार्थी पश्चाताप करेगा और यहाँ सब के सामने आ कर अपनी गलती स्वीकार कर लेगा तो हम उसे कम सजा भी नहीं देंगे, और माफ कर देंगे। 
विद्यार्थियों में सन्नाटा छा गया। बच्चे सब एक दूसरे की ओर देखने लगे। आखिर उन मे कौन ऐसा है? दो मिनट निकल गए लेकिन कोई विद्यार्थी सामने न आया। 
अध्यापक जी फिर बोले -देखिए दो मिनट हो चुके हैं मैं दो मिनट और देता हूँ, वह विद्यार्थी सामने आ जाए। 
लेकिन फिर भी कोई सामने नहीं आया। दो मिनट और निकल गए। अब विद्यार्थी खुसर-फुसर करने लगे थे।
अध्यापक जी फिर बोले -देखिए  अतिरिक्त दो मिनट भी निकल गए हैं। अब पश्चाताप का समय निकल चुका है लेकिन मैं उस विद्यार्थी को एक मिनट और देता हूँ, यदि अब भी विद्यार्थी सामने नहीं आया तो उसे सजा ही देनी होगी। वह विद्यार्थी सामने आ जाए।
पूरे पाँच मिनट का समय निकल जाने पर भी वह विद्यार्थी सामने न आया। अध्यापक जी ने समय पूरा होने की घोषणा की और मंच से उतर कर नीचे मैदान में आए और एक पंक्ति में से एक विद्यार्थी को उठाया और पकड़ कर मंच पर ले चले। मंच पर उसे विद्यार्थियों के सामने खड़ा कर दिया। फिर बोलने लगे -इस विद्यार्थी ने अपने पिता की जेब से कल पचास रुपए चुराए हैं। पहली सजा तो इसे मिल चुकी है कि अब सब लोग जान गए हैं कि यह विद्यार्थी कैसा है। लेकिन सजा इतनी ही नहीं है। इसे यहाँ पहले घंटे तक मुर्गा बने रहना पड़ेगा। हाँ, यदि यहाँ यह कान पकड़ कर स्वयं स्वीकार कर ले कि उसने रुपए चुराए थे और उन रुपयों का क्या किया? तो इसे मुर्गा नहीं बनना पड़ेगा।
विद्यार्थी अब तक रुआँसा हो चुका था। उस ने रुआँसे स्वर में स्वीकार किया कि उस ने पचास रुपए चुराए थे जिस में से कुछ खर्च कर दिए हैं और कुछ उस के पास हैं। जो वह यहाँ निकाल कर दे रहा है। वह प्रतिज्ञा करता है कि वह जीवन में कभी भी चोरी  नहीं करेगा। किसी दूसरे की किसी वस्तु को हाथ भी न लगाएगा। उस ने वे रुपए निकाल कर अध्यापक जी को दिए। 
अध्यापक जी ने कहा -अभी सजा पूरी नहीं हुई। अभी तुम्हें कान पकड़ कर दस बैठकें यहाँ सब के सामने लगानी होंगी। विद्यार्थी ने दस बैठकें सब के सामने लगाईं। अध्यापक जी ने कहा -इस विद्यार्थी ने अपनी गलती स्वीकार ली है और उस का दंड भी भुगत लिया है। अब इसे कोई चोर न कहेगा। यदि किसी विद्यार्थी ने इसे चोर कहा और उस की शिकायत आई तो उसे भी दंड मिलेगा। 
सुबह की प्रार्थना सभा समाप्त हुई। विद्यार्थी ही नहीं, विद्यालय के सब शिक्षक और कर्मचारी भी इस न्याय पर हैरान थे। सब जानते थे कि सजा पाने वाला विद्यार्थी स्वयं उन अध्यापक जी का पुत्र है।
मुझे उन अध्यापक जी का नाम स्मरण नहीं आ रहा है। लेकिन आज शिक्षक दिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए नमन करता हूँ।

Thursday, September 3, 2009

संतानें पिता के नाम से ही क्यों पहचानी जाती हैं?

बुजुर्ग कहते हैं कि शाम का दूध पाचक होता है। जानवर दिन भर घूम कर चारा चरते हैं, तो यह मेहनत का दूध होता है और स्वास्थ्यवर्धक भी।  मैं इसी लिए शाम का दूध लेता हूँ।  डेयरी से रात को दूध घरों पर सप्लाई नहीं होता।  इसलिए खुद डेयरी जाना पड़ता है। आज शाम जब डेयरी पहुँचा तो डेयरी  के मालिक  मांगीलाल ने सवाल किया कि भीष्म को गंगा पुत्र क्यों कहते हैं। उसे पिता के नाम से क्यों नहीं जाना जाता है।  मैं ने कहा -गंगा ने शांतनु से विवाह के पूर्व वचन लिया था कि वह जो भी करेगी, उसे नहीं टोका जाएगा।  वह अपने पुत्रों को नदी में बहा देती थी। जब उस के आठवाँ पुत्र हुआ तो राजा  शांतनु ने उसे टोक दिया कि यह पुत्र तो मुझे दे दो। गंगा ने अपने इस पुत्र का नहीं बहाया, लेकिन शांतनु द्वारा वचन भंग कर देने के कारण वह पुत्र को साथ ले कर चली गई।  पुत्र के जवान होने पर गंगा ने उसे राजा को लौटा दिया। इसीलिए भीष्म को सिर्फ गंगापुत्र कहा गया, क्यों कि शांतनु को वह गंगा ने दिया था। उस की जिज्ञासा शांत हो गई। लेकिन मेरे सामने एक विकट प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि 'क्यों संतानें पिता के नाम से ही पहचानी जाती हैं, माता के नाम से क्यों नहीं?'

आखिर स्कूल में भर्ती के समय पिता का नाम पूछा और दर्ज किया जाता है। मतदाता सूची में पिता का नाम दर्ज किया जाता है। तमाम पहचान पत्रों में भी पिता का नाम ही दर्ज किया जाता है। घर में भी यही कहा जाता है कि वह अपने पिता का पुत्र है। क्यों हमेशा उस की पहचान को पिता के नाम से ही दर्ज किया जाता है?
इस विकट प्रश्न का जो जवाब मेरे मस्तिष्क ने दिया वह बहुत अजीब था। लेकिन लगता तार्किक है।  मैं ने डेयरी वाले से सवाल किया। तो उस ने इस का कोई जवाब नहीं दिया। उस के वहाँ मौजूद दोनों पुत्र भी खामोश ही रहे। आखिर मेरे मस्तिष्क ने जो उत्तर दिया था वह उन्हें सुना दिया।

माँ का तो सब को पता होता है कि उस ने संतान को जन्म दिया है। उस का प्रत्यक्ष प्रमाण भी होता है। लेकिन पिता का नहीं। क्यों कि उस की एक मात्र साक्ष्य केवल संतान की माता ही होती है। केवल और केवल वही बता सकती है कि उस की संतान का पिता कौन है? समाज में इस का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं होता कि पुत्र का पिता कौन है? समाज में यह स्थापित करने की आवश्यकता होती है कि संतान किस पिता की है। यही कारण है कि जब संतान पैदा होती है तो सब से पहले दाई (नर्स) यह बताती है कि फंला पिता के संतान हुई है। फिर थाली बजा कर या अन्य तरीकों से यह घोषणा की जाती है कि फलाँ व्यक्ति के संतान हुई है। संतान का पिता होने की घोषणा पर पिता किसी भी तरह से  उस का जन्मोत्सव मनाता है। वह लोगों को मिठाई बाँटता है। अपने मित्रों औऱ परिजनों को बुला कर भोजन कराता है और उपहार बांटता है। इस तरह यह स्थापित होता है कि उसे संतान हुई है।
मैं ने अपने मस्तिष्क द्वारा सुझाया यही उत्तर मांगीलाल को भी दिया। उस में आपत्ति करने का कोई कारण उसे नहीं दिखाई दिया, उस ने और वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने इस तर्क को सहज रुप से स्वीकार कर लिया।
अब आप ही बताएँ मेरे मस्तिष्क ने जो उत्तर सुझाया वह सही है कि नहीं। किसी के पास कोई और भी उत्तर हो तो वह भी बताएँ।

Tuesday, September 1, 2009

ग़ज़लों का जादू, पुरुषोत्तम 'यक़ीन' की युग्मित ग़ज़ल

आप ने पिछली दो पोस्टों में पुरुषोत्तम की जादू वाली ग़ज़लें पढ़ीं। कुछ पाठकों ने इस जादू को भेदने का प्रयत्न भी किया। घोस्टबस्टर जी जादू के बहुत नजदीक तक भी पहुँचे। लेकिन उसे भेद नहीं पाए।


'यक़ीन' साहब को कल शाम ही आना था। वे आए भी। लेकिन मैं घर से बाहर था, मुलाकात नहीं हो सकी। आज सुबह उन से फोन पर बात हुई। जो कुछ उन ने बताया वह इतना सरल था कि मुझे भी विश्वास नहीं हुआ। उन की बात सुन मैं ने कुछ चित्र ढूंढ निकाले हैं, एक तो ऊपर ही है,  जिसे आप देख चुके हैं। आप इन दोनों चेहरों को यक़ीन साहब की दो ग़ज़लें मान लें। अब जरा इन नीचे वाले चित्रों को भी देखिए.....
इस पैरेलल बार को देखें दो भाग समानांतर स्थिति में मिल कर एक यंत्र बना रहे हैं।

और यहाँ.... इस अँधेरे में ये दो चमकती आकृतियाँ क्या कर रही हैं?


 ये दो पृथक-पृथक सजीव रचनाएँ हैं जो आपस में मिल कर एक नई सजीव रचना बनाने में जुटी हैं।  

और यहाँ.........


 
यहाँ तो ये दोनों मिल कर एक हो चुकी हैं

ठीक इसी तरह यक़ीन साहब की दोनों ग़ज़लें भी समानान्तर दशा में मिल कर एक नई ग़ज़ल बन जाती हैं। मजे की बात यह कि उन दोनों ग़ज़लों का आंनंद भिन्न था और इस 'युग्मित ग़जल' का आनंद बिलकुल भिन्न है। आप भी इस का आनंद लीजिए.....

कुछ दिल की कुछ जग की सुन लें
 - पुरुषोत्तम 'यक़ीन' -


तू इक राहत अफ़्ज़ा मौसम, नयनों का इक ख़्वाब हसीं तू
तू बादल तू सबा तू शबनम, तू आकाश है और ज़मीं तू

छल करते हैं अपना बन कर, वो अपने मतलब के संगी
मेरे साथी मेरे हमदम, उन अपनों सा ग़ैर नहीं तू

तेरे मुख पर तेज है सच का, दाग़ नहीं तेरे चहरे पर
तेरे आगे सूरज मद्धम, कैसे कह दूँ माहजबीं तू

दर्दे-जुदाई और तन्हाई, तू यह कैसे सह लेता है
क्यूँ न निकल जाता है ये दम, आह! कहीं मैं और कहीं तू

कोई नहीं है तुझ बिन मेरा, तेरे दिल की बात न जानूँ
कह तो दे इतना कम से कम, मेरे दिल में सिर्फ़ मकीं तू

खुल कर बात करें आपस में, कुछ दिल की कुछ जग की सुन लें
कुछ तो कम होंगे अपने ग़म, आ कर मेरे बैठ क़रीं तू

झूठी ख़ुशियों पर ख़ुश रहिए, कौन 'यक़ीन' करेगा सच पर
व्यर्थ 'यक़ीन' यहाँ है मातम, चुप ही रहना दोस्त हसीं तू

आप चाहें तो इसे इस तरह भी देख सकते हैं, यहाँ दोनों ग़ज़लें अपना अलग अस्तित्व, अलग असर और अलग अर्थ रखती हैं -

तू इक राहत अफ़्ज़ा मौसम,                 नयनों का इक ख़्वाब हसीं तू
तू बादल तू सबा तू शबनम,                  तू आकाश है और ज़मीं तू

छल करते हैं अपना बन कर,                वो अपने मतलब के संगी
मेरे साथी मेरे हमदम,                           उन अपनों सा ग़ैर नहीं तू

तेरे मुख पर तेज है सच का,                   दाग़ नहीं तेरे चहरे पर
तेरे आगे सूरज मद्धम,                            कैसे कह दूँ माहजबीं तू

दर्दे-जुदाई और तन्हाई,                          तू यह कैसे सह लेता है
क्यूँ न निकल जाता है ये दम,                आह! कहीं मैं और कहीं तू

कोई नहीं है तुझ बिन मेरा,                    तेरे दिल की बात न जानूँ
कह तो दे इतना कम से कम,                 मेरे दिल में सिर्फ़ मकीं तू

खुल कर बात करें आपस में,                  कुछ दिल की कुछ जग की सुन लें
कुछ तो कम होंगे अपने ग़म,                 आ कर मेरे बैठ क़रीं तू

झूठी ख़ुशियों पर ख़ुश रहिए,                  कौन 'यक़ीन' करेगा सच पर
व्यर्थ 'यक़ीन' यहाँ है मातम,                  चुप ही रहना दोस्त हसीं तू


यक़ीन साहब ने इसे 'युग्मित ग़ज़ल' नाम दिया है। मैं ने उन्हें कोई उर्दू शब्द तलाश करने को कहा है। आप चाहें तो आप भी इस कारस्तानी को कोई खूबसूरत सा नाम दे सकते हैं।